Tanweer Ahmed
नीट पेपर लीक के बाद जिन 22 छात्रों की मौत हुई, उनके परिजनों की पीड़ा, दर्द, तकलीफ़ और गुस्से का जवाब कौन देगा? 25 लाख छात्रों को दोबारा परीक्षा देने की मजबूरी, उनका मानसिक तनाव, असुविधा और भविष्य को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता, क्या सिर्फ़ एक शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े से समाप्त हो जाएगी?
आंदोलन कर रहे छत्रों की दिल्ली के जंतर मंतर में बेहरहमी से पिटाई, लड़कियों के साथ बादशालूकी, उनके प्राइवेट पार्ट के साथ बत्तमीजी, आंसू गैस के गोले से आँखों की तकलीफ चलन, पलेट गन के छर्रों से घायल बदन, सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल के दौरान उनकी गिरती शारीरिक क्षमता और भूख की पीड़ा,भूक की तड़प, देश के करोड़ों लोगों की दर्द और गुस्सा क्या सिर्फ एक शिक्षा मंत्री के इस्तिफे के इस्तिफे से ठीक हो जायगा।
नहीं। देश को सिर्फ़ चेहरा बदलने की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था बदलने की ज़रूरत है। भ्रष्टाचार और जवाबदेही की कमी को समाप्त करना होगा। अब सवाल उठता है कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े के बाद जवाबदेही किस स्तर तक तय होगी? लोकतंत्र में जनता को सरकार और उसके सर्वोच्च नेतृत्व से भी सवाल पूछने का पूरा अधिकार है। जब तक देश की सत्ता के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति अपने पद से इस्तीफा नहीं दें देता तब तक इन तकलीफो का इलाज नहीं। क्या अगला नम्बर अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का है? क्या उन्हें भी अपनी जावाबदेही साबित नहीं करनी चाहिए। याद रखें जब-जब युवा अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरा है, तब-तब उसके संघर्ष ने बड़े-बड़े घमंड को तोड़ा है। देश के करोड़ों युवा यह जानना चाहते हैं कि शिक्षा व्यवस्था को इस स्थिति तक पहुँचाने वाले व्यक्ति अपना इस्तिफा कब देंगे? भविष्य में ऐसी घटनाएँ दोबारा न हों, इसकी जीम्मेदारी कौन लेगा? इसके लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएँगे? यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि देश के छात्रों के भविष्य, न्याय और एक जवाबदेह तय करने के लिए है।
(लेखक का परिचय: तनवीर अहमद, प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उनके काम ने एक बड़ी लकीर खींची है। वे रांची में रहते हैं)
