केंद्र ने राज्यों से छीना खनिज पर सेस लगाने का अधिकार, झारखंड समेत कई राज्य प्रभावित

 

 

2024 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के अधिकार को माना था, अब संसद के नए कानून से खनिज-युक्त जमीन पर टैक्स और सेस लगाने का रास्ता बंद

RANCHI

खनिज संपदा से समृद्ध झारखंड को केंद्र सरकार के नए कदम से बड़ा वित्तीय झटका लग सकता है। संसद ने Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 को मंजूरी दे दी है। नए प्रावधानों के तहत राज्यों के लिए खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त जमीन पर अलग से टैक्स, सेस या अन्य लेवी लगाने का रास्ता सीमित हो जाएगा।

इसका सीधा असर झारखंड जैसे उन राज्यों पर पड़ेगा, जहां खनिज संसाधन राज्य की अर्थव्यवस्था और सरकारी राजस्व का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। खास तौर पर झारखंड का Mineral Bearing Land Cess इस पूरे विवाद के केंद्र में रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद झारखंड ने बनाया था कानून

दरअसल, जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि राज्यों के पास खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने की विधायी शक्ति है। इसके बाद झारखंड ने खनिज-युक्त जमीन पर सेस लगाने के लिए Jharkhand Mineral Bearing Land Cess Act, 2024 बनाया था।

झारखंड सरकार का तर्क था कि राज्य में खनन से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान, विस्थापन, बुनियादी ढांचे पर दबाव और स्थानीय लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव की भरपाई के लिए अतिरिक्त राजस्व की जरूरत है।

लेकिन अब संसद से पारित नए संशोधन के बाद राज्यों की इस तरह की लेवी लगाने की शक्ति पर रोक लगने की स्थिति बन गई है।

झारखंड को हर साल करोड़ों रुपये के राजस्व का झटका

उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, झारखंड को 2024-25 में खनिज सेस से करीब 1,380 करोड़ रुपये की आय हुई थी। नए प्रावधान लागू होने के बाद इस स्रोत से राज्य की भविष्य की आय प्रभावित हो सकती है। हालांकि अलग-अलग आकलनों में संभावित नुकसान की राशि अलग बताई गई है, इसलिए इसे केवल 1,380 करोड़ रुपये का निश्चित वार्षिक नुकसान मानना सही नहीं होगा।

झारखंड के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य की बड़ी आबादी और बड़ी संख्या में जिले प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खनन गतिविधियों से जुड़े हैं। ऐसे में खनिज से मिलने वाला अतिरिक्त राजस्व स्थानीय विकास, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरणीय क्षति की भरपाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था।

सिर्फ झारखंड नहीं, कई खनिज राज्य होंगे प्रभावित

केंद्र के इस कदम का असर केवल झारखंड तक सीमित नहीं रहेगा। ओडिशा, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और गोवा जैसे खनिज संपदा वाले राज्यों पर भी इसका असर पड़ सकता है। केरल ने भी राज्यों के अधिकार सीमित करने वाले इन प्रावधानों का विरोध करने की बात कही है। हालांकि सभी राज्यों पर प्रभाव समान नहीं होगा। सबसे ज्यादा असर उन राज्यों पर पड़ेगा जो खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त जमीन पर अतिरिक्त राजस्व लगाने की व्यवस्था कर रहे थे या भविष्य में ऐसा करना चाहते थे।

मामला सिर्फ सेस का नहीं, राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता का भी

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू केंद्र-राज्य संबंध है। 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों की खनिज कर लगाने की शक्ति को मान्यता दी थी। अब संसद के कानून के जरिए उस शक्ति पर सीमा लगाई जा रही है। यही वजह है कि इसे केवल खनन कंपनियों पर टैक्स या सेस का मुद्दा नहीं माना जा रहा। विपक्ष और राज्य सरकारों की ओर से इसे राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और संघीय ढांचे से जोड़कर देखा जा रहा है।

झारखंड के लिए चुनौती इसलिए बड़ी है क्योंकि राज्य के पास कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, यूरेनियम और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों का बड़ा भंडार है। खनिज संपदा से मिलने वाले राजस्व में किसी अतिरिक्त स्रोत के बंद होने का असर सीधे राज्य के वित्तीय संसाधनों पर पड़ सकता है।

अब नजर इस बात पर होगी कि झारखंड समेत खनिज-समृद्ध राज्य नए कानून के खिलाफ क्या कानूनी और राजनीतिक कदम उठाते हैं और क्या यह मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचता है।

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