उपन्यास ‘उपेक्षिता’: सामाजिक चेतना का एक महत्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज

Sushil kumar

अयन प्रकाशन, महरौली, नई दिल्ली (प्रकाशन वर्ष 2000) से प्रकाशित कथाकार शिरोमणि महतो की कृति उपेक्षिता’ का हिंदी साहित्य की उपन्यास-भूमि पर आगमन एक सुखद और गंभीर घटना है। यद्यपि इस उपन्यास का सृजन लेखक ने आज से लगभग पच्चीस-तीस वर्ष पूर्व (1996-97) किया था, तथापि इसकी कथावस्तु और संवेदना आज भी उतनी ही अधुनातन और प्रासंगिक प्रतीत होती है। पच्चीस वर्षों का अंतराल किसी भी कृति की परीक्षा के लिए पर्याप्त होता है और यह उपन्यास उस कसौटी पर खरा उतरते हुए वर्तमान सामाजिक विद्रूपताओं के समक्ष एक ज्वलंत प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। यह कृति मात्र एक प्रेमकथा की परिधि में सीमित रहने के बजाय, भारतीय ग्रामीण परिवेश, जातीय संकीर्णता और मानवीय संवेदनाओं का एक विराट फलक प्रस्तुत करती है। लेखक ने ढाई दशक पूर्व ही समाज की जिन नब्ज़ों को टटोला था, वे आज भी उसी शिद्दत से धड़क रही हैं।

उपन्यास का कथा-शिल्प एक विशिष्ट नाटकीयता के साथ आकार लेता है। कथा का प्रारंभ दो नितांत भिन्न ध्रुवों के टकराव से होता है। एक ओर ग्रामीण संस्कारों से पोषित, शिक्षित और संयमित युवक डी.सी. (दुलारचंद महतो) है, तो दूसरी ओर धन और सत्ता के मद में चूर, शहर की आधुनिकता में रची-बसी ब्राह्मण कन्या काजल। बोकारो की सड़कों पर मारुति और साइकिल की टक्कर मात्र एक दुर्घटना भर रहती तो बात सामान्य होती, किंतु लेखक ने इसे दो वर्ग-चरित्रों के संघर्ष के रूप में उभारा है, जो इसकी कथा को प्राणवंत बनाता है। काजल द्वारा एक निर्दोष साइकिल चालक को आहत कर अहंकार प्रदर्शित करना और डी.सी. द्वारा निर्भीकतापूर्वक उस अन्याय का प्रतिकार करना, कथा को एक ठोस वैचारिक भावभूमि प्रदान करता है। यहाँ लेखक ने अमीर-गरीब और शहर-गाँव के द्वंद्व को अत्यंत सूक्ष्मता से उकेरा है, जो वर्ग-संघर्ष की परिधि में प्रतिकृत होकर परस्पर भौतिक द्वंद्ववाद की उस परिणति में चला जाता है, जहाँ मार्क्स का मूल्य अव्यक्त रहकर भी सलीके से व्यक्त होता है और इस कृति को हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि बनाता है।

डी.सी. का व्यक्तित्व एक ऐसे आदर्श नायक का है, जो अन्याय के समक्ष झुकने के स्थान पर आँखों में आँखें डालकर सत्य बोलने का साहस रखता है। काजल के हृदय में पश्चाताप की अग्नि प्रज्वलित होना और उसका आत्मघाती कदम उठाना, कथा को एक नया मोड़ देता है। डी.सी. द्वारा अपना रक्त देकर काजल के प्राणों की रक्षा करना इस बात का प्रतीक है कि मानवीय रक्त का संबंध जातीय और वर्गीय दीवारों से कहीं अधिक ऊँचा और पवित्र होता है।

उपन्यास की मूल संवेदना ‘प्रेम’ के उदात्त रूप की स्थापना करना है, न कि खालिस दर्शन से पाठक को बोझिल करना। यहाँ प्रेम केवल आकर्षण का नाम न होकर, एक-दूसरे के दोषों को स्वीकार कर उन्हें परिष्कृत करने की एक निरंतर और तटस्थ प्रक्रिया है।

काजल का चरित्र-विकास इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि है। एक अहंकारी युवती से संवेदनशील प्रेमिका और फिर एक धैर्यवान पत्नी बनने तक की उसकी यात्रा अत्यंत विश्वसनीय और प्रेरणादायी है। उसके चरित्र की यह संश्लिष्ट और अवगुंठित बुनावट शिरोमणि के कथा-शिल्प का बहुत उदात्त पक्ष है, जो उपन्यास को पठनीय बनाता है।

लेखक ने दामोदर नदी के तट पर प्रकृति की साक्षी में डी.सी. और काजल के मिलन का जो चित्रण किया है, वह दैहिक आकर्षण से परे दो आत्माओं के एकाकार होने की गाथा है। विवाह-पूर्व गर्भधारण का प्रसंग भारतीय समाज के लिए एक वर्जना हो सकता है, किंतु लेखक ने इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया है और इसमें सफल होते दिखाई देते हैं। काजल का अपने पिता प्रयागराज पांडेय के समक्ष पूर्ण दृढ़ता और सत्यनिष्ठा के साथ अपनी स्थिति को स्वीकार करना, उसे एक सशक्त नारी चरित्र के रूप में स्थापित करता है। यहाँ एक पुत्री, पिता के ‘सम्मान’ की झूठी अवधारणाओं के विपरीत ‘जीवन’ और ‘सत्य’ के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है। पिता का क्रोध, रिवॉल्वर तानना और अंततः पुत्री के प्रेम और दृढ़ता के समक्ष नतमस्तक होना, पीढ़ियों के संघर्ष और समाधान का एक उत्कृष्ट उदाहरण माना जा सकता है।

उपन्यास का द्वितीय सोपान मँझली टांड गाँव के परिवेश में खुलता है, जहाँ ‘उपेक्षिता’ शीर्षक अपनी सार्थकता प्रमाणित करता है। गौर करने वाली बात है कि एक करोड़पति पिता की लाड़ली पुत्री का एक साधारण, अभावग्रस्त किसान परिवार में समायोजन करना तप के समान है। यहाँ लेखक ने ग्रामीण समाज की रूढ़ियों और जातीय आग्रहों को पूरी नग्नता के साथ बेनकाब किया है। डी.सी. की माँ कौशल्या देवी और ननद चुन्नी का व्यवहार एक कड़वे यथार्थ को खोलता है। सास-बहू के पारंपरिक द्वंद्व को लेखक ने यहाँ जातीय श्रेष्ठता और हीनता की ग्रंथि से जोड़कर देखा है। गाँव की पंचायत द्वारा डी.सी. का हुक्का-पानी बंद करना और समाज में वापसी के लिए ‘खस्सी-भात’ (सामूहिक भोज) का दंड सुनाना, उस सामंती मानसिकता का परिचायक है, जो आज भी ग्रामीण भारत की जड़ों में गहरी पैठ बनाए हुए है।

डी.सी. का इस अन्यायपूर्ण दंड को अस्वीकार करना और समाज से बहिष्कृत होकर भी अपने आत्मसम्मान के साथ जीने का निर्णय लेना, विद्रोह की एक नई भाषा गढ़ता है। यही इस उपन्यास की वह संजीवनी है, जिसका प्रसंग स्पष्ट करता है कि सत्य के पथ पर चलने वाला व्यक्ति अकेला होकर भी पराजित नहीं होता।

कथावस्तु को विस्तार और गहराई देने के लिए लेखक ने मुख्य कथा के समानांतर कई सशक्त उपकथाओं का ताना-बाना भी बुना है। सावन और रचना का प्रसंग विधवा-विवाह और सामाजिक समरसता की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। सावन, जो एक पुलिस इंस्पेक्टर है और डी.सी. का ममेरा भाई है, वह जाति और परंपरा की बेड़ियों को तोड़कर एक हरिजन विधवा रचना को अपने जीवनसाथी के रूप में स्वीकार करता है। यथार्थ के साथ कथा में इस आदर्श का प्रतिबिंबन उपन्यास के किंचित ‘ऑर्गेनिक रियलिटी’ से प्रतिघात करते हुए भी उसे सामाजिक समरसता के एक आख्यान के रूप में रचता है, जो उपन्यास की विशेषता है।

लेखक ने यहाँ यह प्रतिपादित किया है कि प्रेम का वास्तविक अर्थ केवल सुख भोगना नहीं, अपितु किसी के दुख और अकेलेपन को बाँटना है। रचना का चरित्र एक मूक वेदना का प्रतीक है, जिसे सावन के प्रेम ने वाणी दी।

इसी प्रकार, हीरा और देवी का प्रसंग भारतीय संयुक्त परिवार के उन विस्मृत मूल्यों को पुनर्जीवित करता है, जहाँ भाई के सम्मान और वचन के लिए दंपत्ति स्वेच्छा से ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। यह त्याग आधुनिक भौतिकवादी युग में अविश्वसनीय लग सकता है, किंतु लेखक ने इसे इतनी तन्मयता से रचा है कि यह भारतीय संस्कृति के आदर्शों का जीवंत दस्तावेज बन जाता है।

शिरोमणि महतो की भाषा-शैली में एक अद्भुत प्रवाह और झारखंडी मिट्टी की सौंधी महक है। उन्होंने तत्सम-प्रधान शब्दावली के साथ आंचलिक शब्दों का मणिकांचन संयोग किया है, जिससे कथानक में सघनता और विश्वसनीयता का समावेश हुआ है।

‘नूनी’, ‘बाड़’, ‘परछन’, ‘मड़वा’, ‘खस्सी-भात’, ‘कोहबर’, ‘सिंदूर-दान’, ‘नेग-चार’, ‘लगन-पतरी’, ‘लावा-छीटाई’, ‘गुर-हत्थी’, ‘ढिबरी’, ‘कनैल’, ‘पलाश’, ‘जोरिया’, ‘टांड़’, ‘टोला’, ‘ओझा-गुनी’, ‘सोखा’, ‘माड़-भात’, ‘अँचरा’, ‘गोड़-लागी’, ‘बड़का’, ‘काका’ और ‘भौजी’ जैसे आंचलिक शब्द पाठक को सीधे झारखंड के जनजीवन से आत्मीय साक्षात्कार कराते हैं। आंचलिकता यहाँ महज़ शाब्दिक जमावड़ा नहीं है, बल्कि उस माटी की गंध और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का एक सशक्त माध्यम है। हम कह सकते हैं कि लेखक ने इन देशज शब्दों के प्रयोग से उपन्यास को ‘क्लीशे’ और कृत्रिमता से मुक्त रखते हुए इसे झारखंड की लोक-संस्कृति का एक प्रामाणिक दस्तावेज बना दिया है।

यह भाषाई प्रयोग पाठकों को पात्रों के सुख-दुख और उनके परिवेश की गहन अनुभूति कराता है, जहाँ संवादों में पात्रों के चरित्र और उनकी सामाजिक स्थिति का पूर्ण प्रतिबिंब दृष्टिगोचर होता है और पाठक को सीधे झारखंड के जनजीवन से जोड़ता है। जब काजल बोलती है तो उसकी भाषा में शिक्षा और संस्कार का ओज होता है, वहीं कौशल्या देवी के संवादों में ग्रामीण जीवन की खुरदुरी सच्चाई और उलाहनों की बौछार होती है।

लेखक ने प्रकृति-चित्रण में भी अपनी कलात्मकता का परिचय दिया है। पलाश के दहकते फूल, दामोदर का कल-कल निनाद और आषाढ़ की रिमझिम फुहारें पृष्ठभूमि की सीमाओं का अतिक्रमण कर पात्रों की मनःस्थिति से तादात्म्य स्थापित करती हैं, जिससे कथा को एक विशिष्ट गति प्राप्त होती है।

उपन्यास का सामाजिक सरोकार प्रेम और विवाह के वृत्तांत से विस्तार पाकर अंधविश्वास के घने अंधकार पर तर्क की सशक्त चोट करता प्रतीत होता है।

बिगनी की बीमारी को डायन का प्रकोप मानना और निर्दोष मंजरी मैया को प्रताड़ित करना, ग्रामीण समाज की उस भयावह और घृणित तस्वीर को सामने लाता है, जहाँ अज्ञानता हिंसा का रूप ले लेती है। ओझा द्वारा झाड़-फूँक का पाखंड और भीड़ द्वारा एक असहाय महिला को ‘गूह-गोबर’ पिलाने का प्रयास पाठक के रोंगटे खड़े कर देता है। ऐसे विकट क्षण में काजल का एक दुर्गा के रूप में अवतरित होना और उन्मादी भीड़ के सामने अकेले खड़े होकर तर्क और साहस से मंजरी मैया की रक्षा करना, यह कृत्य काजल को महज़ एक नायिका की परिधि से मुक्त कर सामाजिक चेतना और प्रतिरोध के एक सशक्त हस्ताक्षर में रूपांतरित कर देता है।
यह प्रसंग उद्घोष करता है कि कुरीतियों का अंत केवल कानून से संभव नहीं, उसके लिए व्यक्तिगत साहस और विवेक की आवश्यकता होती है।

इसी प्रकार, काजल का पंचायत चुनाव में खड़ा होना और विजय प्राप्त करना, महिला सशक्तिकरण का एक सार्थक और सकारात्मक परिणाम है।

इस तरह, यह महसूस किया जा सकता है कि पात्रों का चरित्र-चित्रण इस उपन्यास की रीढ़ है। काजल एक ऐसा बहुआयामी चरित्र है, जो समय और परिस्थितियों की आँच में तपकर कुंदन बनता है। सौंदर्य की प्रतिमूर्ति काजल के व्यक्तित्व में धैर्य, साहस और करुणा का भी एक अद्भुत संगम दृष्टिगोचर होता है। ससुराल में घोर अपमान और शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना के मध्य भी अपनी सास के प्रति उसका अटूट सेवाभाव भारतीय नारी की सहनशीलता की पराकाष्ठा को प्रमाणित करता है। इस मायने में यह स्त्री-विमर्श के पाश्चात्य कोण से थोड़ा अलग है, जो यहाँ की सांस्कृतिक-सामाजिक चेतना का रूपक है।

पितृसत्तात्मक समाज की सीमाओं का अतिक्रमण कर अपनी पत्नी के आत्मसम्मान हेतु परिवार और समाज से संघर्ष करने वाला डी.सी. एक जुझारू पात्र है। उसका प्रेम प्रदर्शन की बाह्य औपचारिकता से परे, अंतर्मन की अतल गहराइयों में प्रवाहित एक निश्छल और सात्विक भाव है।

कौशल्या देवी और चुन्नी के हृदय-परिवर्तन की प्रक्रिया को लेखक ने अत्यंत मनोवैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया है। लव (काजल और डी.सी. के पुत्र) का जन्म, उसकी बाल-सुलभ चेष्टाएँ और रक्त का खिंचाव अंततः द्वेष की दीवारों को ढहा देता है। बनवारी का हस्तक्षेप और चुन्नी को सत्य का दर्पण दिखाना, पुरुष पात्रों की सकारात्मक भूमिका को रेखांकित करता है।

उपन्यास का अंत एक सुखद और आशावादी भविष्य की ओर संकेत करता है। लव के माथे पर चोट लगने की घटना ने कौशल्या देवी के भीतर दबी ममता के स्रोत को मुक्त कर दिया। जो सास कल तक अपने पोते को ‘पाप का लोथड़ा’ मानती थी, वही उसे अपनी गोद में लेकर ‘युग-युग जियो’ का आशीर्वाद देती है। यह हृदय-परिवर्तन ही इस उपन्यास की पराकाष्ठा है। काजल की चुनावी जीत और सास द्वारा उसे हृदय से अपनाया जाना यह सिद्ध करता है कि सत्य, धैर्य और सेवाभाव अंततः पाषाण-हृदय को भी पिघलाने की क्षमता रखते हैं। ‘उपेक्षिता’ अब ‘अपेक्षिता’ और ‘वंदनीया’ बन जाती है। उपन्यासकार ने रचना में यह संदेश अत्यंत सुघड़ता से दिया है कि मनुष्य अपने जन्म या जाति से नहीं, अपितु अपने कर्मों और संस्कारों से महान बनता है।

समग्रतः, पच्चीस वर्ष पूर्व लिखे जाने के बावजूद शिरोमणि महतो का उपन्यास उपेक्षिता’ अपनी शिल्पगत बुनावट और कथा-रस में अत्यंत सघन, संश्लिष्ट और प्रभावकारी है। इसमें समाज के जिन अंतर्विरोधों का चित्रण हुआ है, वे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। साथ ही मानवीय संबंधों की आँच भी उसी ऊष्मा और तरलता के साथ महसूस की जा सकती है।

शिरोमणि राम महतो- जन्म 29 जुलाई 1973 को हुआ। उन्होंने एम.ए. तक शिक्षा प्राप्त की (अपूर्ण) और वर्तमान में अध्यापन के साथ साहित्यिक पत्रिका महुआ का संपादन कर रहे हैं। उनकी रचनाएँ कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में धूल में फूल (बाल कविता), पतझड़ का फूल, कभी अकेले नहीं, भात का भूगोल, चाँद से पानी (कविता-संग्रह) तथा उपेक्षिता और करमजला (उपन्यास) शामिल हैं। इसके अलावा झारखण्ड की समकालीन कविता का संपादन और समकाल की आवाज़ (चयनित कविताएँ) भी प्रकाशित हुई हैं। उन्हें नागार्जुन स्मृति राष्ट्रीय सम्मान, सव्यसाची सम्मान, परिवर्तन लिटरेचर अचीवर्स अवार्ड और जयशंकर प्रसाद स्मृति सम्मान सहित अनेक सम्मानों से नवाज़ा गया है। उनकी रचनाओं के अनुवाद मराठी, सिंधी, उर्दू, उड़िया, गुजराती, नेपाली और अंग्रेज़ी भाषाओं में प्रकाशित हुए हैं तथा उपन्यास करमजला पर भुवनेश्वर और वर्द्धमान विश्वविद्यालयों में शोध-कार्य किया गया है। वे महुआ और पंख पत्रिका का संपादन करते हैं और महुआ का निःशुल्क वितरण करते रहे हैं। अब तक वे 200 से अधिक साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन एवं संचालन कर चुके हैं। संपर्क : 9931552982

सुशील कुमार– लेखक,  कवि और  आलोचक हैं। अब तक उनके पांच कविता-संग्रह, पर्यावरण पर एक पुस्तक और दो आलोचना-पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी रचनाओं में समकालीन समाज, प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं की स्पष्ट झलक मिलती है। उन्हें वर्ष 2015 में दुमका में ‘सतीश स्मृति विशेष सम्मान’ से सम्मानित किया गया।

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