आदिवासी संगठनों का ऐलान: परिसीमन के नाम पर ST सीटों में कटौती बर्दाश्त नहीं, रांची में होगा महाजुटान

Ranchi

विभिन्न आदिवासी संगठनों और आदिवासी सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि परिसीमन के नाम पर अनुसूचित जनजाति (एसटी) आरक्षित सीटों में किसी भी प्रकार की कटौती की कोशिश का पुरजोर विरोध किया जाएगा। शुक्रवार को प्रेस क्लब, रांची में आयोजित संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में नेताओं ने कहा कि आदिवासी समाज अपने संवैधानिक अधिकारों, जमीन, संस्कृति और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा।

प्रेस वार्ता में मुख्य प्रवक्ता लक्ष्मीनारायण मुंडा, केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष अजय तिर्की, रमा खलखो, गलैडशन डूंगडूग और शशी पन्ना मौजूद रहे। वक्ताओं ने कहा कि पिछले 75 वर्षों से पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में अनुच्छेद 244 के तहत आदिवासियों को मिले संवैधानिक अधिकारों की लगातार अनदेखी की गई है और जब तक इन ऐतिहासिक अन्यायों का हिसाब नहीं होता, तब तक परिसीमन की कोई भी प्रक्रिया आदिवासी हितों के खिलाफ नहीं होनी चाहिए।

पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों की अनदेखी का आरोप

आदिवासी नेताओं ने कहा कि भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्रों में विशेष शक्तियां प्रदान करती है। इनमें भूमि हस्तांतरण पर रोक, गैर-आदिवासियों के प्रवेश को नियंत्रित करना तथा आदिवासी हितों की रक्षा सुनिश्चित करना शामिल है। इसके बावजूद दशकों से इन संवैधानिक प्रावधानों को प्रभावी रूप से लागू नहीं किया गया।

वक्ताओं ने आरोप लगाया कि झारखंड में छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट (CNT) और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट (SPT) का खुलेआम उल्लंघन हुआ है। फर्जी दस्तावेजों, जालसाजी, अवैध कब्जों तथा प्रशासनिक मिलीभगत के माध्यम से लाखों एकड़ आदिवासी भूमि पर अतिक्रमण किया गया।

विस्थापन और जनसांख्यिकीय बदलाव पर उठाए सवाल

प्रेस वार्ता में कहा गया कि वर्ष 1951 से 1960 के बीच विकास परियोजनाओं के कारण करीब 85 लाख आदिवासी विस्थापित हुए, जो देश में कुल विस्थापित आबादी का 40 से 60 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि राष्ट्रीय आबादी में आदिवासियों की हिस्सेदारी केवल 8.6 प्रतिशत है।

नेताओं ने कहा कि पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) और वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) जैसे महत्वपूर्ण कानून भी व्यवहारिक स्तर पर प्रभावी नहीं हो सके। ग्राम सभाओं की सहमति और अधिकारों की लगातार अनदेखी की गई, जिससे आदिवासी समुदाय की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना को गंभीर क्षति पहुंची।

परिसीमन की आड़ में आरक्षित सीटें घटाने की आशंका पर चिंता

आदिवासी संगठनों ने कहा कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन की प्रक्रिया में एसटी आरक्षित सीटों के अनुपात में कमी की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि यदि संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन, भूमि लूट, जबरन विस्थापन और जनसांख्यिकीय बदलाव के लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराए बिना परिसीमन किया गया, तो यह आदिवासियों के साथ एक और ऐतिहासिक अन्याय होगा।

नेताओं ने कहा कि आदिवासी आबादी में कमी का कारण प्राकृतिक नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही नीतिगत विफलताएं, अवैध बसावट और भूमि अधिग्रहण हैं। ऐसे में आरक्षित सीटों को कम करना आदिवासी समाज के राजनीतिक अधिकारों पर सीधा हमला माना जाएगा।

आदिवासी संगठनों ने रखीं पांच प्रमुख मांगें

संयुक्त प्रेस वार्ता में आदिवासी संगठनों ने अपनी पांच प्रमुख मांगें भी सार्वजनिक कीं। इनमें परिसीमन के दौरान किसी भी परिस्थिति में एसटी आरक्षित सीटों को कम नहीं करने, बल्कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में सीटों की संख्या बढ़ाने और उन्हें फ्रीज करने की मांग प्रमुख रही।

इसके अलावा CNT और SPT कानूनों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने, पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में गैर-आदिवासी बसावट पर पूर्ण रोक लगाने, राज्यपाल से अपनी संवैधानिक शक्तियों का प्रभावी उपयोग करने तथा पिछले 75 वर्षों में हुए विस्थापन, भूमि लूट और सांस्कृतिक क्षरण की जांच के लिए संसदीय समिति और न्यायिक आयोग गठित करने की मांग भी उठाई गई।

संगठनों ने प्रभावित परिवारों के लिए उचित मुआवजा, पुनर्वास और रोजगार की गारंटी सुनिश्चित करने की भी मांग की।

30 अगस्त को मोरहाबादी मैदान में महाजुटान का आह्वान

प्रेस वार्ता के दौरान आगामी 30 अगस्त 2026 को दोपहर 12 बजे मोरहाबादी मैदान, रांची में आदिवासी एकता का महाजुटान आयोजित करने की घोषणा की गई। नेताओं ने कहा कि यह केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन, संस्कृति और संवैधानिक अस्तित्व की रक्षा का व्यापक आंदोलन होगा।

उन्होंने आदिवासी समाज से एकजुट होकर पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों को लागू कराने, CNT-SPT कानूनों के कठोर अनुपालन, ग्राम सभाओं को सशक्त बनाने और परिसीमन के नाम पर आरक्षित सीटों में कटौती के हर प्रयास का विरोध करने का आह्वान किया।

राजनीतिक दलों से भी मांगा स्पष्ट रुख

संवाददाता सम्मेलन में मौजूद नेताओं ने सभी राजनीतिक दलों से इस मुद्दे पर अपना स्पष्ट पक्ष सार्वजनिक करने की मांग की। उनका कहना था कि आदिवासी समाज यह जानना चाहता है कि विभिन्न दल परिसीमन और एसटी आरक्षित सीटों के संभावित पुनर्गठन को लेकर क्या सोच रखते हैं।

वक्ताओं ने अंत में नारा दिया—“परिसीमन की साजिश मुर्दाबाद, आदिवासी एकता जिंदाबाद” और कहा कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर व्यापक जनजागरण अभियान चलाया जाएगा, ताकि आदिवासी समुदाय अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित होकर आवाज बुलंद कर सके।

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