TMC में बढ़ी कलह: इस्तीफों, बगावत और सियासी बैठकों के बीच सायोनी व सष्मिता ने पार्टी छोड़ी

Kolkata/New Delhi

तृणमूल कांग्रेस (TMC) इन दिनों अपने सबसे बड़े आंतरिक संकटों में से एक का सामना कर रही है। पार्टी के भीतर बढ़ती असंतुष्टि, नेताओं के लगातार इस्तीफे और बागी खेमे की सक्रियता ने संगठन की एकजुटता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसी बीच राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता को मजबूत करने की कोशिशें भी जारी हैं, जिससे राजनीतिक घटनाक्रम और दिलचस्प हो गया है।

बुधवार को पार्टी दो अलग-अलग मोर्चों पर चुनौतियों से घिरी दिखाई दी। एक ओर वरिष्ठ नेता दिल्ली में INDIA गठबंधन के सहयोगी दलों के साथ संवाद में जुटे रहे, वहीं दूसरी ओर पार्टी के भीतर असंतोष और तेज हो गया। इसी क्रम में अभिषेक बनर्जी की कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ हुई मुलाकात को विपक्षी एकता बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

इस बीच राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव के इस्तीफे ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। इस्तीफे के बाद उनकी असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा से मुलाकात ने कई तरह के कयासों को हवा दी। हालांकि सुष्मिता देव ने स्पष्ट किया कि यह केवल शिष्टाचार मुलाकात थी और वह बंगाल की राजनीति में प्रत्यक्ष रूप से सक्रिय नहीं हैं। राजनीतिक सूत्रों का मानना है कि असम में संभावित चुनावी समीकरणों को देखते हुए उनकी भूमिका भविष्य में महत्वपूर्ण हो सकती है।

सायोनी घोष के बागी खेमे के समर्थन की चर्चा

पार्टी संकट उस समय और गहरा गया जब खबरें सामने आईं कि जादवपुर से सांसद और तृणमूल युवा इकाई की प्रमुख सायोनी घोष ने वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व वाले बागी गुट का समर्थन किया है। सूत्रों के अनुसार, उन्होंने बागी खेमे के नेताओं से संपर्क कर उनके रुख का समर्थन जताया है। हालांकि इस संबंध में आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इन चर्चाओं ने पार्टी के अंदरूनी विवाद को और चर्चा में ला दिया है।

लगातार इस्तीफों से बढ़ी नेतृत्व की चुनौती

पिछले कुछ सप्ताह में पार्टी के कई प्रमुख नेताओं ने अपने पदों से इस्तीफा दिया है। इनमें पूर्व राष्ट्रीय प्रवक्ता शांतनु सेन, असम इकाई के प्रमुख अभिजीत मजूमदार, अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के सचिव अजमल सिद्दीकी और राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर राय जैसे नाम शामिल हैं। इन इस्तीफों ने संगठन के भीतर बढ़ती असंतुष्टि और नेतृत्व के सामने खड़ी चुनौतियों को उजागर किया है।

विश्लेषकों का मानना है कि एक तरफ ममता बनर्जी विपक्षी दलों के बीच तालमेल मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर पार्टी के भीतर बढ़ती बगावत उनके लिए बड़ी राजनीतिक परीक्षा बनती जा रही है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तृणमूल कांग्रेस इस संकट से कैसे उबरती है और क्या नेतृत्व संगठन में एकजुटता कायम रखने में सफल हो पाता है।

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