वोट चोरी नहीं बना पाया बिहार में मुद्दा! नौकरी, जाति और ग्रामीण समस्याएं ही रहीं पहले फेज की वोटिंग का रुझान- रिपोर्ट



CENTRAL DESK
बिहार में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की “वोटर अधिकार यात्रा” अब तक लोगों के बीच कोई बड़ी लहर नहीं बना पाई है। “वोट चोरी” यानी वोट लिस्ट से नाम गायब करने के मुद्दे पर शुरू हुई यह यात्रा 17 अगस्त को सासाराम से शुरू हुई थी और करीब 1,300 किलोमीटर का सफर तय करते हुए 1 सितंबर को पटना के गांधी मैदान में एक बड़ी रैली के साथ खत्म हुई।

राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने इस यात्रा के दौरान कई जगहों पर सत्ताधारी पार्टी पर “वोट चोरी” का आरोप लगाया, लेकिन ज़मीन पर लोगों के बीच यह मुद्दा असर नहीं छोड़ सका। उत्तर बिहार के कई इलाकों में लोगों से बात करने पर पता चला कि बहुत कम लोग इस मुद्दे को समझते हैं, और ज्यादातर का कहना है कि उनकी असली चिंता रोज़गार, जाति समीकरण और सरकारी योजनाओं से जुड़ी है।

पूर्वी चंपारण के चिरैया में मैकेनिक महेश यादव और राशन डीलर रामलाल गुप्ता इसका उदाहरण हैं। यादव, जो आरजेडी समर्थक हैं, कहते हैं कि वे तेजस्वी को नौकरी के मुद्दे पर वोट देंगे। जबकि गुप्ता का कहना है कि “आख़िरकार वोट तो जाति के हिसाब से ही पड़ता है।”

जब उनसे “वोट चोरी” पर पूछा गया, तो यादव बोले – “ईवीएम में गड़बड़ी है।” इस पर गुप्ता हंस पड़े – “पहले बैलेट में जो धांधली होती थी वो ठीक थी क्या? अब ईवीएम ऑनलाइन है, इसमें छेड़छाड़ मुमकिन नहीं।” जब बताया गया कि राहुल गांधी वोट लिस्ट की गड़बड़ी की बात कर रहे हैं, तो दोनों ने कहा – “ये इस बार का मुद्दा नहीं है।”

दरभंगा के मुस्लिम बहुल गांव रमानगर में मोहम्मद इफ्तिखार कहते हैं, “हमारे परिवार के सारे 16 वोट लिस्ट में हैं। जिनके नाम जोड़े, वो भी शामिल हो गए। जो ‘वोट चोरी’ की बात कर रहे हैं, वही बताएं कि कहां हो रही है। हमें तो कुछ समझ नहीं आता।”

पास में बैठे मोहम्मद इश्तियाक कहते हैं, “गांव में राहुल गांधी क्या बोले, इससे फर्क नहीं पड़ता। यहां उम्मीदवार मायने रखता है। मुस्लिम वोट भी कई हिस्सों में बंटेगा।”

गोपलगंज के फूलवरिया, जो लालू प्रसाद का गांव है, में भी “वोट चोरी” पर कोई खास चर्चा नहीं। वहीं पूर्वी चंपारण के मधोपुर गांव के अतीकुर रहमान कहते हैं, “ये फालतू मुद्दा है। यहां किसी का नाम नहीं कटा। लोगों को नौकरी और पलायन की चिंता है।”

पटना के एक आरजेडी नेता साफ कहते हैं – “ये चुनाव इस मुद्दे पर नहीं लड़ा जा सकता। जिनका नाम वोटर लिस्ट में है, उन्हें फर्क नहीं पड़ता, और जिनका नाम नहीं है, वे चुनाव में मायने नहीं रखते।”

पश्चिम चंपारण के रतनमाला गांव में किसान रामदयाल कुशवाहा, जो कांग्रेस समर्थक हैं, कहते हैं, “वोट चोरी का मुद्दा इसलिए उठाया गया क्योंकि उनके पास कोई ठोस मुद्दा नहीं था। राहुल गांधी को समझना चाहिए कि लोगों की असली दिक्कत क्या है – हर साल बाढ़ में हमारी फसलें बर्बाद हो जाती हैं।”

वे आगे कहते हैं, “राहुल गांधी की बातें ज्यादातर नकारात्मक होती हैं। उन्हें बताना चाहिए कि वे मोदी से बेहतर क्या करेंगे। सिर्फ दूसरों की बुराई से भरोसा नहीं जीता जा सकता।”

11 नवंबर को दूसरे चरण की वोटिंग से पहले साफ है कि राहुल गांधी की “वोट चोरी” वाली मुहिम ज़मीन पर असर नहीं छोड़ पा रही। भीड़ ज़रूर जुट रही है, लेकिन लोगों की असली बातें अब भी वही हैं – रोज़गार, जात, सरकारी योजनाएँ और गांव की तकलीफें।

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