15 लाख करोड़ रुपये के घोटाले के आरोपों में घिरी राजेश एक्सपोर्ट्स, SEBI की कार्रवाई से मचा हड़कंप

Central desk

देश की प्रमुख स्वर्ण निर्यातक कंपनियों में शामिल राजेश एक्सपोर्ट्स एक बड़े वित्तीय विवाद के केंद्र में आ गई है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने कंपनी और उसके प्रमोटर-चेयरमैन राजेश मेहता के खिलाफ अंतरिम कार्रवाई करते हुए उन्हें प्रतिभूति बाजार में कारोबार करने से रोक दिया है। सेबी का आरोप है कि कंपनी ने पिछले पांच वित्तीय वर्षों के दौरान अपने राजस्व और कुछ वित्तीय लेन-देन से जुड़े तथ्यों को सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किया। हालांकि कंपनी ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उसके वित्तीय आंकड़े पूरी तरह सही हैं और वह जांच एजेंसियों को सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध करा रही है।

यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि सेबी द्वारा उठाया गया सवाल करीब 15.15 लाख करोड़ रुपये के कथित राजस्व अंतर से जुड़ा है। यह राशि इतनी बड़ी है कि कई देशों की वार्षिक अर्थव्यवस्था से भी अधिक मानी जा रही है। यही कारण है कि इस घटनाक्रम ने निवेशकों, वित्तीय विशेषज्ञों और कॉरपोरेट जगत का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।

शेयरधारक की शिकायत के बाद शुरू हुई जांच

इस पूरे मामले की शुरुआत मार्च 2024 में हुई, जब एक शेयरधारक ने सेबी को शिकायत भेजकर कंपनी के वित्तीय विवरणों में दिखाई गई कुछ असामान्य प्रविष्टियों पर सवाल उठाया। शिकायत में विशेष रूप से उन व्यापारिक देयों (ट्रेड रिसीवेबल्स) का उल्लेख किया गया था, जो दो वर्षों से अधिक समय तक बकाया बताए जा रहे थे।

ऐसी स्थिति सामान्यतः किसी भी कंपनी के लिए चिंता का विषय मानी जाती है, क्योंकि इससे भुगतान वसूली, कारोबार की वास्तविकता या लेखांकन प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो सकते हैं। शिकायत मिलने के बाद सेबी ने विस्तृत जांच शुरू की और बाद में फॉरेंसिक ऑडिट कराने का निर्णय लिया।

विदेशी सहायक कंपनियों के आंकड़ों में मिला कथित अंतर

सेबी की जांच के अनुसार वित्तीय वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच राजेश एक्सपोर्ट्स के कुल समेकित राजस्व का 97 से 99 प्रतिशत हिस्सा उसकी विदेशी सहायक कंपनियों से आता दिखाया गया। इनमें सबसे महत्वपूर्ण नाम स्विट्जरलैंड स्थित स्वर्ण रिफाइनरी Valcambi SA का है, जिसे कंपनी के वैश्विक कारोबार की रीढ़ माना जाता है।

फॉरेंसिक जांच के दौरान जब सहायक कंपनियों के रिकॉर्ड और समेकित वित्तीय विवरणों का मिलान किया गया तो कथित तौर पर बड़ा अंतर सामने आया। सेबी का दावा है कि जिन राजस्व आंकड़ों को कंपनी ने सार्वजनिक किया, उनका बड़ा हिस्सा उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर सत्यापित नहीं किया जा सका। नियामक के अनुसार पांच वर्षों में यह अंतर लगभग 15.15 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

यदि जांच के अंतिम चरण में यह आरोप सही साबित होते हैं, तो इसे भारतीय कॉरपोरेट इतिहास के सबसे बड़े कथित वित्तीय खुलासा विवादों में गिना जा सकता है।

जांच के दौरान दस्तावेजों की कमी पर भी सवाल

सेबी ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट में कहा है कि जांच के दौरान कंपनी की ओर से कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए। फॉरेंसिक ऑडिट टीम को कई मामलों में ग्राहकों, आपूर्तिकर्ताओं और विदेशी सहायक कंपनियों से संबंधित पूर्ण रिकॉर्ड नहीं मिले।

नियामक का कहना है कि दस्तावेजों की कमी के कारण कई लेन-देन और राजस्व दावों की स्वतंत्र पुष्टि करना मुश्किल हो गया। यही वजह है कि जांच एजेंसियों को कई पहलुओं पर गहराई से पड़ताल करनी पड़ रही है।

अफ्रीका में 1,035 करोड़ रुपये के निवेश पर भी उठे सवाल

राजस्व विवाद के अलावा सेबी ने अफ्रीका में स्वर्ण खनन परिसंपत्तियों में किए गए 1,035 करोड़ रुपये के निवेश पर भी प्रश्न उठाए हैं। जांच के दौरान नियामक ने इन परिसंपत्तियों के मूल्यांकन, स्वामित्व और अस्तित्व से जुड़े दस्तावेज मांगे थे।

सेबी का कहना है कि उसे पर्याप्त मूल्यांकन रिपोर्ट, परिसंपत्ति विवरण और अन्य सहायक प्रमाण नहीं मिले। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या कंपनी ने अपनी बैलेंस शीट में परिसंपत्तियों का मूल्य वास्तविक स्थिति से अधिक दिखाया।

11 हजार करोड़ रुपये के लेन-देन पर नया विवाद

जांच में एक अन्य महत्वपूर्ण बिंदु एफ्लुएंस शेयर्स एंड स्टॉक्स प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े लेन-देन हैं। सेबी के अनुसार राजेश एक्सपोर्ट्स ने इस संस्था के साथ लगभग 11,487 करोड़ रुपये की बिक्री और 11,488 करोड़ रुपये की खरीद दर्शाई थी।

हालांकि जांच के दौरान संबंधित संस्था ने कथित रूप से ऐसे किसी भी लेन-देन से इनकार कर दिया। संस्था का कहना था कि राजेश एक्सपोर्ट्स कभी उसका ग्राहक नहीं रही और दोनों के बीच इस प्रकार का कोई कारोबारी समझौता नहीं था। इस विरोधाभास को भी सेबी ने गंभीर संकेत माना है।

प्रमोटर के खातों में धन हस्तांतरण के आरोप

सेबी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है कि कंपनी के कुछ फंड प्रमोटर राजेश मेहता के निजी खातों में स्थानांतरित किए गए। जांच में करीब 7.4 करोड़ रुपये के ऐसे लेन-देन का उल्लेख किया गया है।

नियामक का आरोप है कि इन फंड्स का उपयोग निजी डेरिवेटिव ट्रेडिंग गतिविधियों में किया गया और इन लेन-देन को न तो बोर्ड की मंजूरी मिली और न ही इन्हें संबंधित पक्ष लेन-देन (रिलेटेड पार्टी ट्रांजैक्शन) के रूप में सार्वजनिक किया गया। हालांकि इन आरोपों की जांच अभी जारी है।

LIC समेत लाखों निवेशकों की बढ़ी चिंता

राजेश एक्सपोर्ट्स में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले संस्थागत निवेशकों में Life Insurance Corporation of India (LIC) भी शामिल है, जिसके पास कंपनी के लगभग 10.8 प्रतिशत शेयर हैं। चूंकि LIC का निवेश करोड़ों पॉलिसीधारकों की बचत से जुड़ा होता है, इसलिए यह मामला आम निवेशकों के लिए भी महत्वपूर्ण बन गया है।

सेबी का अनुमान है कि कथित अनियमितताओं से शेयरधारकों की संपत्ति में लगभग 12,726 करोड़ रुपये तक का नुकसान हो सकता है। हालांकि अंतिम नुकसान का आकलन जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।

बैंकिंग मोर्चे पर भी बढ़ा दबाव

राजेश एक्सपोर्ट्स केवल बाजार नियामक की जांच का ही सामना नहीं कर रही है, बल्कि बैंकिंग क्षेत्र में भी उसे चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, कंपनी द्वारा भुगतान में चूक के बाद Canara Bank ने अपने लगभग 509 करोड़ रुपये के बकाये को तनावग्रस्त परिसंपत्ति (स्ट्रेस्ड एसेट) की श्रेणी में रखा है और वसूली की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

इससे कंपनी पर वित्तीय दबाव और बढ़ गया है तथा निवेशकों की चिंताएं गहरी हुई हैं।

बाजार में दिखा तत्काल असर

सेबी की अंतरिम कार्रवाई सार्वजनिक होने के बाद निवेशकों की प्रतिक्रिया तुरंत देखने को मिली। कंपनी के शेयर लगातार दो कारोबारी सत्रों में 5 प्रतिशत के लोअर सर्किट पर पहुंच गए। पिछले तीन वर्षों में भी शेयर अपने मूल्य का 80 प्रतिशत से अधिक गंवा चुका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार में भरोसा किसी भी सूचीबद्ध कंपनी की सबसे बड़ी पूंजी होता है और ऐसे आरोप सामने आने पर निवेशकों का विश्वास तेजी से प्रभावित होता है।

कंपनी ने आरोपों को बताया निराधार

राजेश एक्सपोर्ट्स ने अपने आधिकारिक बयान में कहा है कि उसके द्वारा घोषित सभी राजस्व आंकड़े सही हैं और किसी प्रकार का ओवरस्टेटमेंट नहीं किया गया है। कंपनी का कहना है कि सेबी का आदेश केवल अंतरिम प्रकृति का है और अभी तक कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला गया है।

कंपनी ने यह भी कहा है कि वह सभी आवश्यक दस्तावेज नियामक को उपलब्ध करा रही है तथा जांच में पूरा सहयोग कर रही है। इसलिए अंतिम निष्कर्ष आने तक आरोपों को सिद्ध तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

भारतीय कॉरपोरेट गवर्नेंस के लिए अहम मामला

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय कॉरपोरेट गवर्नेंस, ऑडिट प्रणाली, वित्तीय पारदर्शिता और निवेशक सुरक्षा से जुड़े व्यापक सवाल खड़े करता है।

फिलहाल सेबी की जांच जारी है और अंतिम फैसला आना बाकी है। लेकिन यह मामला आने वाले समय में भारतीय शेयर बाजार और कॉरपोरेट नियमन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में दर्ज हो सकता है।

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