Medaram | Telangana
तेलंगाना के मुलुगु जिले के घने जंगलों में बसे छोटे से गांव मेदाराम में बुधवार से सम्मक्का–सरलम्मा जतरा का भव्य शुभारंभ हो गया। एशिया के सबसे बड़े आदिवासी आयोजन के रूप में पहचानी जाने वाली यह द्विवार्षिक जतरा चार दिनों तक चलेगी और इसके 31 जनवरी को संपन्न होने की उम्मीद है। इस बार देशभर से करीब 1.5 करोड़ श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान लगाया गया है।

जतरा की शुरुआत पारंपरिक अनुष्ठानों के साथ हुई, जिसमें आदिवासी देवी-देवताओं के प्रतीकात्मक आगमन को उनके पवित्र मंचों, जिन्हें स्थानीय भाषा में गद्देलु कहा जाता है, तक लाया गया। इन अनुष्ठानों ने पूरे आयोजन का आध्यात्मिक माहौल तय कर दिया। बुधवार तड़के से ही श्रद्धालु मेदाराम पहुंचने लगे और शाम तक जंपन्ना वागु के पास सरालम्मा (सरक्का), गोविंदराजुलु और पगिदिद्दाराजु के आगमन के दर्शन किए।
सरालम्मा को कन्नेपल्ली पहाड़ी से पारंपरिक ढोल-नगाड़ों और जयकारों के बीच उनके निर्धारित स्थल तक लाया गया। आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओडिशा समेत कई राज्यों से आए श्रद्धालुओं ने करीब 25 किलोमीटर के जंगल क्षेत्र में अस्थायी टेंट और झोपड़ियां बनाईं। श्रद्धालु अपने साथ गुड़, जिसे शरीर के वजन के बराबर “सोने” के रूप में चढ़ाया जाता है — के अलावा साड़ियां और वोडिबिय्यम (पारंपरिक चावल अर्पण) लेकर पहुंचे।
पहले दिन आदिवासी परंपराओं से जुड़े नृत्य, लोकगीत और अनुष्ठानों ने पूरे क्षेत्र को उत्सव में बदल दिया। श्रद्धालुओं ने जंपन्ना वागु में पवित्र स्नान किया, जिसे पापों से मुक्ति और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। बड़ी संख्या में लोगों ने वेदियों पर पूजा-अर्चना की और देवी-देवताओं को भेंट चढ़ाई।
कड़े सुरक्षा इंतजाम, 14 हजार पुलिसकर्मी तैनात
भारी भीड़ को देखते हुए तेलंगाना सरकार ने व्यापक इंतजाम किए हैं। तेलंगाना राज्य सड़क परिवहन निगम ने 4,000 से अधिक बसें श्रद्धालुओं के परिवहन के लिए लगाई हैं। वहीं सुरक्षा के लिए 14,000 से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं। एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें जंपन्ना वागु और पूजा स्थलों के आसपास तैनात हैं।
जतरा से पहले 251 करोड़ रुपये की लागत से स्थल का पुनर्विकास किया गया है। इसमें बेहतर सड़कें, स्वच्छता सुविधाएं, भीड़ प्रबंधन व्यवस्था और बुनियादी सुविधाएं शामिल हैं। मेडिकल कैंप और पेयजल केंद्र भी स्थापित किए गए हैं। आयोजन स्थल पर पारंपरिक वस्तुओं की दुकानें सजी हैं, जहां इप्पा फूल के लड्डू की बिक्री लाखों रुपये तक पहुंच चुकी है।
सम्मक्का–सरलम्मा जतरा को कोया आदिवासी समुदाय की पहचान, प्रतिरोध और सामूहिक आस्था का प्रतीक माना जाता है। 1996 में इसे राज्योत्सव का दर्जा मिला था। यह आयोजन वैदिक या ब्राह्मणवादी परंपराओं से अलग, पूरी तरह आदिवासी विश्वास प्रणाली पर आधारित है।
मान्यता है कि 13वीं शताब्दी में सम्मक्का को जंगल में बाघों के बीच पाया गया था। बाद में वे क्षेत्र की मुखिया बनीं और पगिदिद्दाराजु से उनका विवाह हुआ। अकाल के समय काकतीय शासकों द्वारा लगाए गए करों के खिलाफ उनके परिवार ने प्रतिरोध किया, जिसके बाद हुए युद्ध में कई परिजन मारे गए। कहा जाता है कि सम्मक्का जंगल में विलीन हो गईं और अपने कंगन व कुमकुम पवित्र प्रतीक के रूप में छोड़ गईं।
जतरा के दौरान हर दो साल में देवी-देवताओं को चिलकलागुट्टा पहाड़ी से गद्देलु तक लाया जाता है। श्रद्धालु गुड़ अर्पित कर देवी-देवताओं की साहस, अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध और आदिवासी अधिकारों की रक्षा की स्मृति को नमन करते हैं।
29 जनवरी को सम्मक्का थल्ली का आगमन होगा, 30 जनवरी को विशेष पूजा-अर्चना और 31 जनवरी को वनप्रवेशम के साथ देवी-देवताओं की प्रतीकात्मक जंगल वापसी होगी।
