एक देश, एक निर्वाचन आयोग, फिर बिहार-झारखंड में SIR के दो नियम क्यों? JMM ने उठाये बड़े सवाल

RANCHI

झारखंड में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं। मतदाता सूची के सत्यापन और शुद्धिकरण के उद्देश्य से चलाए जा रहे अभियान में बिहार और झारखंड के बीच अलग-अलग प्रक्रियाएं अपनाए जाने पर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। सवाल यह उठ रहा है कि जब दोनों राज्यों में प्रक्रिया का संचालन एक ही भारत निर्वाचन आयोग के निर्देशों के तहत हो रहा है, तो दस्तावेज जमा करने के नियमों में अंतर क्यों है।

बिहार में SIR के दौरान निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया था कि मतदाता गणना प्रपत्र के साथ अपने स्वप्रमाणित दस्तावेज भी बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) को सौंपेंगे। इससे मतदाता सत्यापन की प्रक्रिया प्रारंभिक स्तर पर ही पूरी करने का प्रयास किया गया था। वहीं झारखंड में अब यह कहा जा रहा है कि गृह-गणना या प्रारंभिक गणना चरण में किसी प्रकार के दस्तावेज नहीं लिए जाएंगे और आवश्यकता पड़ने पर बाद में दस्तावेज मांगे जाएंगे।

इसी अंतर को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। जानकारों का कहना है कि यदि निर्वाचन आयोग के पास पहले से ही संभावित विसंगतियों (Anomaly) और Unmapped मतदाताओं की पहचान संबंधी जानकारी उपलब्ध है, तो आवश्यक दस्तावेज गृह-गणना के दौरान ही क्यों नहीं एकत्र किए जा सकते। इससे सत्यापन प्रक्रिया अधिक सरल और पारदर्शी बन सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बिहार मॉडल की तरह प्रारंभिक चरण में ही दस्तावेज जमा करने की सुविधा दी जाए, तो मतदाताओं को बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। खासकर प्रवासी श्रमिकों, दूरदराज क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और बुजुर्ग मतदाताओं को इससे काफी राहत मिल सकती है। इसके अलावा बाद में जारी होने वाले नोटिसों की संख्या भी कम हो सकती है और पात्र मतदाताओं के नाम सूची से हटने की आशंकाएं भी घट सकती हैं।

झारखंड जैसे राज्य में, जहां बड़ी संख्या में लोग रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में रहते हैं, दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया को अधिक सुविधाजनक बनाने की मांग उठ रही है। मतदाता अधिकारों से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि मतदाता सूची की शुद्धता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह सुनिश्चित करना भी है कि किसी पात्र नागरिक का नाम प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता के कारण प्रभावित न हो।

चुनावी प्रक्रिया पर नजर रखने वाले कई जानकारों का मानना है कि निर्वाचन आयोग को दोनों राज्यों में अपनाई जा रही प्रक्रियाओं की समीक्षा करनी चाहिए। यदि बिहार में दस्तावेज संग्रहण का मॉडल प्रभावी माना गया है, तो झारखंड में भी मतदाता-अनुकूल व्यवस्था लागू करने पर विचार किया जा सकता है। इससे सत्यापन प्रक्रिया अधिक सहज, पारदर्शी और नागरिक हितैषी बन सकती है।

हालांकि निर्वाचन आयोग का उद्देश्य मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाना और फर्जी या दोहरे नामों की पहचान करना है, लेकिन इस प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं की सुविधा और उनके मताधिकार की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यही कारण है कि बिहार और झारखंड में अलग-अलग नियमों को लेकर अब सार्वजनिक बहस तेज होती दिखाई दे रही है।

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