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भारतीय जनता पार्टी में पिछले कुछ वर्षों में एक नया राजनीतिक ट्रेंड तेजी से उभरकर सामने आया है। पार्टी अब लंबे समय से जुड़े वफादार नेताओं की बजाय उन चेहरों पर ज्यादा भरोसा जता रही है, जो दूसरी पार्टियों से आकर BJP में शामिल हुए हैं। खासकर पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में यह रणनीति साफ तौर पर दिखाई दे रही है।
पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी, असम में हिमंता बिस्वा सरमा और बिहार में सम्राट चौधरी जैसे नेताओं का तेजी से बढ़ता राजनीतिक कद इसी बदलाव का बड़ा उदाहरण माना जा रहा है। इन नेताओं को न केवल संगठन में अहम जिम्मेदारियां मिलीं, बल्कि मुख्यमंत्री जैसे शीर्ष पदों तक भी पहुंचाया गया।
वफादार पीछे, दलबदलुओं को सबसे बड़ा इनाम
बिहार की राजनीति में हाल ही में बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब सम्राट चौधरी को राज्य की राजनीति में सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल कर दिया गया। सम्राट चौधरी पहले RJD और JDU में रह चुके हैं और वर्ष 2017 में BJP में शामिल हुए थे।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनका उभार अमित शाह की सोशल इंजीनियरिंग रणनीति का हिस्सा है। कोइरी समुदाय से आने वाले सम्राट चौधरी को गैर-यादव OBC वोटरों को साधने के लिए अहम चेहरा माना जा रहा है। हालांकि पार्टी के पुराने नेताओं के बीच इस बात को लेकर असंतोष भी बताया जाता है कि वर्षों से पार्टी के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज किया जा रहा है।
दलबदलुओं पर BJP का सबसे बड़ा भरोसा
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा भी BJP की इसी रणनीति का अहम चेहरा माने जाते हैं। कभी कांग्रेस सरकार में प्रभावशाली मंत्री रहे सरमा ने वर्ष 2015 में कांग्रेस छोड़ BJP का दामन थामा था।
इसके बाद उन्होंने पूर्वोत्तर राज्यों में पार्टी के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 2021 में BJP की लगातार दूसरी जीत के बाद उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया। अब वे दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि BJP नेतृत्व ने विचारधारा से ज्यादा चुनाव जिताने की क्षमता और क्षेत्रीय प्रभाव को प्राथमिकता दी है।
वफादारों की मेहनत, मलाई दलबदलुओं के हिस्से
पूर्वोत्तर भारत के कई राज्यों में BJP की सरकारों की कमान ऐसे नेताओं के हाथ में है, जो कभी कांग्रेस से जुड़े रहे थे।
त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा वर्ष 2016 में BJP में शामिल हुए और बेहद कम समय में राज्य अध्यक्ष से मुख्यमंत्री तक का सफर तय कर लिया। उन्होंने बिप्लब कुमार देब की जगह ली, जिन्होंने राज्य में 25 साल पुराने वामपंथी शासन को खत्म कर BJP की पहली सरकार बनाई थी।
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू का मामला भी काफी चर्चित रहा। कांग्रेस छोड़कर BJP में आए खांडू ने राज्य की पूरी राजनीतिक तस्वीर बदल दी और BJP को मजबूत आधार दिलाया।
‘वॉशिंग मशीन’ वाले आरोपों से फिर घिरी BJP
विपक्ष लगातार BJP पर यह आरोप लगाता रहा है कि पार्टी भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे नेताओं को अपने साथ शामिल कर उन्हें राजनीतिक संरक्षण देती है।
पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी को लेकर भी विपक्ष ने यही सवाल उठाए हैं। शुभेंदु ने वर्ष 2020 में तृणमूल कांग्रेस छोड़कर BJP जॉइन की थी। विपक्षी दलों ने नारद स्टिंग ऑपरेशन का हवाला देते हुए BJP पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया है।
शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत ने कहा कि जिन नेताओं के खिलाफ BJP पहले भ्रष्टाचार के आरोप लगाती थी, वही नेता पार्टी में शामिल होने के बाद सम्मानित किए जा रहे हैं।
सम्राट चौधरी पर पुराने विवाद फिर चर्चा में
बिहार में सम्राट चौधरी के बढ़ते प्रभाव के साथ पुराने विवाद भी फिर चर्चा में आ गए हैं। आलोचकों ने 1995 के एक हत्या मामले का जिक्र किया, जिसमें उनका और उनके पिता का नाम FIR में शामिल था। हालांकि बाद में सबूतों के अभाव में दोनों बरी हो गए थे।
इसके अलावा प्रशांत किशोर ने भी चुनाव प्रचार के दौरान सम्राट पर मुकदमों से बचने के लिए उम्र गलत बताने का आरोप लगाया था। सम्राट चौधरी ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है।
मोदी-शाह का नया फॉर्मूला: जीत दिलाओ, पद पाओ
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार नरेंद्र Modi और अमित शाह की रणनीति पूरी तरह चुनावी गणित और क्षेत्रीय प्रभाव पर आधारित है। BJP अब उन नेताओं को प्राथमिकता दे रही है, जिनकी जातीय पकड़ मजबूत है और जो चुनावी जीत सुनिश्चित कर सकते हैं।
पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में BJP के विस्तार में यह रणनीति काफी प्रभावी साबित हुई है। हालांकि इससे पार्टी के पुराने और वैचारिक रूप से समर्पित नेताओं के बीच असंतोष भी बढ़ने की चर्चा है।
