RANCHI
झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति, पारंपरिक हस्तशिल्प, लोक कला और स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने की दिशा में राज्य को बड़ी सफलता मिली है। राज्य के 11 नए उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिलने के बाद अब झारखंड के कुल GI टैग प्राप्त उत्पादों की संख्या बढ़कर 12 हो गई है। यह उपलब्धि राज्य के कारीगरों, बुनकरों, शिल्पकारों, किसानों और आदिवासी समुदायों के वर्षों पुराने पारंपरिक ज्ञान, कौशल और मेहनत का सम्मान मानी जा रही है।
GI टैग प्राप्त करने वाले नए उत्पादों में कुचाई सिल्क साड़ी एवं फैब्रिक्स, भगैया साड़ी एवं फैब्रिक्स, दुमका चादर, बदोनी पपेट्स, पंछी परहन पंछी साड़ी एवं फैब्रिक्स, झारखंड तसर सिल्क साड़ी एवं फैब्रिक्स, झारखंड डोकरा शिल्प, झारखंड जनजातीय आभूषण, झारखंड बांस शिल्प, केसरिया कलाकंद, झारखंड बेनम तथा झारखंड जादोपटिया पेंटिंग शामिल हैं। इनमें से अधिकांश उत्पाद सीधे तौर पर राज्य की आदिवासी परंपराओं और लोक संस्कृति से जुड़े हुए हैं, जो पीढ़ियों से समुदायों के बीच संरक्षित और विकसित होते रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि झारखंड की पहचान केवल उसके खनिज संसाधनों से नहीं, बल्कि उसकी जीवंत जनजातीय संस्कृति, हस्तशिल्प और लोक ज्ञान से भी है। डोकरा कला, जादोपटिया पेंटिंग और पारंपरिक जनजातीय आभूषण जैसे उत्पाद न केवल सांस्कृतिक धरोहर हैं, बल्कि आदिवासी समाज की जीवनशैली, इतिहास और रचनात्मकता को भी दर्शाते हैं। GI टैग मिलने से इन उत्पादों की विशिष्ट पहचान को कानूनी संरक्षण मिलेगा और नकली उत्पादों पर रोक लगाने में भी मदद मिलेगी।
राज्य सरकार का कहना है कि यह उपलब्धि स्थानीय कारीगरों और शिल्पकारों के लिए आर्थिक अवसरों के नए द्वार खोलेगी। GI टैग के माध्यम से इन उत्पादों की प्रामाणिकता स्थापित होगी, जिससे राष्ट्रीय और वैश्विक बाजारों में उनकी मांग बढ़ने की संभावना है। इससे ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में रोजगार सृजन के साथ-साथ पारंपरिक आजीविकाओं को भी मजबूती मिलेगी।
झारखंड सरकार अब राज्य के अन्य विशिष्ट उत्पादों को भी GI टैग दिलाने की दिशा में काम कर रही है। मांदर, पायतकर पेंटिंग, निमुचा या करनी शॉल, देवघर पेड़ा, कुसुमी लाह, लाह की चूड़ियां, साल बीज, महुआ फूल, करंज बीज, रागी, रुगड़ा और धुस्का जैसे उत्पाद वर्तमान में GI टैग की प्रक्रिया में शामिल हैं। इनमें कई ऐसे उत्पाद हैं जिनका संबंध सीधे आदिवासी जीवन, पारंपरिक कृषि और स्थानीय खाद्य संस्कृति से है।
राज्य सरकार का मानना है कि GI टैग केवल एक कानूनी पहचान नहीं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और प्रचार का प्रभावी माध्यम है। इससे स्थानीय उत्पादों को वैश्विक मंच मिलेगा और पारंपरिक ज्ञान को नई पीढ़ियों तक पहुंचाने में भी मदद मिलेगी। सरकार ने स्पष्ट किया है कि झारखंड की सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण, संवर्धन और वैश्विक प्रचार-प्रसार के लिए प्रयास लगातार जारी रहेंगे, ताकि राज्य के कारीगरों, बुनकरों और आदिवासी समुदायों को समृद्धि का नया मार्ग मिल सके।
वर्ष 2019 में जहां राज्य को केवल एक GI टैग प्राप्त था, वहीं आज 12 उत्पादों तक पहुंचना झारखंड की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। इससे राज्य के पारंपरिक उत्पादों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलने की उम्मीद है।
