CENTRAL DESK
राउरकेला की दो उच्च शिक्षित आदिवासी बहनों ने यह साबित कर दिया है कि सफलता केवल नौकरी पाने में नहीं, बल्कि अपनी पहचान और संस्कृति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में भी है। ओडिशा के राउरकेला की ललिता सामद और रीता सामद ने अपनी डिग्रियों को सिर्फ रोजगार का साधन नहीं बनाया, बल्कि अपनी जनजातीय विरासत को उद्यमिता के जरिए नई पहचान दिलाने का रास्ता चुना। दोनों बहनों ने “जोम्हा” नाम से एक रेस्टोरेंट की शुरुआत की, जिसका अर्थ हो भाषा में “भोजन” होता है। उनका उद्देश्य सिर्फ खाना परोसना नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की परंपराओं, स्वाद और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी और दुनिया के सामने प्रस्तुत करना है। यह पहल मई 2025 में शुरू हुई और देखते ही देखते स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटकों के बीच भी आकर्षण का केंद्र बन गई।
परंपरा और आधुनिकता का अनोखा संगम
रेस्टोरेंट में पारंपरिक आदिवासी व्यंजनों को आधुनिक प्रस्तुति के साथ परोसा जाता है। बांस में पकाई गई बिरयानी, साल पत्तों में तैयार विशेष व्यंजन, मिट्टी के बर्तनों में पकाया गया मांस और मोटे अनाज से बने खाद्य पदार्थ यहां की खास पहचान हैं। रेस्टोरेंट का वातावरण भी ग्रामीण और आदिवासी संस्कृति की झलक प्रस्तुत करता है, जिससे ग्राहकों को केवल भोजन ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक अनुभव भी मिलता है।
महिलाओं के लिए बनी प्रेरणा
ललिता और रीता का मानना है कि अपनी जड़ों से जुड़कर भी आधुनिक दुनिया में सफलता हासिल की जा सकती है। उन्होंने दिखाया है कि शिक्षा का वास्तविक अर्थ केवल नौकरी नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति के लिए नए अवसर पैदा करना भी है। आज उनकी पहल कई युवाओं, विशेषकर आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों की युवतियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है।
संस्कृति संरक्षण के साथ रोजगार का माध्यम
दोनों बहनों की यह पहल स्थानीय उत्पादों, पारंपरिक व्यंजनों और आदिवासी संस्कृति को बढ़ावा देने के साथ-साथ रोजगार सृजन का भी माध्यम बन रही है। उनका सपना है कि आने वाले समय में जनजातीय भोजन और संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिले और लोग आदिवासी समाज की समृद्ध विरासत को करीब से जान सकें। राउरकेला की इन बहनों की कहानी यह संदेश देती है कि जब सपनों के साथ अपनी संस्कृति और पहचान का जुड़ाव हो, तो सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं रहती, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन जाती है।
