हरित ऊर्जा की नीति तभी सफल होगी, जब उपभोक्ताओं के अधिकार, पुराने वाहनों की तकनीकी क्षमता और आर्थिक वास्तविकताओं का भी समान रूप से ध्यान रखा जाए।
डॉ बीरेन्द्र कुमार महतो ‘गोतिया’
भारत में प्रदूषण कम करने, पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटाने तथा किसानों को गन्ना आधारित इथेनॉल उत्पादन से अतिरिक्त आय उपलब्ध कराने के उद्देश्य से पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण की नीति को तेजी से लागू किया गया है। निस्संदेह यह एक दूरदर्शी पहल है, किंतु इसके व्यावहारिक प्रभावों का मूल्यांकन भी उतना ही आवश्यक है। विशेषकर दो, तीन, पाँच अथवा दस वर्ष पुराने वाहनों के लाखों उपभोक्ता आज ऐसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं, जिन पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
देश के अनेक वाहन मालिक यह शिकायत कर रहे हैं कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के उपयोग के बाद उनके वाहनों में माइलेज में कमी, इंजन की कार्यक्षमता में गिरावट, स्टार्ट होने में कठिनाई, ईंधन पाइपों एवं रबर के पुर्जों के शीघ्र खराब होने जैसी समस्याएँ बढ़ी हैं। यद्यपि इन समस्याओं की तीव्रता वाहन की बनावट, रखरखाव और निर्माता की तकनीकी क्षमता पर निर्भर करती है, फिर भी यह विषय व्यापक अध्ययन और पारदर्शी समीक्षा की मांग करता है।
इथेनॉल की अपनी वैज्ञानिक विशेषताएँ हैं। इसमें ऊर्जा घनत्व सामान्य पेट्रोल की तुलना में कम होता है, जिसके कारण समान दूरी तय करने के लिए अपेक्षाकृत अधिक ईंधन की आवश्यकता पड़ सकती है। साथ ही, इथेनॉल नमी को आकर्षित करने वाला पदार्थ है। ऐसे पुराने वाहन, जिन्हें अधिक इथेनॉल मिश्रण को ध्यान में रखकर डिजाइन नहीं किया गया था, उनमें समय के साथ कुछ तकनीकी समस्याएँ उत्पन्न होने की संभावना से विशेषज्ञ भी पूरी तरह इनकार नहीं करते। इसलिए सभी प्रकार के वाहनों पर एक जैसी नीति लागू करना व्यवहारिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
सबसे अधिक प्रभावित वह मध्यमवर्गीय और निम्न आय वर्ग है, जो वर्षों की मेहनत की कमाई से खरीदी गई मोटरसाइकिल, स्कूटी या चारपहिया वाहन का उपयोग आज भी कर रहा है। यदि उसका वाहन बार-बार मरम्मत की मांग करे, माइलेज कम हो जाए और ईंधन की खपत बढ़ जाए, तो इसका सीधा प्रभाव उसके मासिक बजट पर पड़ता है। हर नागरिक के लिए नया वाहन खरीद पाना संभव नहीं है। ऐसे में पर्यावरण संरक्षण की कीमत केवल आम उपभोक्ता ही क्यों चुकाए?
सरकार का उद्देश्य निश्चित रूप से जनहित और पर्यावरण संरक्षण है, लेकिन किसी भी नीति की सफलता उसके संतुलित क्रियान्वयन में निहित होती है। आवश्यकता इस बात की है कि पुराने वाहनों पर इथेनॉल मिश्रित ईंधन के वास्तविक प्रभावों का स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए, उसके निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएँ तथा वाहन निर्माताओं, तेल कंपनियों और उपभोक्ता संगठनों के साथ व्यापक संवाद स्थापित किया जाए। यदि किसी श्रेणी के वाहनों के लिए विशेष प्रकार के ईंधन या तकनीकी सुधार की आवश्यकता है, तो उसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और आवश्यक सहायता भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
विकास का अर्थ केवल नई नीतियाँ बनाना नहीं, बल्कि उन नीतियों के प्रभावों को समय-समय पर परखना भी है। पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा आत्मनिर्भरता निस्संदेह राष्ट्रीय प्राथमिकताएँ हैं, परंतु इनके साथ आम नागरिक की आर्थिक सुरक्षा और उपभोक्ता हितों का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है। ऐसी नीति ही वास्तव में सफल मानी जाएगी, जो हरित भविष्य के साथ-साथ आम आदमी के वर्तमान को भी सुरक्षित रख सके।
@ डॉ बीरेन्द्र कुमार महतो ‘गोतिया’
असिस्टेंट प्रोफेसर
जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा केन्द्र
रांची विश्वविद्यालय, रांची।
