RANCHI
झारखंड के लिए आज का दिन गहरे भावनात्मक और ऐतिहासिक महत्व वाला रहा, जब राज्य के सबसे बड़े जननेता माने जाने वाले दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से अलंकृत किया गया। यह सम्मान राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में आयोजित औपचारिक समारोह में उनकी पत्नी रूपी सोरेन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से ग्रहण किया।
समारोह के दौरान माहौल बेहद भावुक रहा। गुरुजी की राजनीतिक और पारिवारिक विरासत को साक्षी बनाते हुए उनकी बहू और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पत्नी तथा गांडेय विधायक कल्पना मुर्मू सोरेन भी मौजूद रहीं। यह क्षण केवल एक औपचारिक सम्मान ग्रहण करने का नहीं, बल्कि पूरे झारखंड और आदिवासी समाज के संघर्ष, पहचान और आत्मसम्मान के इतिहास को राष्ट्रीय मंच पर स्वीकार किए जाने का प्रतीक बन गया।
शिबू सोरेन को यह सम्मान आदिवासी समाज के उत्थान, उनके अधिकारों की रक्षा, महाजनी और साहूकारी शोषण के खिलाफ लंबे संघर्ष तथा झारखंड समेत राष्ट्रीय राजनीति में उनके निर्णायक योगदान के लिए प्रदान किया गया है। लंबे समय तक आदिवासी अस्मिता और जल-जंगल-जमीन के मुद्दों को केंद्र में रखने वाले गुरुजी का जीवन संघर्ष, संगठन और आंदोलन की मिसाल माना जाता है।
गौरतलब है कि शिबू सोरेन का निधन 4 अगस्त 2025 को लंबी बीमारी के बाद दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में हुआ था। उनके निधन के बाद यह सम्मान मरणोपरांत घोषित किया गया था, जिसकी औपचारिक घोषणा गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या, 25 जनवरी 2026 को की गई थी। अब 23 जून 2026 को राष्ट्रपति भवन में यह सम्मान औपचारिक रूप से उनके परिवार को सौंपा गया।
झारखंड अलग राज्य गठन के बाद पद्म भूषण प्राप्त करने वाले वे चुनिंदा व्यक्तित्वों में शामिल हो गए हैं। राज्य की राजनीति और सामाजिक आंदोलन की पृष्ठभूमि में उनका नाम उस पीढ़ी के नेताओं में दर्ज है, जिन्होंने जमीन से जुड़कर जनआंदोलन खड़ा किया और उसे राजनीतिक शक्ति में बदल दिया।
11 जनवरी 1944 को तत्कालीन रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन के जीवन की दिशा बचपन में ही बदल गई थी। मात्र 13 वर्ष की उम्र में पिता सोबरन सोरेन की महाजनों और साहूकारों द्वारा हत्या ने उनके भीतर शोषण के खिलाफ गहरा विद्रोह पैदा किया। इसी घटना ने उन्हें आदिवासी समाज के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष की राह पर ला खड़ा किया।
उन्होंने आदिवासी समाज में शिक्षा, जागरूकता और सामाजिक सुधार के लिए कई पहल कीं। महाजनी प्रथा और साहूकारी शोषण के खिलाफ उन्होंने संगठित आंदोलन चलाया। नशामुक्ति, बाल विवाह विरोध और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अभियान चलाकर उन्होंने समाज सुधार की मजबूत नींव रखी। धनकटनी आंदोलन उनके संघर्ष का एक ऐतिहासिक अध्याय माना जाता है।
1973 में धनबाद में बिनोद बिहारी महतो और एके रॉय के साथ मिलकर उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की, जिसने अलग झारखंड राज्य के आंदोलन को संगठित और निर्णायक दिशा दी। कठिन परिस्थितियों, गिरफ्तारी के खतरे और लंबे संघर्ष के बावजूद वे आंदोलन के केंद्र में बने रहे। अंततः 15 नवंबर 2000 को झारखंड एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया।
उनका राजनीतिक जीवन भी उपलब्धियों से भरा रहा। वे आठ बार लोकसभा सांसद, तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री और तीन बार राज्यसभा सांसद रहे। राज्यसभा में अपने अंतिम कार्यकाल के दौरान ही उनका निधन हुआ।
दिशोम गुरु शिबू सोरेन का पद्म भूषण से सम्मानित होना केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि पूरे झारखंड और आदिवासी समाज के संघर्ष, पहचान और आत्मसम्मान की राष्ट्रीय स्वीकृति के रूप में देखा जा रहा है। यह क्षण उनके जीवन संघर्ष को ऐतिहासिक रूप से अमर बना देता है।
