RANCHI
17 अगस्त को झारखंड सरकार ने JSSC-CGL परीक्षा सहित टीडीपीएल द्वारा संचालित कराई गई सभी परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला किया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इसकी जानकारी मीडिया को दी। इससे पहले उन्होंने प्रोजेक्ट भवन में कैबिनेट के अन्य साथियों के साथ करीब तीन घंटे तक बैठक की। बैठक में परीक्षाओं को रद्द करने से जुड़े विभिन्न तकनीकी पहलुओं पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। इसके बाद सरकार ने परीक्षाएं रद्द करने का फैसला लिया।
परीक्षाएं रद्द किए जाने के बाद अब विभिन्न राजनीतिक दलों और छात्र मंचों की ओर से मामले की सीबीआई जांच की मांग उठाई जा रही है। उनका कहना है कि केवल परीक्षाएं रद्द करने से पूरे मामले की सच्चाई सामने नहीं आएगी और इसके लिए निष्पक्ष जांच जरूरी है। गौतरलब है फिलहाल विवादित परीक्षाओं की जांच सीआईडी कर रही है।
हालांकि, झारखंड में पहले भी कई मामलों में सीबीआई जांच की मांग उठती रही है। ऐसे में यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि राज्य में अब तक हुई सीबीआई जांचों का कितना फलाफल सामने आया है और उनसे कितने मामलों में ठोस नतीजे निकल सके हैं। यही वजह है कि मौजूदा परीक्षा विवाद में सीबीआई जांच की मांग के साथ-साथ उसके संभावित नतीजों को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है।
उदाहरण के लिए प्रथम और द्वितीय सिविल सेवा परीक्षाओं के मामलों में सालों की जांच के बाद चार्जशीट तो दाखिल हो गई, लेकिन ट्रायल अब तक शुरू नहीं हो सका है। ऐसे में हालिया जेएसएससी-सीजीएल और जेपीएससी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की सीबीआई जांच की मांग कितनी कारगर साबित होगी, यह सवाल अब जोर पकड़ रहा है।
द्वितीय जेपीएससी सिविल सेवा परीक्षा (लगभग 2007-08, जब मधु कोड़ा मुख्यमंत्री थे) का मामला सबसे बड़ा उदाहरण है। डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी समेत कई पदों पर हुई इस भर्ती में अंक हेरफेर और पक्षपात के आरोप लगे थे। हाईकोर्ट के आदेश पर 2012 में सीबीआई ने जांच शुरू की। करीब 12 साल बाद अक्टूबर-नवंबर 2024 में एजेंसी ने रांची की विशेष अदालत में चार्जशीट दाखिल की, जिसमें तत्कालीन जेपीएससी अध्यक्ष दिलीप कुमार प्रसाद समेत 50 से 70 लोगों को आरोपी बनाया गया। आरोप है कि प्रीलिम्स, मेन्स और इंटरव्यू में अंक बढ़ाए गए तथा अयोग्य अभ्यर्थियों को पास कराया गया।
2025 में कोर्ट ने संज्ञान लिया और समन जारी किए, लेकिन जुलाई 2026 तक ट्रायल शुरू नहीं हो पाया। अभियोजन स्वीकृति समेत कई कानूनी अड़चनों के कारण मामला अटका हुआ है। जनवरी 2026 में ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग का केस भी दर्ज किया, लेकिन सीबीआई की मूल जांच का नतीजा अभी दूर नजर आता है।
प्रथम जेपीएससी सिविल सेवा परीक्षा (2003-05, जब भाजपा, अर्जुन मुंडा की सरकार थी) में भी यही स्थिति है। अंक हेरफेर और पक्षपात के आरोपों पर सीबीआई ने चार्जशीट दाखिल की, लेकिन ट्रायल लंबित है। कई चयनित अभ्यर्थी अभी भी सरकारी सेवा में हैं।
ये पुराने मामले साफ दर्शाते हैं कि सीबीआई जांच शुरू होने के बावजूद न्याय मिलने में दशकों लग सकते हैं। चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी ट्रायल न शुरू होना एजेंसी की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है। ऐसे में जब छात्र संगठन और विपक्ष हालिया जेएसएससी-सीजीएल तथा जेपीएससी परीक्षाओं की सीबीआई जांच की जोरदार मांग कर रहे हैं, तो पुराने अनुभवों को देखते हुए यह मांग कितनी कारगर साबित होगी, यह संदेह का विषय बन गया है। कई जानकार मान रहे हैं कि केवल सीबीआई जांच की मांग से समस्या का त्वरित समाधान निकलना मुश्किल है, क्योंकि पिछले मामलों में भी एजेंसी समय पर निर्णायक नतीजे नहीं दे पाई है।
