TANWEER AHMED
आखिर क्या था? हज्जतुल-विदा यानी आखरी हज के मौके पर रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने जो खुतबा दिया था, इस आखिरी ख़ुतबे में जो पूरी दुनिया के इंसानियत के लिए एक मिसाल बन गई।
हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी ज़िंदगी के आख़री हज के मौके पर मैदाने अरफ़ात में जो तारीख़ी ख़ुत्बा दिया था वह सिर्फ एक खुतबा नहीं था बल्कि पूरी इंसानियत के लिए अमन, इंसाफ और मसावात यानी बराबरी का एक मुकम्मल मंशूर यानी मैनिफेस्टो था।
इस ख़ुत्बे की शुरुआत उन्होंने अल्लाह की तारीफ़ और क़ुदरत की बढ़ाई ब्यान करते हुऐ दी थी। और फिर वहां मौजूद हज़ारों के मज़मे को बड़े ही प्यार और संजीदगी से मुख़ातिब किया।
उन्होंने लोगों से कहा कि मेरी बातों को बहुत ध्यान से सुनो क्योंकि मुझे नहीं मालूम कि इस साल के बाद मैं कभी भी इस जगह तुमसे दोबारा मिल सकूंगा या नहीं। उनके इस शुरुआती अंदाज़ ने ही पूरे माहौल को बेहद ज़ज्बाती और संजीदा बना दिया था। सबको अंदाज़ा हो रहा था कि यह उनके महबूब नबी का आखिरी पैगाम है।
इस ख़ुत्बे का सबसे अहम और खास फ़ैसलू औरतों के हक़ की हिफ़ाज़त था जिसके बारे में उस दौर के समाज में कोई सोचता भी नहीं था। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मर्दों को खास तौर पर वसीयत करते हुए फरमाया: ” औरतों के मामले में अल्लाह से डरो क्योंकि तुमने उन्हें अल्लाह की अमानत के तौर पर अपने निकाह में लिया है।”
उन्होंने मर्दों को याद दिलाया कि औरतों पर तुम्हारे कुछ हक हैं तो तुम्हारे ऊपर भी औरतों के कुछ वाजिब हुकूक हैं। उन्होंने हुक्म दिया कि अपनी बीवी और घर की दूसरी औरतों के साथ हमेशा भलाई, मुहब्बत और नरमी का बर्ताव करें। समाज में औरतों को यह इज्जत और मक़ाम देकर उन्होंने आने वाली तमाम नस्लों के लिए खानदानी और सामाजिक ज़िंदगी को सवारने का एक बेहतरीन रास्ता दिखाया था। रंग, नस्ल, जात, बेरादरी, कबीले और ऊँच-नीच की दीवारों को गिराते हुए उन्होंने इंसानियत की बराबरी का ऐसा ऐलान किया जिसकी मिसाल दुनिया में कहीं नहीं मिलती। उन्होंने साफ़ कहा कि लोगो, तुम सबका रब एक है और तुम सब एक ही बाप यानी आदम के औलाद हो और आदम को मिट्टी से बनाया गया था। इसलिए किसी अरब को किसी अजमी पर, न किसी अज़मी को किसी अरब पर, न किसी गोरे को काले पर और न ही किसी काले को गोरे पर कोई फ़ज़ीलत हासिल है। अल्लाह के नज़दीक बड़ा और इज़्ज़तवाला सिर्फ़ वो है जिसके अमाल अच्छे हैं, दिल में अल्लाह का डर और परहेज़गारी है। उन्होंने यह भी साफ़ किया कि अब हर इंसान अपने कर्मों यानी आमाल के लिए खुद ज़िम्मेदार होगा। कोई किसी के गुनाह को बोझ किसी और पर नहीं डाला जायेगा।
अमानत में ख़यानत न करने की ताक़ीद करते हुए आपने फरमाया कि माशी और सामाजिक इस्तेहसाल ( ग़लत इस्तेमाल )को ख़त्म करने के लिए ब्याज यानी सूद को पूरी तरह से हराम और नाज़ाइज़ करार दिया जाता है। उन्होंने ने साफ लफ़्ज़ों में कहा की दौरे जहालत के सारे ब्याज़ आज से ख़त्म किए जाते हैं। इस तरह उन्होंने ने माशी बराबरी की बुन्याद रखी ताकी अमीर गरीबों का खून न चूस सके। इसके साथ उन्होंने समाज के सबसे कमज़ोर तबके यानी गुलामों और नौकरो के हुकूक पर बहुत ज़ोर दिया। उन्होंने हिदायत दी कि जो तुम्हारे मातहत काम करते हैं उनके साथ वैसा ही सुलूक करो जैसा तुम अपने साथ पसंद करते हो। जो तुम खाते हो वही खिलाओ, जो तुम पहनते हो वही पहनाओ, उनके साथ ज़रा भी गैर ज़्याती और गैर बराबरी न करो।
इस तारीख़ी खुत्बे में अहम मौज़ू इंसानी जान और माल की हिफाजत का भी था। नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने साफ़ तौर पर ऐलान किया कि हर इंसान की जान उसका माल और उसकी इज़्ज़त एक दूसरे के लिए उतनी ही ज़रूरी है जितना हज का यह महीन और यह शहर ऐ मक्का।
उन्होंने सदियों से चली आ रही जहालत और ज़ुल्म की रस्मों को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया। उन्होंने कहा की पुराने ज़माने की दुश्मनी और खून के बदले खून लेने का जो सिलसिला जो काबिलों के बिच चलता आरहा था उसे अब पूरी तरह पैरों तले कुचला जाता है। यहां तक के उन्हें ने सब से पहले अपने ही खानदान के रब्या बिन हारिस के खून का बदला माफ़ कर के समाज के सामने माफ़ी और अमन की एक बड़ी मिसाल पेश की।
खुदबे के आख़री हिस्से में वहां मौजूद लोगों को आपस में भाई-भाई बनकर रहने की ताकीद की। उन्होंने दुनिया से रुख़सत होने से पहले दो बहुत अहम चीज़ें सौंपते हुए कहा कि मैं तुम्हारे बीच अल्लाह की किताब यानी कुरान और अपने तरीक़े यानी सुन्नत छोड़कर जा रहा हूँ। जब तक तुम इन दोनों को मज़बूती से पकड़े रहोगे, गुमराह नहीं होगे।”
आखिर में उन्होंने आसमान की तरफ उंगली उठाई और अल्लाह को गवाह बनाते हुए लोगों से पूछा: “क्या मै ने अल्लाह का पैगाम तुम तक पहुंचा दिया है?” वहां मौजूद हज़ारों लोगों ने एक आवाज़ में गवाही दी हाँ आप ने हक़ अदा कर दिया। तब नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: ” ऐ अल्ल्हा तू गवाह रहना, जो लोग यहां मौजूद हैं वो मेरी इन बातों को उन तक पहुंचा दें जो आज यहां मौजूद नहीं हैं।”
(लेखक का परिचय: तनवीर अहमद, प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उनके काम ने एक बड़ी लकीर खींची है। वे रांची में रहते हैं)
