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बिहार के गया ज़िले के बिहार-झारखंड बॉर्डर पर बसे गोटीबांध गांव में इन दिनों सन्नाटा और चीख-पुकार साथ-साथ पसरी हुई है। छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार-भाटपारा जिले के बकुलाही इलाके में स्थित एक स्पंज आयरन प्लांट में हुए भीषण हादसे ने इस छोटे से गांव के छह परिवारों की दुनिया उजाड़ दी है।
बीबीसी हिंदी डॉट कॉम की एक रिपोर्ट बताती है, गुरुवार को हुए इस औद्योगिक विस्फोट में मारे गए सभी छह मज़दूर गोटीबांध गांव के रहने वाले थे। हादसे में पांच अन्य मज़दूर भी घायल हुए हैं, जिनमें बिहार और झारखंड के कामगार शामिल हैं। घटना की खबर मिलते ही गांव में लोगों का तांता लग गया, नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों की आवाजाही बढ़ गई, लेकिन जिन घरों से शव उठने हैं, वहां सिर्फ मातम है।
गांव की ख़ुशबू अपने पिता सुंदर भुइया और भाई राजदेव भुइया के शवों का इंतज़ार कर रही हैं। बेसुध हालत में वह कहती हैं कि दोनों पहली बार बाहर कमाने गए थे। राजदेव की शादी हाल ही में हुई थी और उसका दो महीने का बच्चा है। परिवार सरकार से मुआवजे और भविष्य की सुरक्षा की मांग कर रहा है।
मृतकों में शामिल बदरी भुइया के घर का हाल और भी दर्दनाक है। बूढ़ी मां घर के बाहर बैठी बेटे की राह देख रही है। बदरी भुइया अपने घर के सबसे बड़े और पढ़े-लिखे सदस्य थे। इसी घर से दो भाई छत्तीसगढ़ काम करने गए थे, जिनमें से छोटा भाई रामस्वरूप सुरक्षित लौट आया, लेकिन बड़े भाई बदरी की जान नहीं बच सकी।
परिजनों का कहना है कि जनवरी महीने में गांव के 14 लोग एक ठेकेदार के जरिए छत्तीसगढ़ गए थे। ठेकेदार ने 14 हजार रुपये मासिक वेतन और खाने-पीने की सुविधा का भरोसा दिलाया था। गांव के सरपंच पति रामचंद्र यादव के मुताबिक, यह इलाका पिछड़ा, अति पिछड़ा और महादलित आबादी वाला है, जहां मज़दूरी ही आजीविका का मुख्य साधन है।
हादसे के चश्मदीद जोगिंदर भुइया ने बताया कि काम के दौरान अचानक काली गैस निकलने लगी। कुछ ही मिनटों में हालात बेकाबू हो गए। ऊपर की ओर भागने वाले बच गए, लेकिन नीचे की तरफ भागे मज़दूरों की जान चली गई। बाद में पुलिस ने मौके पर पहुंचकर शवों को बाहर निकाला।
इस हादसे ने गांव में डर का माहौल पैदा कर दिया है। कई परिवारों के पुरुष सदस्य बाहर राज्यों में काम कर रहे हैं। सुमंती देवी, जिनके रिश्तेदार की इस हादसे में मौत हुई है, कहती हैं—“बाहर जाने में डर लगता है, लेकिन पेट पालने के लिए जाना मजबूरी है।” यही मजबूरी आज गोटीबांध गांव की सबसे बड़ी सच्चाई बन गई है।
गांव के लोग अब सरकार से सिर्फ मुआवज़ा नहीं, बल्कि ठेकेदारों की जवाबदेही, सुरक्षित कामकाजी हालात और पलायन रोकने के लिए ठोस नीति की मांग कर रहे हैं।
