RSS की आदिवासी मुहिम के बीच क्यों चर्चा में हैं कार्तिक उरांव, 60 साल पुराने सवाल राष्ट्रीय बहस का केंद्र; क्या बोलीं गीताश्री

RANCHI

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा अनुसूचित जनजाति (ST) लाभों को लेकर धर्मांतरित आदिवासियों के प्रश्न को इन दिनों प्रमुखता से उठाया जा रहा है। इसी बहस के केंद्र में झारखंड के पूर्व केंद्रीय मंत्री और प्रख्यात आदिवासी नेता कार्तिक उरांव का नाम फिर चर्चा में है। द प्रिंट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, जिन मुद्दों को आज RSS से जुड़े संगठन उठा रहे हैं, उन्हें कार्तिक उरांव ने छह दशक पहले संसद, सरकार और सार्वजनिक मंचों पर उठाया था।

लोहरदगा से तीन बार सांसद रहे कार्तिक उरांव झारखंड के उन चुनिंदा नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने आदिवासी समाज की पहचान, अधिकार और विकास से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया। वे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में केंद्रीय मंत्री भी रहे और आदिवासी हितों के मुखर प्रवक्ता माने जाते थे।

संसद से लेकर अदालत तक उठाया था मुद्दा

द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार, 1963 में कार्तिक उरांव ने लोहरदगा लोकसभा सीट के चुनाव परिणाम को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उनका तर्क था कि ईसाई धर्म अपना चुके कुछ उम्मीदवारों की जनजातीय पहचान और आरक्षित सीट पर उनकी पात्रता को लेकर गंभीर प्रश्न हैं।

हालांकि, तत्कालीन पटना हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि धर्म परिवर्तन के बावजूद संबंधित व्यक्ति अपनी जनजातीय पहचान नहीं खोता। अदालत ने यह भी टिप्पणी की थी कि धर्मांतरित उरांव समुदाय को समाज में “क्रिश्चियन उरांव” के रूप में ही जाना जाता है, जो उनकी जनजातीय पहचान को दर्शाता है।

सरकारी लाभों के वितरण पर भी उठाए थे सवाल

कार्तिक उरांव ने संसद में भी यह विषय उठाया था। 1968 में उन्होंने केंद्र सरकार से पूछा था कि अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित नौकरियों, छात्रवृत्तियों और अन्य सुविधाओं का लाभ किस प्रकार विभिन्न वर्गों तक पहुंच रहा है। उन्होंने दावा किया था कि आदिवासी आबादी में धर्मांतरित लोगों की संख्या अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद उन्हें सरकारी लाभ अधिक मात्रा में मिल रहे हैं।

हालांकि, तत्कालीन केंद्र सरकार ने जवाब दिया था कि अनुसूचित जनजाति किसी भी धर्म से संबंधित हो सकती है और धर्म आधारित आंकड़े सरकार के पास उपलब्ध नहीं हैं।

RSS से जुड़े संगठन फिर उठा रहे वही बहस

रिपोर्ट के अनुसार, RSS से संबद्ध वनवासी कल्याण आश्रम वर्तमान में इसी विषय को लेकर सक्रिय है। संगठन का कहना है कि आदिवासी समाज की पारंपरिक पहचान, सांस्कृतिक विरासत और संवैधानिक अधिकारों पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए।

समर्थकों का मानना है कि यह वही मुद्दा है जिसे कार्तिक उरांव ने दशकों पहले उठाया था। वहीं आलोचकों का आरोप है कि उनके विचारों की राजनीतिक व्याख्या की जा रही है। इसी कारण यह विषय सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है।

परिवार ने जताई अलग राय

द प्रिंट की रिपोर्ट में कार्तिक उरांव की बेटी और कांग्रेस नेता गीताश्री उरांव का भी पक्ष प्रकाशित किया गया है। उन्होंने कहा है कि उनके पिता के विचारों को वर्तमान राजनीतिक संदर्भों में अलग ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा है। उनके अनुसार, कार्तिक उरांव आदिवासियों से अपनी मूल आस्था और परंपराओं से जुड़े रहने की बात करते थे, लेकिन उन्हें किसी विशेष वैचारिक परियोजना से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

झारखंड की राजनीतिक और सामाजिक विरासत के प्रतीक

विचारों को लेकर मतभेदों के बावजूद कार्तिक उरांव की पहचान झारखंड के सबसे प्रभावशाली आदिवासी नेताओं में होती है। उन्होंने शिक्षा, प्रतिनिधित्व, सांस्कृतिक पहचान और आदिवासी अधिकारों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया। आज जब ST अधिकारों, धर्मांतरण और आदिवासी अस्मिता पर नई बहस चल रही है, तब झारखंड के इस महान नेता की राजनीतिक विरासत एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गई है।

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