दर्शक दीर्घा के कलम घिस्सू- महाविद्वान आलोचकों के नाम



KUMAR PARVEJ

कल जंतर-मंतर पर हजारों युवा जमा हुए। रोजगार, शिक्षा और पेपर लीक के खिलाफ उनका गुस्सा सड़कों पर उतर आया। लेकिन राजनीति के कुछ महाविद्वान ऐसे अवसरों पर भी जनता के संघर्ष को नहीं, बल्कि उसमें “विचलन” खोज रहे हैं।

कल से सोशल मीडिया पर जारी यह बहस बार-बार यूनानी दार्शनिक डायोजनीज़ का वह व्यंग्य याद दिलाती है, जिसमें उन्होंने कहा था कि कुछ लोग जीवन भर समुद्र का नक्शा बनाते रहते हैं, लेकिन कभी जहाज़ पर नहीं चढ़ते। हमारे यहां भी राजनीति के ऐसे नक्शानवीसों की कमी नहीं है। वे जनसंघर्षों के तट पर खड़े होकर लहरों की आलोचना करते हैं, मगर पानी में उतरने से परहेज़ करते हैं।

उनकी समस्या यह है कि युवा सड़क पर पहुँच गए, तो पहले यह पूछते हैं या संदेह व्यक्त करते हैं कि कहीं इन सबके पीछे भाजपा की साज़िश ही तो नहीं। लेकिन इससे भी बड़ी परेशानी उन्हें इस बात से है कि वहां दीपांकर भट्टाचार्य क्यों पहुँच गए?

यह सचमुच दिलचस्प प्रश्न है।

जब कोई कम्युनिस्ट नेता किसी जनसंघर्ष में नहीं जाता, तब कहा जाता है कि कम्युनिस्ट जनता से कट गए हैं। और जब वही नेता छात्रों-युवाओं के बीच पहुँचता है, तब कहा जाता है कि यह अवसरवाद है। यानी दोष अनुपस्थिति में भी है और उपस्थिति में भी।

लगता है कुछ आलोचकों ने दीपंकर भट्टाचार्य के लिए राजनीति का एक विशेष नियम बना रखा है—वे जहां न जाएं, वहां भी गलत हैं; और जहां जाएं, वहां तो और भी गलत हैं।

दरअसल जंतर मंतर पर कामरेड दीपांकर का जाना कुछ लोगों की पूर्वनिर्मित धारणाओं को असुविधाजनक बना दे रहा है। वर्षों से वे यह कथा गढ़ते रहे हैं कि वामपंथ जनता से कट चुका है। अब यदि वही वामपंथ छात्रों और युवाओं के बीच दिखाई दे जाए, तो कथा संकट में पड़ जाती है। इसलिए आंदोलन की चर्चा कम और दीपांकर भट्टाचार्य की उपस्थिति की चर्चा ज़्यादा होने लगती है।

मानो हजारों युवाओं की सभा नहीं हुई हो, बल्कि पूरा कार्यक्रम सिर्फ़ इस रहस्य की जाँच के लिए आयोजित की गई  हो कि दीपांकर भट्टाचार्य वहां पहुँचे कैसे?

फिर वे कहते हैं कि इन लोगों के पास अपना “प्रोग्राम” है नहीं, सो बेगाने शादी में अब्दुल्ला दीवाना।

मानो बेरोजगारी किसी दल का निजी कार्यक्रम हो। मानो शिक्षा का संकट किसी संगठन की बौद्धिक संपत्ति हो। मानो पेपर लीक के खिलाफ गुस्सा किसी के घर में लिखा गया प्रस्ताव हो।

ऐसे लोगों को देखकर कभी-कभी संस्कृत का वह श्लोक याद आता है—

“परोपदेशे पाण्डित्यं सर्वेषां सुकरं नृणाम्।”

अर्थात उपदेश देने में सब बड़े पंडित होते हैं।

जनता संघर्ष कर रही हो, तब भी ये लोग संघर्ष में नहीं, संघर्ष के पीछे किसी साज़िश में रुचि रखते हैं। आग लगी हो, तो ये बाल्टी नहीं लाते। पहले यह पूछते हैं कि पानी किस कुएं से भरा गया है।

उनकी राजनीति कुछ वैसी है जैसी मध्यकालीन धर्मशास्त्रियों की थी, जो अकाल और महामारी के बीच भी इस प्रश्न पर बहस कर सकते थे कि सुई की नोक पर कितने देवदूत नृत्य कर सकते हैं।

वे पूछते हैं—कम्युनिस्टों का अपना कार्यक्रम कहां है?

सवाल बुरा नहीं है। लेकिन यह सवाल पूछने वाले दर्शकदीर्घा के ऐसे महापंडित हैं, जिनसे खुद तो कुछ हो नहीं रहा। वर्षों से जनता के किसी बड़े संघर्ष में उनकी उपस्थिति नहीं मिलती। किसी आंदोलन की अगुवाई नहीं मिलती। किसी सामाजिक उभार में उनका योगदान नहीं मिलता। लेकिन आलोचना का भंडार असीमित होता है।

वे राजनीति में कुछ वैसा ही स्थान ग्रहण कर चुके हैं, जैसा भारतीय परिवारों में वह दूर का चाचा ग्रहण करता है जो स्वयं जीवन में कुछ न करे, लेकिन हर सफल-असफल व्यक्ति को सलाह अवश्य देता रहे।

उनकी स्थिति पर कबीर का एक रूपांतर लागू होता है—

“करे न खेती, बोए न बीजा, सबसे मांगे हिसाब।”

2011 का अन्ना आंदोलन उनके लिए ऐसा है, जैसे कुछ पुरोहितों के लिए कलियुग का प्रमाण। हर नई घटना का निष्कर्ष वहीं से निकाला जाएगा। यदि किसी जनउभार का कभी दक्षिणपंथी लाभ उठा ले, तो उनका निष्कर्ष होता है कि जनउभारों से ही दूर रहो।

यह वैसा ही तर्क है, जैसे कोई सेनापति एक युद्ध हारने के बाद घोषणा कर दे कि अब सेना को मैदान में उतरना ही नहीं चाहिए।

इतिहास का सबक उल्टा है। जनता के बीच खाली छोड़ी गई जगह कभी खाली नहीं रहती। उसे कोई-न-कोई भर देता है। राजनीति में निर्वात नहीं होता।

लेकिन दर्शकदीर्घा में बैठे लोगों को मैदान हमेशा संदिग्ध दिखाई देता है, क्योंकि मैदान में धूल है। अनिश्चितता है। जोखिम है। गलती की संभावना है। और दर्शकदीर्घा में बैठकर हमेशा सही साबित होने का सुख है।

वास्तव में उनकी पूरी राजनीति उस ब्राह्मण की तरह है, जो नदी के किनारे बैठकर तैराकों की अशुद्ध मुद्राओं पर शास्त्रार्थ कर रहा हो, जबकि सामने लोग डूब रहे हों।

असहमति हो सकती है। निर्णयों पर बहस हो सकती है। निर्णय गलत साबित हो सकता है लेकिन जनता के बीच जाने को ही अवसरवाद घोषित कर देना दरअसल राजनीति की नहीं, राजनीतिक अकर्मण्यता की पराकाष्ठा है।

क्योंकि सच यह है कि राजनीति अंततः दर्शकदीर्घा से नहीं, मैदान से संचालित होती है।

दर्शकदीर्घा में बैठे लोग कभी-कभी बहुत विद्वान लग सकते हैं, लेकिन इतिहास की किताबों में जगह प्रायः उन्हीं को मिलती है जिन्होंने धूल, पसीना और जोखिम चुना था।

परिचय- लेखक माले नेता. पटना (बिहार) से जुड़े हैं।

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