Kolkata में SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। Election Commission of India के निर्देश पर तैयार नई वोटर लिस्ट में 65 ऐसे चुनाव अधिकारियों के नाम हटा दिए गए हैं, जो खुद चुनावी ड्यूटी में लगे हुए हैं।
इस फैसले का असर यह है कि ये अधिकारी मतदान प्रक्रिया तो कराएंगे, लेकिन खुद वोट नहीं डाल पाएंगे। मामला अब Supreme Court of India तक पहुंच चुका है, जहां इस पर सुनवाई भी हुई है।
90.8 लाख नाम हटने से बढ़ा विवाद, आंकड़ों पर सवाल
रिपोर्ट के अनुसार SIR प्रक्रिया के तहत कुल 90.8 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। इनमें 65 चुनाव अधिकारियों के नाम भी शामिल हैं। कोर्ट में यह भी जानकारी दी गई कि करीब 27.1 लाख मामलों पर पहले जैसा ही रुख अपनाया गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इतने बड़े स्तर पर नाम हटने से वोटिंग प्रतिशत की गणना प्रभावित हुई है। पहले चरण में 92.8% मतदान दर्ज किया गया, लेकिन इसे “डिस्टॉर्टेड बेसलाइन” का असर माना जा रहा है।
कोर्ट में उठी आपत्ति: ‘ड्यूटी करने वाले ही वोट से बाहर’
सीनियर एडवोकेट एमआर शमशाद ने कोर्ट में इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि जिन अधिकारियों के ड्यूटी ऑर्डर में EPIC नंबर दर्ज हैं, उन्हीं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं।
इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि संबंधित अधिकारी अपनी दलीलें अपीलेट ट्रिब्यूनल के सामने रखें। फिलहाल उन्हें वहीं जाने का निर्देश दिया गया है।
राजनीतिक बहस तेज, ‘डर फैक्टर’ की चर्चा
West Bengal में इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। सत्तारूढ़ और विपक्षी दल दोनों ही ज्यादा मतदान को अपने पक्ष में बता रहे हैं।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि SIR प्रक्रिया से पैदा हुए डर के कारण लोग बड़ी संख्या में मतदान केंद्रों तक पहुंचे। उन्हें आशंका थी कि वोट न डालने पर उनका नाम स्थायी रूप से सूची से हट सकता है, इसलिए उन्होंने अधिक संख्या में मतदान किया।
