असम के आदिवासियों से संगठनों की अपील, 2027 जनगणना में दर्ज कराएं अपनी भाषा और धार्मिक पहचान

CENTRAL DESK

असम के आदिवासी संगठनों की समन्वय समिति (CCTOA) ने राज्य के सभी आदिवासी समुदायों से वर्ष 2027 की जनगणना के दौरान अपनी भाषा, जातीय पहचान और धार्मिक आस्था को सही एवं स्पष्ट रूप से दर्ज कराने का आह्वान किया है। संगठन का कहना है कि यह जनगणना केवल आंकड़ों का संकलन नहीं, बल्कि आदिवासी समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सामाजिक अधिकारों और संवैधानिक संरक्षण से जुड़ा महत्वपूर्ण अवसर है।

गुवाहाटी में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में विभिन्न आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बैठक की अध्यक्षता ऑल असम ट्राइबल संघ के अध्यक्ष सुकुमार बसुमतारी ने की। बैठक के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए CCTOA के मुख्य समन्वयक आदित्य खाकलारी ने कहा कि जनगणना के आंकड़े भविष्य की नीतियों, योजनाओं और अधिकारों के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में आदिवासी समाज को अपनी वास्तविक पहचान दर्ज कराने के प्रति जागरूक होना चाहिए।

बैठक में सिद्धेश्वर और जागीरोड क्षेत्र में आदिवासी भूमि अधिकारों को लेकर उत्पन्न स्थिति पर भी विस्तार से चर्चा की गई। समिति ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से गोभा साम्राज्य के अंतर्गत आने वाले इन क्षेत्रों में पीढ़ियों से निवास कर रहे आदिवासी परिवारों को किसी भी परिस्थिति में विस्थापित नहीं किया जाना चाहिए। संगठन ने राज्य सरकार से आदिवासियों की पारंपरिक भूमि और आवासीय अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।

CCTOA ने मुख्यमंत्री से यह स्पष्ट करने का आग्रह किया कि सिद्धेश्वर क्षेत्र में किसी भी प्रकार की सैटेलाइट टाउनशिप परियोजना लागू नहीं की जाएगी। संगठन ने आशंका जताई कि विकास परियोजनाओं के नाम पर आदिवासी समुदायों को उनकी जमीन से बेदखल किया जा सकता है। समिति ने सरकार से भविष्य में ऐसी किसी भी कार्रवाई से बचने की अपील की, जिससे स्थानीय निवासियों के अधिकार प्रभावित हों।

बैठक में गुवाहाटी मेट्रोपॉलिटन डेवलपमेंट अथॉरिटी (GMDA) द्वारा दक्षिण कामरूप आदिवासी बेल्ट तथा राभा हासोंग स्वायत्त परिषद क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण के प्रयासों का भी कड़ा विरोध किया गया। समिति का कहना है कि आदिवासी क्षेत्रों की जमीनों का अधिग्रहण स्थानीय समुदायों के हितों और परंपरागत अधिकारों के विपरीत है। इसलिए किसी भी अधिग्रहण प्रक्रिया को तत्काल रोका जाना चाहिए।

संगठन ने मिसिंग, तिवा और राभा स्वायत्त परिषदों को संवैधानिक दर्जा देने की मांग एक बार फिर दोहराई। इसके साथ ही इस विषय पर समाधान निकालने और प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए एक मध्यस्थ नियुक्त करने की भी मांग की गई। CCTOA का मानना है कि संवैधानिक दर्जा मिलने से इन परिषदों को अधिक अधिकार और प्रशासनिक मजबूती प्राप्त होगी।

बैठक में प्रत्येक वर्ष 30 नवंबर को ‘आदिवासी एकता दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय भी लिया गया। इसके अलावा सरकार से आदिवासी छात्रों के लिए पृथक छात्रावास स्थापित करने, आदिवासी बहुल क्षेत्रों में कौशल विकास केंद्र खोलने तथा लंबित भूमि विवादों के समाधान के लिए ‘मिशन बसुंधरा 4.0’ शुरू करने की मांग की गई। समिति ने वन अधिकार अधिनियम 2006 को प्रभावी ढंग से लागू करने पर भी जोर देते हुए कहा कि आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए यह अत्यंत आवश्यक है।

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