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चार पीढ़ियां, दो सत्र और एक साझा संवाद—टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर के जुलाई चैप्टर में सिनेमा संस्कृति और विजुअल स्टोरीटेलिंग पर हुई गंभीर चर्चा
NEW DELHI
न्यू दिल्ली फिल्म फाउंडेशन (NDFF)द्वारा आयोजित मासिक सिनेमा संवाद श्रृंखला‘टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर (TCOTF)’केजुलाई चैप्टरका आयोजन शनिवार कोइंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव स्किल्स (IICS), लाजपत नगरमें हुआ।श्री अरबिंदो सेंटर फॉर आर्ट्स एंड क्रिएटिविटी (SACAC)तथामीडिया एंड एंटरटेनमेंट स्किल काउंसिल (MESC)के सहयोग से आयोजित इस विशेष सत्र में फिल्मकारों, अभिनेताओं, लेखकों, सिनेमैटोग्राफरों, मीडिया प्रोफेशनल्स, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा सिनेमा में रुचि रखने वाले अनेक युवाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
कार्यक्रम का उद्देश्य केवल फिल्मों पर चर्चा करना नहीं, बल्कि सिनेमा और समाज, संस्कृति, तकनीक तथा रचनात्मक अभिव्यक्ति के बदलते संबंधों को समझना था। पूरे आयोजन के दौरान प्रतिभागियों ने विभिन्न विषयों पर खुलकर संवाद किया और यह साझा किया कि बदलते समय में सिनेमा की भूमिका पहले से कहीं अधिक व्यापक और प्रभावशाली हो गई है।
कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुएन्यू दिल्ली फिल्म फाउंडेशनके संस्थापक एवं महासचिवआशीष के. सिंहने कहा कि NDFF का उद्देश्य केवल फिल्म प्रदर्शन या फिल्म निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्किसार्थक सिनेमा के लिए एक जीवंत संवाद और सीखने की संस्कृति विकसित करनाहै। उन्होंने कहा कि अच्छी फिल्में केवल कैमरे से नहीं, बल्कि जिज्ञासा, संवेदनशीलता और समाज को समझने की दृष्टि से जन्म लेती हैं। उन्होंने हाल ही मेंPRITHVI – The Palaeoscience Film Festival of Indiaमें NDFF कीFilm Partnerके रूप में भागीदारी तथा राष्ट्रीय पैनल चर्चा में सहभागिता का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्था लगातार ऐसे मंचों से जुड़ रही है जहाँ सिनेमा समाज, विज्ञान, पर्यावरण और जनसंचार के साथ नए रिश्ते स्थापित कर सके। उन्होंने यह भी बताया कि NDFF का‘Make Cinema Campaign’अब अगले चरण में प्रवेश कर रहा है और इसके अंतर्गत पहली शॉर्ट फिल्म जल्द ही निर्माण प्रक्रिया में जाएगी।

कार्यक्रम की शुरुआत हमेशा की तरह वॉर्म अप सत्र के साथ हुई, जिसमें इस आयोजन में आए तमाम प्रतिभागियों ने परिचय के साथ आज के सिनेमा को लेकर अपने विचार व्यक्त किए। मुख्य कार्यक्रम का पहला सत्र Craft & Crewथा, जिसमें प्रख्यात सिनेमैटोग्राफर एवं विजुअल स्टोरीटेलरकौस्तुभ मुखर्जीनेVisual Storytelling & Visual Communicationविषय पर संवाद और मास्टरक्लास के माध्यम से बताया कि प्रभावशाली सिनेमा केवल तकनीक से नहीं, बल्कि दृष्टि, संवेदना और फ्रेम की समझ से निर्मित होता है।
उन्होंनेVisual Storytelling & Visual Communicationके दो महत्वपूर्ण पक्षों—दर्शकऔरफिल्मकार—पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि किसी दृश्य को देखने का हर दर्शक का अपना दृष्टिकोण होता है और सिनेमा की यही खूबसूरती है कि एक ही फ्रेम अलग-अलग लोगों में अलग-अलग अर्थ और भावनाएँ पैदा कर सकता है।Children of Men, Mission: Impossible-2और मराठी फिल्मतोड़ाके दृश्य दिखाते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह एक ही मानवीय भावना—डर (Fear)—को अलग-अलग सिनेमाई भाषा में व्यक्त किया जा सकता है। उन्होंने फिल्मकारों से कहा कि अच्छी सिनेमैटोग्राफी कैमरे से पहलेऑब्ज़र्वेशनसे शुरू होती है और प्रभावशाली दृश्य लेखन (Visual Writing) ही दर्शकों को कहानी से गहराई से जोड़ता है।
कार्यक्रम का दूसरा मुख्य सत्र स्पॉटलाइट सेशन था, जिसमें वरिष्ठ सिनेप्रेमी एवं सिनेविद्संदीप पाहवाने दिल्ली की बदलती सिनेमा संस्कृति, दर्शकों के अनुभव तथा सिंगल स्क्रीन से लेकर OTT युग तक के सफर पर अपने संस्मरण और विचार साझा किए।
उन्होंने खासकर भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर से जुड़ी दुर्लभ स्मृतियाँ और अनुभव साझा किए। दिल्ली में सिंगल स्क्रीन के दौर के सिनेमा के बारे में कई रोचक जानकारियों के साथ-साथ उन्होने मुंबई और इंडस्ट्री के बारे में कई दिलचस्प जानकारियां दीं। उन्होंने बताया कि 50 के दशक में उनके पिताबसंत पाहवाने अपनी फिल्म‘बहू‘के माध्यम सेशक्ति सामंतको बतौर निर्देशक पहला अवसर दिया, जिन्होंने आगे चलकर भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय लिखा। उन्होंने दिल्ली और आसपास के शहरों की सिनेमा संस्कृति, पहला दिन–पहला शो, हाउसफुल, ब्लैक में टिकट, तथागाइड, आनंदऔरशोलेजैसी फिल्मों की रिलीज़ से जुड़े कई रोचक प्रसंग सुनाए। उन्होंने कहा कि पहले सिनेमा समाज के हर वर्ग का साझा सांस्कृतिक अनुभव हुआ करता था, जबकि आज दर्शकों की वर्गीय संरचना और फिल्म देखने का तरीका दोनों बदल चुके हैं।
आयोजन की विशेषता यह रही कि इसमें लगभग12 वर्ष से 80 वर्षतक की चार पीढ़ियों के सिनेप्रेमियों ने एक साथ भाग लिया। वरिष्ठ उद्योगपतिअनूप गुप्ताने अपने बचपन की याद साझा करते हुए बताया कि मुंबई मेंमुग़ल-ए-आज़़मके प्रसिद्धशीश महलसेट को देखने का अनुभव आज भी उनकी स्मृतियों में ताज़ा है। भारतीय फिल्म विरासत के संरक्षण में सक्रिय संस्थाCinemaziकी संस्थापकआशा बत्राने भी संदीप पाहवा से उस दौर के सिनेमा पर महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे। वहीं पुणे से आई फिल्म स्कॉलरविभा झाने नई पीढ़ी, विशेषकरGen Z, के साथ विशेष संवाद कर उनकी सिनेमा देखने की आदतों और ऑडियो-विजुअल संस्कृति पर बातचीत की। इससे आयोजन एक सामान्य व्याख्यान न रहकरचार पीढ़ियों के बीच जीवंत सांस्कृतिक संवादका मंच बन गया।
सत्र के दौरान प्रतिभागियों ने फिल्म निर्माण, बदलती दर्शक संस्कृति, विजुअल लैंग्वेज तथा सिनेमा के सामाजिक प्रभाव पर खुलकर चर्चा की। आयोजन का समापन इस विश्वास के साथ हुआ किसार्थक सिनेमा केवल अच्छी फिल्मों से नहीं, बल्कि निरंतर संवाद, सीखने और रचनात्मक सहयोग की संस्कृति से विकसित होता है, औरTalk Cinema On The Floorइसी दिशा में एक निरंतर प्रयास है।
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