Surendra Kujur
जब भी हम अपने समाज की संस्कृति, परंपरा और विरासत की बात करते हैं, तब अक्सर गीत, संगीत और नृत्य को केवल मनोरंजन के रूप में देख लिया जाता है। लेकिन यदि हम अपने पूर्वजों द्वारा निर्मित रागों, तालों और नृत्य शैलियों को गहराई से समझने का प्रयास करें, तो हमें पता चलेगा कि यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवन-दर्शन, सामाजिक व्यवस्था और प्रकृति विज्ञान का जीवंत दस्तावेज है।
मैं आज विशेष रूप से धूड़िया रागे की बात करना चाहता हूं, जो सरहुल पर्व के अवसर पर गाया और नाचा जाने वाला एक महत्वपूर्ण कुड़ूख राग है। जितना मैं इसके बारे में सोचता हूं, उतना ही मुझे अपने पूर्वजों की बुद्धिमत्ता, उनकी वैज्ञानिक सोच और प्रकृति के साथ उनके गहरे संबंध पर आश्चर्य होता है।
आज दुनिया आधुनिक विज्ञान, गणित और तकनीक पर गर्व करती है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे पूर्वजों ने भी अपने ज्ञान को पुस्तकों में नहीं, बल्कि जीवन के व्यवहार, गीतों, नृत्यों और परंपराओं में संजोया था। उन्होंने मौसम के अनुसार राग बनाए, समय के अनुसार गीत बनाए और प्रकृति के अनुसार जीवन की व्यवस्था बनाई।
सरहुल केवल एक पर्व नहीं है। यह धरती, जंगल, जल, हवा और समस्त जीव-जगत के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। यह वह समय है जब प्रकृति स्वयं नवजीवन धारण करती है। पेड़ों पर नई पत्तियां आती हैं, फूल खिलते हैं और धरती पुनः सज जाती है। इसी नवजीवन के उत्सव में हमारे पूर्वजों ने धूड़िया जैसे रागों का निर्माण किया।
धूड़िया रागे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह हमें सामूहिकता का पाठ पढ़ाता है। जब अखड़ा में मांदर, नगाड़ा और घंटा बीच में रख दिए जाते हैं और लोग बिना वाद्ययंत्र की ध्वनि के एक साथ कदम बढ़ाते हैं, तब पहली दृष्टि में यह साधारण लग सकता है। लेकिन यदि हम ध्यान से देखें तो समझ में आता है कि प्रत्येक कदम, प्रत्येक मोड़ और प्रत्येक गति के पीछे एक निश्चित लय, एक निश्चित मात्रा और एक अदृश्य गणित कार्य कर रहा है।
यही वह बिंदु है जहां धूड़िया रागे केवल कला नहीं रह जाता, बल्कि विज्ञान का स्वरूप धारण कर लेता है।
यह रहा आपका संपादित शेष भाग। सभी चंद्रबिंदुओं को बिंदु (ं) में बदल दिया गया है और केवल आवश्यक भाषागत सुधार किए गए हैं, मूल शैली और भाव को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है।
आज के गणितज्ञ संख्याओं में पैटर्न खोजते हैं, लेकिन हमारे पूर्वजों ने पैटर्न को जीवन में उतारा था। उन्होंने 4 मात्रा, 6 मात्रा, 8 मात्रा की तालें बनाई और उनके अनुरूप नृत्य विकसित किए। बिना किसी लिखित ग्रंथ के पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह ज्ञान हस्तांतरित होता रहा। यह मौखिक विश्वविद्यालय था, जहां प्रकृति शिक्षक थी और समाज उसका विद्यालय।
मुझे कई बार ऐसा लगता है कि धूड़िया रागे का जन्म केवल मनुष्य की कल्पना से नहीं हुआ होगा। इसके पीछे प्रकृति का गहरा प्रभाव अवश्य रहा होगा।
जंगल में रहने वाले पक्षियों के समूह को देखिए। एक पक्षी आवाज लगाता है और पूरा झुंड उसी लय में उड़ने लगता है। कोई लिखित आदेश नहीं, कोई पदानुक्रम नहीं, कोई दबाव नहीं। फिर भी पूरा समूह एक दिशा में आगे बढ़ता है। यह सामूहिक चेतना है।
धूड़िया रागे में भी कुछ ऐसा ही दिखाई देता है। एक व्यक्ति स्वर उठाता है, फिर पूरा समूह उसी लय में जुड़ जाता है। कोई बड़ा नहीं, कोई छोटा नहीं। कोई ऊंचा नहीं, कोई नीचा नहीं। सब एक वृत्त में, एक पंक्ति में, एक लय में।
यही तो आदिवासी दर्शन है।
जब दुनिया जाति, वर्ग, ऊंच-नीच और भेदभाव में उलझी हुई थी, तब आदिवासी अखड़ा बराबरी का विद्यालय था। वहां सभी एक साथ नाचते थे, एक साथ गाते थे और एक साथ जीवन का उत्सव मनाते थे। जन्म से मृत्यु तक की सभी सामाजिक व्यवस्थाओं में सामूहिकता और सहभागिता दिखाई देती है।
इसलिए जब कोई आदिवासी नृत्य को केवल मनोरंजन समझता है, तो वह उसकी आत्मा को नहीं समझ पाता।
अखड़ा केवल नृत्य का मैदान नहीं है। वह लोकतंत्र का पहला विद्यालय है। वह सामाजिक न्याय का पहला मंच है। वह सामूहिक निर्णय लेने की पहली संसद है। वह संस्कृति का पहला विश्वविद्यालय है।
दुर्भाग्य की बात है कि आज हम आधुनिकता की दौड़ में अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। हम अपने बच्चों को दुनिया का इतिहास पढ़ा रहे हैं, लेकिन अपने गांव का इतिहास नहीं। हम विदेशी संगीत सीख रहे हैं, लेकिन अपने रागों का अर्थ नहीं जानते। हम आधुनिक तकनीक सीख रहे हैं, लेकिन अपने बुजुर्गों के अनुभवों को रिकॉर्ड नहीं कर रहे।
हमारे दादा-दादी, नाना-नानी, आयो-बाबा केवल परिवार के सदस्य नहीं हैं। वे चलते-फिरते पुस्तकालय हैं। उनके पास हजारों वर्षों का संचित ज्ञान है। यदि हमने समय रहते उस ज्ञान को नहीं सीखा और सुरक्षित नहीं किया, तो हमारे साथ हमारी सभ्यता का एक बड़ा हिस्सा भी समाप्त हो जाएगा।
आज आवश्यकता केवल संस्कृति बचाने की नहीं है, बल्कि संस्कृति को समझने की है। आवश्यकता केवल नृत्य करने की नहीं है, बल्कि नृत्य के दर्शन को समझने की है। आवश्यकता केवल गीत गाने की नहीं है, बल्कि गीतों में छिपे इतिहास को पहचानने की है।
धूड़िया रागे हमें यह सिखाता है कि जीवन में आगे बढ़ना है तो अकेले नहीं, बल्कि समुदाय के साथ चलना होगा। प्रकृति का सम्मान करना होगा। समानता को अपनाना होगा। अपनी जड़ों को पहचानना होगा।
जिस दिन हम अपने रागों, गीतों, नृत्यों और परंपराओं के पीछे छिपे ज्ञान को समझ लेंगे, उस दिन हमें यह एहसास होगा कि हमारे पूर्वज केवल जंगलों में रहने वाले लोग नहीं थे, बल्कि वे प्रकृति, समाज, गणित, संगीत और मानवता के महान ज्ञाता थे।
आइए, हम अपने पूर्वजों की इस अमूल्य धरोहर पर गर्व करें, उसे समझें, उसे लिखें, उसे रिकॉर्ड करें और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं।
क्योंकि जो समाज अपनी स्मृतियों को खो देता है, वह धीरे-धीरे अपनी पहचान भी खो देता है।
जोहार।
लेखक परिचय : सुरेंद्र कुजूर
सुरेंद्र कुजूर प्रख्यात सिनेमैटोग्राफर, गीतकार एवं गायक हैं। वे पिछले दो दशकों से रांची में रहकर अपनी कला और रचनात्मक कार्यों के माध्यम से आदिवासी संस्कृति, परंपराओं और लोक धरोहर के संरक्षण, संग्रहण तथा उन्हें देश-दुनिया तक पहुंचाने के लिए निरंतर सक्रिय हैं। उनकी प्रतिबद्धता आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान और ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ियों तक सहेजकर पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।
