झारखंड राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस ने एक बड़ा अवसर गंवा दिया


TANWEER AHMED

झारखंड राज्यसभा चुनाव में अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी ने एक ऐसा राजनीतिक और सामाजिक अवसर गंवा दिया है।जिसकी भरपाई निकट भविष्य में शायद आसान नहीं होगी। आप कहेंगे कौन सा मौका? एक ऐसा मौका जब कॉंग्रेस पार्टी झारखण्ड राजयसभा के चुनाब में अल्पसंख्यक समाज के प्रति पुरे देश सहित झारखण्ड में हो रहे नाइंसाफी, लिंचिंग, नफरत, अत्याचार, गैर बराबरी का माहौल बनाया जा रहा है उसके खिलाफ एक मजबूत आवाज़ बुलंद करने वाले किसी मजबूत अल्पसंख्यक समाज के व्यक्ति कों राजयसभा भेजनें का मौका। झारखण्ड में कांग्रेस की तरफ से पिछले कई सालों से लोकसभा और राजयसभा में किसी मुसलमान उम्मीदवार कों देश के सबसे बड़े सदनो में एक मजबूत लीडरशिप खड़ा करने की मांग कों पूरा करने का मौका। आप कहेंगे एक सीट से क्या होगा? यह सिर्फ एक सीट का सवाल नहीं था, बल्कि उस आवाज़ का सवाल था जिसकी आज देश के करोड़ों मुसलमानों को सबसे अधिक आवश्यकता है।

आज देश का माहौल किसी से छिपा नहीं है। पिछले कई वर्षों से, विशेषकर केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद, अल्पसंख्यक समाज खासकर मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव, नफरत, हिंसा और गैर-बराबरी की घटनाओं में लगातार वृद्धि हुई है। मुसलमानों को व्यवस्थित रूप से निशाना बनाया जा रहा है। राजनीतिक भाषणों, मीडिया ट्रायल और प्रशासनिक रवैये के माध्यम से इस समुदाय को हाशिए पर धकेलने की कोशिश की जा रही है। कभी “लव जिहाद” के नाम पर, कभी “गौ-तस्करी” के आरोप में, कभी सड़क पर नमाज़ पढ़ने को लेकर, तो कभी मस्जिदों की अज़ान तक को विवाद का विषय बनाकर मुस्लिम समाज को लगातार टारगेट किया जा रहा है। बुलडोज़र कार्रवाई के नाम पर बिना न्यायिक प्रक्रिया के घर और दुकानें तोड़ी जा रही हैं।  200 साल पुरानी मस्जिदों और दरगाहों कों सरकारी अतिक्रमण दिखा कर रात के सन्नाटे में तोड़ दिया जारहा है। कई मामलों में धर्म देखकर पुलिसिया कार्रवाई होती दिखाई देती है। एक राज्य, एक शहर इसमें अगर एक समय दो घटनाएं होती है एक में अगर कोई मुस्लिम युवक या व्यक्ति किसी हिन्दू युवक या व्यक्ति उसके खिलाफ किसी अपराध का दोषी होता है तो प्रशासन बिना देरी और जाँच के उसके खिलफ कार्रवाई शुरू होजाती, घरों में बुलडोज़र चल जाता है, उसके परिजनों कों गिरफ्तार कर लिया जाता है कभी अपराधी का एनकाउंटर भी कर दिया जाता है। पीड़ित परिवार कों लाखों का मुआवजा और सरकारी नौकरी तक दें दी जाती है। दूसरी तरफ इसके विपरीत अगर अपराधी कोई हिन्दू युवक या व्यक्ति पीड़ित अगर कोई मुस्लिम होता है तो  प्रशासन का रवैया बिलकुल नकारात्मक रहता। गिरफ़्तारी तो दूर fir लेने में भी आनाकानी होता है। प्रशासन ओपनली धर्म के बुनियाद पर कार्रवाई करती है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि भीड़ हिंसा और लिंचिंग की घटनाएं अब सामान्य होती जा रही हैं। ट्रेन में दाढ़ी-टोपी देखकर मुस्लिम युवकों के साथ मारपीट की घटनाएं सामने आ रही हैं। हाल ही में बिहार के एक मौलवी की ट्रेन में पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। झारखंड में भी आए दिन मुस्लिम युवकों की लिंचिंग और उत्पीड़न की खबरें सामने आती रहती हैं। न्यायपालिका, जिसे न्याय का रक्षक माना जाता है, अक्सर इन अत्याचारों के प्रति मूकदर्शक बनी रहती है। एक और ख़तरनाक बात विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के नाम लाखों मुस्लिमों का वोट काट लिया जस है, जिसके तहत मिलने वाली सरकारी सुविधाएं छीन ली जा रही है। कुल मिलाकर मुस्लिमों कों दूसरे दर्ज़ा का नागरिक बनाने की बड़ी शाजिस है। 

ऐसे दौरऔर माहौल में कांग्रेस पार्टी के पास यह सुनहरा अवसर था कि वह झारखंड से किसी मजबूत और मुखर मुस्लिम नेता को राज्यसभा भेजती। ऐसा नेता जो संसद के उच्च सदन में खड़े होकर झारखण्ड, देश और विशेषकर मुस्लिम समाज के खिलाफ हो रही नाइंसाफी के खिलाफ संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से आवाज़ उठा सकें। राज्यसभा सिर्फ एक राजनीतिक पद नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण मंच है। राज्यसभा सदस्य के पास संसदीय विशेषाधिकार और अधिकार होते हैं, जिनके माध्यम से वह जनता के मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठा सकता है।

सांसद प्रश्नकाल के दौरान सरकार से जवाब मांग सकता है। “कॉलिंग अटेंशन” के माध्यम से तत्काल सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर सरकार का ध्यान आकर्षित कर सकता है। शॉर्ट ड्यूरेशन डिस्कशन, स्पेशल मेंशन, मोशन और सामान्य बहस के दौरान वह समुदाय के दर्द, अन्याय और उत्पीड़न को सदन में रख सकता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत संसद सदस्य को सदन में बोलने की स्वतंत्रता प्राप्त है। संसद के अंदर कही गई बातों पर उसके खिलाफ अदालत में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। यही लोकतंत्र की ताकत है। यदि कोई मुस्लिम सांसद राज्यसभा में होता, तो वह न सिर्फ मुस्लिम समाज की पीड़ा को मजबूती से उठाता बल्कि सरकार को जवाबदेह बनाने का काम भी करता। हमने देखा है कि संसद में उत्तर-पूर्व, दलित, आदिवासी और अन्य समुदायों से जुड़े भेदभाव और अन्याय के मुद्दे लगातार उठाए जाते हैं। इन बहसों का असर भी होता है। सरकार को जवाब देना पड़ता है, मीडिया में चर्चा होती है, जनता तक मुद्दा पहुंचता है और कई बार नीतिगत बदलाव तक होते हैं।

राज्यसभा को “हाउस ऑफ एल्डर्स” कहा जाता है, जो लोकतंत्र में संतुलन और सुधार की भूमिका निभाती है। सदन में उठाई गई आवाज़ कई बार राष्ट्रीय बहस बन जाती है। यही कारण है कि संसद में प्रतिनिधित्व सिर्फ राजनीति नहीं बल्कि सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है।

झारखंड में लगभग 50 लाख मुसलमान रहते हैं। कांग्रेस पार्टी को यह समझना चाहिए था कि राज्यसभा में एक मुस्लिम चेहरा भेजना केवल एक समुदाय को प्रतिनिधित्व देना नहीं होता, बल्कि देश के लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करना होता। कांग्रेस हमेशा खुद को धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाली पार्टी बताती रही है। लेकिन झारखंड राज्यसभा चुनाव में किसी मुस्लिम नेता को उम्मीदवार न बनाकर उसने अपने ही दावों को कमजोर किया है। यह फैसला करोड़ों मुसलमानों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर उनकी राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व की बात कब होगी।

मेरा स्पष्ट मानना है कि यदि कांग्रेस पार्टी झारखंड से किसी योग्य मुस्लिम नेता को राज्यसभा भेजती, तो वह देश के करोड़ों मुसलमानों और झारखंड के लाखों अल्पसंख्यकों की एक मुखर और संवैधानिक आवाज़ बन सकता था। कांग्रेस पार्टी ने इस बार सिर्फ एक उम्मीदवार नहीं छोड़ा, बल्कि एक बड़ा ऐतिहासिक अवसर गंवा दिया।

(लेखक का परिचय: तनवीर अहमद, प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उनके काम ने एक बड़ी लकीर खींची है। वे रांची में रहते हैं)

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