Kokrajhar
बोडोलैंड जनजाति सुरक्षा मंच (बीजेएसएम) ने चिरांग जिले के मोजाबारी गांव में आदिवासी भूमि अधिकारों की रक्षा को लेकर राज्यपाल और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। संगठन का आरोप है कि वर्षों से गैर-आदिवासी लोगों द्वारा अवैध कब्जे के कारण कई बोडो परिवारों को अपनी पुश्तैनी जमीन और गांव छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
राज्यपाल और बीटीसी प्रशासन को सौंपा गया विस्तृत ज्ञापन
सोमवार को बीजेएसएम के प्रतिनिधिमंडल ने असम के राज्यपाल, बीटीसी के भूमि राजस्व विभाग के कार्यकारी सदस्य तथा चिरांग के उपायुक्त को ज्ञापन सौंपा। संगठन ने सिडली राजस्व सर्कल के अंतर्गत आने वाले मोजाबारी गांव के वैध बोडो आदिवासी पट्टाधारकों के भूमि अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और अतिक्रमण हटाने की मांग की।
ज्ञापन पर संगठन के कार्यकारी अध्यक्ष डीडी नर्ज़री और सलाहकार बिरेन्द्र बसुमतारी के हस्ताक्षर हैं। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक स्तर पर अतिक्रमण की पुष्टि होने के बावजूद प्रभावित परिवारों को अब तक कोई ठोस राहत नहीं मिल सकी है।
रेलवे परियोजना के मुआवज़े को लेकर भी जताई चिंता
बीजेएसएम ने कोकराझार को भूटान से जोड़ने वाली प्रस्तावित नॉर्थईस्ट फ्रंटियर रेलवे परियोजना को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। संगठन का कहना है कि भूमि अधिग्रहण के दौरान मुआवज़ा केवल आधिकारिक अभिलेखों में दर्ज वास्तविक पट्टाधारकों को ही दिया जाना चाहिए।
संगठन ने मांग की कि मुआवज़ा वितरण से पहले भूमि रिकॉर्ड का गहन सत्यापन किया जाए और रेलवे कॉरिडोर के भीतर हाल के वर्षों में लगाए गए पौधों तथा व्यावसायिक फसलों की भी जांच हो, ताकि किसी प्रकार के फर्जी अथवा अवैध दावों को रोका जा सके।
अवैध कब्जाधारियों को हटाने और भूमि लौटाने की मांग
बीजेएसएम ने अपने ज्ञापन में अधिसूचित आदिवासी क्षेत्रों से अवैध कब्जाधारियों को तत्काल हटाने, वैध बोडो आदिवासी परिवारों को उनकी जमीन का पुनः कब्जा दिलाने और उनके संवैधानिक व कानूनी अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है।
संगठन ने यह भी कहा कि वर्षों से लंबित भूमि विवाद की व्यापक जांच कर सक्षम अधिकारियों की रिपोर्ट को शीघ्र लागू किया जाना चाहिए, ताकि प्रभावित परिवारों को न्याय मिल सके और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता
मोजाबारी का मामला अब बोडोलैंड क्षेत्र में आदिवासी भूमि संरक्षण के बड़े मुद्दे के रूप में उभर रहा है। स्थानीय संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तो मूल निवासियों के भूमि अधिकारों और सांस्कृतिक अस्तित्व पर गंभीर असर पड़ सकता है।
