संस्मरण: को वैक्सीन का कच-कच



श्यामल बिहारी महतो

“दवाई भी और कड़ाई भी”, यह एक महान शासक का महान आदेश की तरह ही था। ऐसा अधिकांश लोगों का मत था, जिसे पालन कराने के लिए पूरा सरकारी तंत्र हाथ-मुंह धोकर जनता के पीछे पड़ गया था। कोई ढिलाई नहीं, कोई कोताही नहीं। लेना है तो लेना है। कोई बहाना नहीं चलेगा। सबका नंबर आएगा। कोई नहीं बच सकेगा। इस अभियान से कोई अछूता नहीं रहेगा, चाहे नेता हो, अभिनेता हो, किसान हो या मजदूर। सबको लेना होगा “कोविशील्ड वैक्सीन” – मुफ्त!

समूचे देश में वैक्सीन को लेकर तुगलकी फरमान जारी हो चुका था। कंटेनरों में भर-भर कर विभिन्न सेंटरों में भेजा जा रहा था। कार्यालयों में कर्मचारियों को इंजेक्ट किया जा रहा था। सबको ठूंसा जाने लगा था। कौन बचेगा, कौन नहीं – इसकी कोई गारंटी नहीं। साइड इफेक्ट की कौन सोचे? सबको लेना है तो लेना है, बस।

जनता के पास बहुत सोचने का समय नहीं था। देश-दुनिया में मौत का तांडव चल रहा था। मौत पीछे खड़ी है, ऐसा हर कोई हर पल महसूस कर रहा था। कब किसका नंबर आ जाए, किसी को कुछ पता नहीं। मौत जब जिसे चाहती, चुपके से उठा लेती। लोग दहशत में जी रहे थे। रात को नींद नहीं और दिन काटे नहीं कटता था। मौत का खौफ हर चेहरे पर चिपका नजर आता था।

पूरी मानव जाति के अस्तित्व का सवाल था। धरती से डायनासोर जैसे विलुप्त हो गए थे, लग रहा था अबकी मानव प्राणी मुक्त धरती हो जाएगी। कोरोना किसी को जिंदा नहीं छोड़ेगा। मौत के आंकड़े हर दिन शेयर बाजार के उछाल से भी ज्यादा बढ़ रहे थे। लाशों को जलाने के लिए जगह कम पड़ रही थी। अधजली लाशों को कुत्ते-सियार घसीटते दिख जाते थे। मानव जीवन का इतना बुरा हाल कभी नहीं हुआ था। जीने की वस्तुएं भी मनुष्य की पहुंच से बाहर होने लगी थीं। हवा-पानी की कीमतें आसमान छूने लगी थीं। हवा-पानी सब बिकाऊ हो गए थे।

एक कोरोना वायरस ने समूची दुनिया पर आतंक फैला रखा था। उसका कहर इतना जबरदस्त था कि ईश्वरीय सत्ता तक हिल चुकी थी। एक वायरस के आगे सभी भगवान बौने साबित हो चुके थे। मस्जिद, गिरजाघर और बड़े-बड़े मंदिरों में ताले पड़ गए थे। पहली बार नर ने अपने भगवान रूपी नारायण को अपने-अपने घरों में छिपते हुए देखा था। धरती के मानव मायूस हो चुके थे या फिर लाचार। उनके लिए मदद के सारे रास्ते बंद हो चुके थे। चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा। कहीं से आशा की कोई किरण नजर नहीं आ रही थी।

प्राचीन काल में मनुष्य ने आग की खोज कर जीवन को एक रूप दिया था। एक बार फिर मनुष्य ने इस विकट घड़ी में एक-दूसरे की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाया था। कोई नर से नारायण रूप में तो कोई मसीहा के रूप में सामने आया था। लोगों को बसों में, ट्रेनों में, जहाजों से उनके घर तक पहुंचाया जाने लगा था। घर लौटने का ऐसा जुनून कि लोग रेलों की छत पर तो बसों की छत पर जान हथेली पर लेकर निकल पड़े थे। हजारों मील पैदल रेल की पटरियों पर लोगों को चलते देखा गया था। मकसद था किसी तरह जीवित घर तक पहुंच जाएं, ताकि लाश को अपनों का कंधा मिल सके।

लॉकडाउन ने जीवन पर पहरे लगा दिए थे। लोग जीना भूल गए थे, सिर्फ मरना याद था। हर पल मौत का डर! हर कोई कुछ न कुछ खो रहा था। कोई बेटा खो रहा था, कोई अपना बाप, कोई पत्नी खो रहा था तो कोई अपना पति। कोई सांत्वना देने तक नहीं पहुंच रहा था, डर था कहीं मौत उसे ही न पकड़ ले। रिश्ते दरक रहे थे। बाहर कमाने गया बेटा को घर घुसने से रोका जा रहा था – “क्वारंटीन सेंटर में रह लो”, कहा जा रहा था।

मतलब, जीवित बचोगे तो घर में कदम रखना।

उधर मौत ने ऐसा कुचक्र रचा हुआ था कि उसकी पकड़ से कोई नहीं बच पा रहा था। क्या नेता और क्या अभिनेता, सांसद, विधायक और मंत्री – बिना भेदभाव किए कोरोना सबको निगल रहा था। फिर भी मनुष्य ने जीना नहीं छोड़ा था। काल के गाल में रहते हुए भी मनुष्य ने प्रेम का दामन नहीं छोड़ा था। जब तक जीवित हैं, तब तक प्रेम से जी लें। तभी तो क्वारंटीन सेंटर में ही प्रेम फूट पड़ता था और अगले दिन खबर आती थी – “क्वारंटीन सेंटर में लव हुआ। पत्नी ने पति का साथ छोड़ा और प्रेमी संग चल पड़ी।”

“सोती हुई पत्नी और बच्चे को छोड़, पति दूसरी की पत्नी लेकर फरार।”

जीवन के इसी भागम-भाग के बीच सरकार ने घोषणा की थी – “कोरोना वैक्सीन तैयार है, सबको मुफ्त लगेगी।”

बहुतों ने इसे राहत के रूप में देखा और बहुतों ने आपदा में अवसर कहा। वैक्सीन जनोपयोगी है भी या नहीं, कितनी कारगर है – बहुतों के मन में सवाल टंग गए थे।

यह था “कोविशील्ड वैक्सीन”। इसे बनाया था सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने।

जानकार लोग इस वैक्सीन को न लेने की बात कहने लगे – “हड़बड़ी में बना वैक्सीन कुछ भी गड़बड़ कर सकता है, जीवन देने की बजाय मौत भी दे सकता है।”

ऐसे लोग अपने बचे-खुचे जीवन को अपने सीमित संसाधनों से ही पटरी पर लाने की जद्दोजहद में लगे हुए थे। सरकार से बहुतों को कई तरह से नाराजगी भी थी। मोदी सरकार ने देशवासियों को उनके हाल पर छोड़ दिया था। अब वही सरकार दिखावे के लिए वैक्सीन मुफ्त देने की बात कर, उसी नाराजगी को पाटने की कोशिश कर रही थी। पर बुद्धिजीवियों के इस विरोध स्वर ने सरकार की नींद उड़ा दी। इस तरह तो वैक्सीन की खपत नहीं होगी। आपदा पर अवसर!

कोविशील्ड वैक्सीन को कोल इंडिया के मजदूर-कर्मचारियों को लगाना अनिवार्य कर दिया गया। सरकार की इस घोषणा से एक बात तो स्पष्ट हो गई थी कि उसे इस वैक्सीन को किसी भी हालत में खपाना है, चाहे मजदूरों को फायदा हो या नुकसान। आपदा में अवसर!

सरकार ने तो यही सोचा था कि सरकारी कर्मचारी इसका विरोध नहीं कर सकेंगे, और यही हुआ भी। जहां-जहां वैक्सीन का विरोध हुआ, वहां हाजिरी बंद दी जाने लगी – “कोविशील्ड वैक्सीन लेना हर मजदूर के लिए जरूरी है। मजदूर कर्मचारियों की जान की हिफाजत करना कंपनी की नैतिक जिम्मेदारी है, हम इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं।” ऊपर से फरमान आ गया। इसके बावजूद बहुतों ने वैक्सीन न लेने की ठान ली थी। तब खोज-खोज कर उनकी उपस्थिति पंजी जब्त की जाने लगी। मजबूरी में लाखों मजदूरों को कोविशील्ड वैक्सीन लेनी ही पड़ी थी। इस मजबूरी की चपेट में लेखक भी आ चुका था।

जैसे-तैसे मनुष्य क्वारंटीन जीवन से उबर चुके थे। नफे-नुकसान की बात वो पीछे छोड़ आए थे। एक सामान्य जीवन लोग जीने लगे थे। तभी एक विस्फोटक खबर ने फिर एक बार करोड़ों देशवासियों के दिलों में दहशत भर दी, और जिसकी भरपाई इस बार जान देकर ही पूरी की जा सकती है…

“कोविशील्ड वैक्सीन” से हो सकता है “हार्ट अटैक – ब्रेन स्ट्रोक”। कंपनी ने ब्रिटेन की कोर्ट में कबूली साइड इफेक्ट की बात।

इस खबर ने करोड़ों लोगों की नींद उड़ा दी है।

इलेक्टोरल बॉन्ड चंदा का असर अब सबको साफ-साफ दिखाई देने लगा था।

दो मई को उस चंदाखोर का फोटो को-वैक्सीन सर्टिफिकेट से हटा लिया गया था। उसी के फोटो के बगल कैप्शन में लिखा था – “दवाई भी और कड़ाई भी।”

हटाने के पीछे आचार संहिता का हवाला दिया गया था। यह स्वास्थ्य एवं परिवार मंत्रालय की ओर से कहा गया था। अब सवाल उठता है कि बड़ा शौक था हर काम में बढ़-चढ़ कर फोटो खिंचवाने का, फिर काहे तस्वीरों को हटवा दी…?

शौचालय तक में हाथ धोते हुए फोटो खिंचवाने वाला चंदाखोर, करोड़ों लोगों की जान संकट में डालकर आज फोटो हटवा रहा है – फोटोजीवी!

अंध भक्त लोग बड़ी शान से जिन्हें फादर ऑफ नेशन कह रहे थे, वक्त ने पलटी मारी – अब वही लोग क्यों उन्हें फादर ऑफ डोनेशन कहने लगे? क्योंकि जान सबको प्यारी है। और करोड़ों का चंदा लेकर करोड़ों देशवासियों की जान से खिलवाड़ कर दिया एक सनकी चंदाखोर ने, जो माफी के काबिल नहीं है…

सर्वाधिकार सुरक्षित – श्यामल बिहारी महतो
बोकारो, झारखंड
फोन नंबर – 6204131994

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