नागपुरी भाषा-साहित्य के एक युग का अवसान, डॉ कुमारी बासन्ती का निधन

डॉ बीरेन्द्र कुमार महतो 'गोतिया

नागपुरी भाषा और साहित्य जगत के लिए आज का दिन गहरे शोक और आत्ममंथन का है। जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, रांची विश्वविद्यालय, रांची की वरिष्ठ शिक्षिका, प्रतिष्ठित साहित्यकार, प्रखर आलोचक एवं नागपुरी भाषा-साहित्य की आधारस्तम्भ डॉ. कुमारी बासन्ती ने आज पूर्वाह्न अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ ही नागपुरी भाषा-साहित्य का एक सशक्त और जीवंत युग मानो समाप्त हो गया। यह क्षति केवल एक व्यक्तित्व के अवसान तक सीमित नहीं, बल्कि एक विचारधारा, एक संघर्षशील परंपरा और एक सतत भाषायी चेतना के अवरुद्ध हो जाने की पीड़ा है।

डॉ. कुमारी बासन्ती का जीवन नागपुरी भाषा के प्रति समर्पण, संघर्ष और सृजन का अद्वितीय उदाहरण रहा। उन्होंने भाषा को केवल अध्ययन का विषय नहीं माना, बल्कि उसे समाज की आत्मा, संस्कृति की धड़कन और क्षेत्रीय अस्मिता के आधार के रूप में प्रतिष्ठित करने का निरंतर प्रयास किया। रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग में उन्होंने वर्षों तक अपने ज्ञान, अनुशासन और संवेदनशीलता से विद्यार्थियों और शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया। उनके शिष्य उन्हें ‘दीदी’ के रूप में संबोधित करते थे। यह संबोधन उनके स्नेहिल व्यक्तित्व और बौद्धिक नेतृत्व का प्रमाण है।

नागपुरी साहित्य के क्षेत्र में उनका योगदान बहुआयामी और अत्यंत प्रभावशाली रहा। उन्होंने नागपुरी गीत, कहानी और निबंध के माध्यम से भाषा को समृद्ध किया। उनका शोधपरक कार्य ‘नागपुरी गीतों की छंद-रचना’ (सांस्कृतिक अध्ययन) नागपुरी साहित्य की अमूल्य धरोहर है, जिसमें लोकगीतों की संरचना, छंद-विधान और सांस्कृतिक संदर्भों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। उनके निबंध और आलोचनात्मक लेख नागपुरी भाषा के विविध साहित्यिक आयामों को उजागर करते हैं और भाषा के प्रति एक गंभीर, तार्किक तथा तथ्यपरक दृष्टि विकसित करते हैं।

विशेष रूप से यह उल्लेखनीय है कि डॉ. बासन्ती ने केवल लेखन और अध्यापन तक अपने योगदान को सीमित नहीं रखा, बल्कि भाषायी और शैक्षणिक आंदोलनों के माध्यम से जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलाने में अग्रणी भूमिका निभाई। उन्होंने निरंतर यह प्रयास किया कि इन भाषाओं को शिक्षा, शोध और सामाजिक विमर्श में सम्मानजनक मुकाम मिले। उनका यह संघर्ष न केवल नागपुरी, बल्कि समस्त झारखंडी भाषाओं के लिए प्रेरणास्रोत बना।

उनकी सबसे बड़ी पहचान उनकी बेबाकी और निडरता थी। वे सत्य को स्पष्ट और निर्भीक रूप में प्रस्तुत करने का साहस रखती थीं। शैक्षणिक और साहित्यिक विमर्शों में उनकी तार्किकता, स्पष्टवादिता और बौद्धिक ईमानदारी उन्हें एक विशिष्ट स्थान प्रदान करती थी। वे न केवल एक विदुषी थीं, बल्कि एक सजग और प्रतिबद्ध विचारक भी थीं, जिनके लिए भाषा केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न थी।

आज उनके निधन से नागपुरी भाषा-साहित्य ने अपनी एक सशक्त आवाज़, एक मार्गदर्शक शक्ति और एक समर्पित साधक को खो दिया है। यह क्षति निस्संदेह अपूरणीय है। उनके द्वारा स्थापित मानक, उनके विचार और उनका साहित्यिक अवदान आने वाली पीढ़ियों को निरंतर दिशा और प्रेरणा देते रहेंगे।

डॉ. कुमारी बासन्ती का जाना एक गहरी रिक्तता छोड़ गया है, जिसे भर पाना संभव नहीं। वे अपने कार्यों, विचारों और संघर्षों में सदैव जीवित रहेंगी।

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