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2025 में (खासकर मई 2025 में) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य सरकारी अधिकारियों ने दावा किया था कि भारत जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है (लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर या उससे अधिक के आंकड़ों के आधार पर)। अब IMF के ताजा आंकड़ों से पता चला है कि जापान और यूके भारत से आगे निकल गए हैं, इसलिए भारत छठे स्थान पर आ गया है। 11 अगस्त 2026 को वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने राज्यसभा में लिखित जवाब देकर साफ-साफ स्वीकार किया कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की अप्रैल 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की नॉमिनल GDP महज 3.92 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर रही। इससे भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रह गया।
ये वही सरकार है जिसने पिछले साल जनता के बीच ये संदेश फैलाया था कि देश अब चौथे पायदान पर पहुंच चुका है और तीसरे की राह देख रहा है। प्रधानमंत्री समेत कई मंत्रियों और अधिकारियों ने बार-बार ये आंकड़े दोहराए। लेकिन जब संसद में आधिकारिक सवाल आया तो सच्चाई निकल आई—जापान और ब्रिटेन फिर आगे निकल गए और भारत दो पायदान फिसलकर छठे नंबर पर पहुंच गया।
सरकार का बचाव साफ है—रैंकिंग मौजूदा डॉलर एक्सचेंज रेट पर आधारित नॉमिनल GDP से तय होती है। रुपये की कीमत में उतार-चढ़ाव, अन्य देशों की अर्थव्यवस्था में बदलाव और आंकड़ों में संशोधन से रैंकिंग बदल सकती है। लेकिन सवाल ये है कि जब रैंकिंग इतनी अस्थिर और विनिमय दरों पर निर्भर है तो पिछले साल इतने जोर-शोर से “चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था” का दावा क्यों किया गया? जनता को क्या संदेश देना चाहा जा रहा था?
विपक्ष ने तुरंत हमला बोला। सवाल उठाया गया—क्या मंत्री की कुर्सी जाएगी? क्योंकि 27 मई 2025 को प्रधानमंत्री खुद गांधीनगर में कह रहे थे कि भारत चौथी अर्थव्यवस्था बन चुका है, और अब 11 अगस्त 2026 को उनका ही राज्य मंत्री संसद में छठा स्थान बता रहा है।
हकीकत ये है कि भारत की वास्तविक GDP वृद्धि दर अभी भी मजबूत है—वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 7.7 प्रतिशत। ये विकास दर प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में ऊंची बनी हुई है। लेकिन नॉमिनल GDP की वैश्विक रैंकिंग में गिरावट साफ दिखाती है कि डॉलर में मापने पर तस्वीर कितनी बदल जाती है।
सरकार अब कह रही है कि कृषि, मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और MSME पर फोकस जारी है। लेकिन जनता के सामने सवाल बाकी है—जब आंकड़े इतने बदल सकते हैं तो बड़े-बड़े दावे करने से पहले कितनी सावधानी बरती गई? संसद में आई सच्चाई ने एक बार फिर याद दिला दिया कि आर्थिक उपलब्धियों के प्रचार और अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों की हकीकत के बीच फासला कभी-कभी काफी बड़ा हो जाता है।
