Pakud
महेशपुर प्रखंड के चंडालमारा से पाखरिया (पैनम पथ) सड़क चौड़ीकरण और पुनर्निर्माण परियोजना को लेकर भूमि अधिग्रहण में गंभीर अनियमितता का मामला सामने आया है। आरोप है कि सरकारी दस्तावेजों में जहां केवल 10 डिसमिल भूमि अधिग्रहण का उल्लेख किया गया, वहीं विभागीय जांच में करीब 70 डिसमिल भूमि पर सड़क निर्माण के लिए स्थायी कब्जा किए जाने की पुष्टि हुई। इसके बावजूद प्रभावित रैयतों को आज तक उचित मुआवज़ा नहीं मिल पाया है।
2018 में ही विभागीय पत्र ने स्वीकार की थी विसंगति
14 सितंबर 2018 को जिला भू-अर्जन पदाधिकारी, पाकुड़ द्वारा जारी पत्रांक 24/भू०अ० में इस मामले की गंभीरता स्वीकार की गई थी। पत्र में बताया गया कि उज्जवल कुमार मंडल और स्वपन कुमार मंडल ने आवेदन देकर शिकायत की थी कि उनकी 51 डिसमिल भूमि अधिग्रहित की गई, जबकि पथ निर्माण विभाग की अधियाचना में केवल 10 डिसमिल का उल्लेख किया गया था।
इसके बाद अंचल अधिकारी, महेशपुर से कराई गई जांच में सामने आया कि मौजा चंडालमारा, थाना संख्या-91, जमाबंदी संख्या-24 के दाग संख्या-139 की कुल भूमि में से करीब 70 डिसमिल जमीन सड़क चौड़ीकरण के लिए स्थायी रूप से उपयोग में लाई गई है। जांच प्रतिवेदन मिलने के बाद जिला भू-अर्जन पदाधिकारी ने कार्यपालक अभियंता, पथ प्रमंडल, पाकुड़ को पुनः सत्यापन कराने और आवश्यकता पड़ने पर शेष भूमि की नई अधियाचना भेजने का निर्देश दिया था।
तीन-तीन आवेदन, फिर भी नहीं मिला न्याय
मामले को लेकर प्रभावित परिवार और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पाकुड़ उपायुक्त को 9 दिसंबर 2025, 23 दिसंबर 2025 और 19 जून 2026 को अलग-अलग आवेदन देकर लंबित मुआवज़े के भुगतान की मांग की। हालांकि, इन आवेदनों के बाद भी अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है और पीड़ित परिवार न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है।
सामाजिक कार्यकर्ता बी मंडल ने उठाए सवाल
सामाजिक कार्यकर्ता बी मंडल ने सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से पूरे मामले को सार्वजनिक करते हुए प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। उनका कहना है कि जब विभागीय पत्राचार और जांच रिपोर्ट स्वयं अधिक भूमि अधिग्रहण की ओर संकेत कर रही हैं, तो मुआवज़े के भुगतान में वर्षों की देरी आखिर क्यों हो रही है।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आम नागरिक की आवाज केवल आवेदन पत्रों तक सीमित रह जाएगी और क्या सरकारी तंत्र प्रभावित परिवारों को उनका वैधानिक अधिकार दिलाने में विफल साबित हो रहा है।
प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर खड़े हुए प्रश्न
यह मामला केवल मुआवज़े के भुगतान तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है। वर्ष 2018 में अनियमितता सामने आने, 2025 और 2026 में लगातार आवेदन दिए जाने के बावजूद यदि पीड़ितों को उनका हक नहीं मिल रहा है, तो यह व्यवस्था की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क बन चुकी है, जमीन का उपयोग भी वर्षों से हो रहा है, लेकिन जिनकी भूमि गई, उन्हें आज तक उनका वैधानिक मुआवज़ा नहीं मिल पाया। अब सभी की निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं कि आखिर इस लंबे समय से लंबित मामले में कब तक न्याय मिलेगा और जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी।
