SURENDRA KUJUR
ढिंकी यानी ढेंकी आदिवासी सभ्यता का विज्ञान है, प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की सदियों पुरानी तकनीक को आज भुला दिया गया है, जबकि ये महज एक उपकरण नहीं, एक सभ्यता का विज्ञान है। कभी गांव की सुबह ढेंकी की लयबद्ध ध्वनि से जागती थी। वह ध्वनि केवल धान कूटने की आवाज़ नहीं थी, बल्कि वह धरती, श्रम, प्रकृति और मनुष्य के बीच हजारों वर्षों से चले आ रहे संवाद का संगीत थी। आज वह आवाज़ लगभग मौन हो चुकी है। गाँवों से ढेंकी गायब हो रही है, और उसके साथ हमारी स्मृतियाँ, हमारी संस्कृति, हमारा स्वास्थ्य और हमारे पूर्वजों का वैज्ञानिक ज्ञान भी धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है।
तस्वीर में दिखाई देने वाली यह ढेंकी केवल लकड़ी का एक उपकरण नहीं है। यह प्रकृति और मनुष्य के बीच संतुलन की वह तकनीक है, जिसे किसी विश्वविद्यालय ने नहीं, बल्कि जंगलों, खेतों और जीवन के अनुभवों ने जन्म दिया। इसे साल, सखुआ, साज या गम्हार जैसी कठोर लकड़ियों से बनाया जाता था। इसकी पूरी संरचना भौतिक विज्ञान के लीवर (Lever) सिद्धांत पर आधारित है। बिना बिजली, बिना ईंधन, बिना कार्बन उत्सर्जन के यह उपकरण वर्षों तक कार्य करता था। आज जिसे “सस्टेनेबल टेक्नोलॉजी” कहा जाता है, उसका जीवंत उदाहरण हमारे गाँवों में सदियों से मौजूद था।
ढेंकी केवल धान नहीं कूटती थी, वह भोजन को उसके प्राकृतिक स्वरूप में सुरक्षित रखती थी। आधुनिक राइस मिलें चावल को अत्यधिक पॉलिश करके चमकदार बना देती हैं, लेकिन इसी प्रक्रिया में उसकी सबसे मूल्यवान परत—ब्रान (Bran Layer)—हटा दी जाती है। इसी परत में आहार रेशा (Dietary Fiber), विटामिन-B समूह, विटामिन-E, आयरन, मैग्नीशियम, जिंक, फाइटोन्यूट्रिएंट्स और प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। यही कारण है कि आज पोषण विज्ञान बार-बार कम पॉलिश किए गए चावल, साबुत अनाज और प्राकृतिक खाद्य पदार्थों को अपनाने की सलाह देता है।
विडंबना देखिए...जिस ज्ञान को हमारे पूर्वज बिना प्रयोगशाला के जानते थे, उसे सिद्ध करने में आधुनिक विज्ञान को सदियाँ लग गईं।
आज दुनिया Brown Rice को “Super Food” कहती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ उसे मधुमेह, हृदय स्वास्थ्य और बेहतर पाचन के लिए लाभकारी बताते हैं। लेकिन यह हमारे लिए कोई नई खोज नहीं है। हमारे आदिवासी पूर्वज सदियों पहले ढेंकी से कुटा हुआ कम पॉलिश चावल खाते थे। उस समय समाज का एक बड़ा वर्ग इस भोजन को “जंगलियों का भोजन” कहकर तिरस्कार करता था।
इतिहास का यह सबसे बड़ा व्यंग्य है कि… जिसे कभी पिछड़ेपन का प्रतीक कहा गया, आज वही आधुनिकता का आदर्श बन गया। जिसे कभी असभ्यता कहा गया, आज वही पोषण विज्ञान का सर्वोच्च उदाहरण माना जा रहा है। जिसे कभी गरीबी का भोजन कहा गया, आज वही पाँच सितारा होटलों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पैकेटों में “प्रीमियम हेल्थ फूड” बनकर बिक रहा है।
प्रश्न यह नहीं है कि दुनिया बदल गई।
प्रश्न यह है कि क्या हम स्वयं अपने ज्ञान से दूर हो गए?
हमारे पूर्वजों ने भोजन को कभी केवल पेट भरने का साधन नहीं माना। उनके लिए भोजन औषधि था। श्रम व्यायाम था। जंगल विश्वविद्यालय था। नदी जीवनशाला थी। और प्रकृति स्वयं उनकी सबसे बड़ी वैज्ञानिक प्रयोगशाला थी।
हमारी माँ, बहनें और दादियाँ जब ढेंकी चलाती थीं, तब वे अनजाने में सम्पूर्ण शरीर का व्यायाम कर रही होती थीं। पैरों की मांसपेशियाँ, कमर, रीढ़, कंधे और श्वसन तंत्र सक्रिय रहते थे। आज आधुनिक जीवन ने श्रम छीन लिया है, फिर उसी खोए हुए श्रम को पाने के लिए हम जिम, ट्रेडमिल और फिटनेस सेंटरों में धन खर्च कर रहे हैं। यह केवल जीवनशैली का परिवर्तन नहीं, बल्कि सभ्यता का विरोधाभास है।
हमने मशीनें पा लीं, लेकिन श्रम खो दिया।
हमने चमकदार चावल पा लिया, लेकिन पोषण खो दिया।
हमने बाज़ार पा लिया, लेकिन आत्मनिर्भरता खो दी।
हमने सुविधा पा ली, लेकिन स्वास्थ्य खो दिया।
हमने विकास पाया, लेकिन अपनी जड़ों से दूरी भी पा ली।
सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि ढेंकी क्यों समाप्त हो रही है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम अपने पूर्वजों की उस वैज्ञानिक चेतना को भी समाप्त होने दे रहे हैं, जिसने प्रकृति और मनुष्य के बीच संतुलन बनाकर रखा था?
सभ्यताएँ केवल इमारतों से नहीं बनतीं। वे अपने ज्ञान, अपनी स्मृतियों और अपनी परंपराओं से जीवित रहती हैं। जब कोई समाज अपने पूर्वजों के ज्ञान को तुच्छ समझने लगता है, तब उसका पतन बाहर से नहीं, भीतर से शुरू होता है।
याद रखिए– जिस समाज को अपने पूर्वजों के ज्ञान पर विश्वास नहीं रहता, वह एक दिन उसी ज्ञान को विदेशी नाम, अंग्रेज़ी पैकेजिंग और कई गुना अधिक कीमत देकर वापस खरीदता है।
आज आवश्यकता ढेंकी को केवल एक पुरानी वस्तु मानकर संग्रहालय में रखने की नहीं है, बल्कि उसे स्वदेशी विज्ञान, पोषण विज्ञान, पर्यावरण विज्ञान और सांस्कृतिक दर्शन के रूप में पुनः समझने की है।
हमारे पूर्वज अशिक्षित नहीं थे; वे प्रकृति के विश्वविद्यालय से शिक्षित वैज्ञानिक थे। उन्होंने जो ज्ञान हमें सौंपा, उसे बचाना केवल संस्कृति को बचाना नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के भविष्य को बचाना है।
हम ढेंकी की लकड़ी को नहीं, उसके पीछे छिपे ज्ञान को जीवित रखेंगे।
हम केवल विरासत की बातें नहीं करेंगे, बल्कि उसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाएँगे।
क्योंकि जिस दिन हम अपनी जड़ों को पहचान लेंगे, उसी दिन हमें यह समझ आ जाएगा कि भविष्य की सबसे आधुनिक राह, कई बार अतीत की पगडंडियों से होकर ही गुजरती है।
(सुरेंद्र कुजुर: लेखक तीन दशक से फिल्ममेकर के रूप में आदिवासी संस्कृति को बचाने की मुहिम में जुटे हैं। वे कुड़ुख भाषा के गीतकार, संगीतकार और निदेशक के रूप में जाने जाते हैं)
