Controversy erupts over the design of Rabindranath Tagore statue
RANCHI
रांची स्थित रवीन्द्र भवन में कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर की प्रतिमा स्थापित किए जाने की प्रक्रिया को लेकर पूरे बांग्ला समाज में गहरा आक्रोश और निराशा व्याप्त है। समाज का कहना है कि जिस स्वरूप में प्रतिमा तैयार की गई है, वह कविगुरु के वास्तविक रूप, व्यक्तित्व, चिंतन और गरिमा से बिल्कुल मेल नहीं खाती, बल्कि एक विकृत और असंगत चित्रण प्रस्तुत करती है।
कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर केवल एक साहित्यकार नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रगान “जन गण मन” के रचयिता, विश्वकवि, शिक्षाविद, कलाकार, दार्शनिक और मानवता के प्रतीक थे। उन्होंने भारतीय संस्कृति, भाषा और चेतना को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। ऐसे महामानव को दिया जाने वाला सम्मान सर्वोच्च, सच्चा और सौंदर्यपूर्ण होना चाहिए — परंतु जिस रूप में प्रतिमा स्थापित की जा रही है, वह न केवल उनकी स्मृति के प्रति अन्याय, बल्कि समाज की भावनाओं को गहराई से आहत करने वाला कार्य है।
समाज का यह भी कहना है कि प्रतिमा का चेहरा और भाव-भंगिमा कविगुरु की पहचान से असंगत है, जिससे नई पीढ़ी उनके वास्तविक स्वरूप को पहचान ही नहीं पाएगी। यह स्थिति न केवल सांस्कृतिक असंवेदनशीलता को दर्शाती है, बल्कि कविगुरु के योगदान के प्रति उपेक्षा और उदासीनता का प्रतीक भी है।
इसी विषय को लेकर आज “अस्तित्व – अखिल भारतीय बांग्ला भाषी समन्वय परिषद” के बैनर तले विभिन्न संगठनों और सांस्कृतिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने उपायुक्त, रांची को ज्ञापन सौंपा, जिसमें प्रतिमा के स्वरूप की पुनर्समीक्षा की मांग की गई।
ज्ञापन में यह अनुरोध किया गया कि प्रतिमा के स्वरूप की समीक्षा हेतु कला विशेषज्ञों, इतिहासकारों तथा बांग्ला समाज के प्रतिनिधियों की एक समिति गठित की जाए, और जब तक समीक्षा पूरी न हो, प्रतिमा का अनावरण स्थगित रखते हुए एक आदमकद पोस्टर के माध्यम से कार्यक्रम आयोजित किया जाए, ताकि कविगुरु की गरिमा और सम्मान बना रहे।
इस अवसर पर “अस्तित्व” के केंद्रीय अध्यक्ष श्री अभिजीत दत्ता गुप्ता ने कहा —
> “यह किसी प्रकार का विरोध नहीं, बल्कि कविगुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा और सम्मान की रक्षा का प्रयास है। राष्ट्रगान के रचयिता को जिस स्वरूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, वह हमारे हृदय की भावनाओं को गहराई से आहत करता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर भारत की आत्मा, संवेदनशीलता और सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं — उनके प्रति किसी भी प्रकार की असंवेदनशीलता पूरे समाज के लिए अपमानजनक है। हमारा उद्देश्य यही है कि कविगुरु की प्रतिमा उनके वास्तविक, गरिमामय स्वरूप में स्थापित की जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें सही रूप में जान सकें।”
इस ज्ञापन कार्यक्रम में मुख्य रूप से उपस्थित रहे —
अभिजीत दत्ता गुप्ता (केंद्रीय अध्यक्ष), अभिजीत भट्टाचार्य (केंद्रीय महासचिव), श्रीमती रिंकू बनर्जी, सुदिप्तो भट्टाचार्य, तरुण कुंडु, राजा सेन, रीता डे, मिता दान, देबाशिष दत्ता, सुचिसमिता सेन, अभिजीत विश्वास, उत्तम बनर्जी, मानस, रथिन चटर्जी बिट्टू, नीता, आयोना, उत्पल, स्वागता कुंडू, प्रभीर दासगुप्ता,गौतम देबनाथ, जोय कुर्मी तथा बांग्ला सांस्कृतिक कर्मीवृंद के सुबीर लाहिड़ी, प्रणब चौधरी (देशপ্রিয় क्लब), उत्पल सिन्हा, निलेश, अर्नब गुप्ता सहित अनेक प्रतिनिधि उपस्थित थे।
