मरंग होड़ की चीख : विकास के नाम पर उजड़ता जंगल और लहूलुहान लोकजीवन
हमने हाथी को कभी
दाँत नहीं कहा,
हमने उसे नाम दिया –
मरंग होड़
बड़ा आदमी,
जंगल का बुज़ुर्ग,
धरती का धीमा धड़कन।
जब हम छोटे थे
तो दादी की कहानियों में
हाथी रास्ता माँगता था
और आदमी रास्ता देता था,
न खेत उजड़ता था
न खून बहता था,
न जंगल काँपता था।
तब
न सड़कें थीं नस काटने वाली,
न पटरियाँ थीं सीने चीरने वाली,
न मशीनें थीं
पहाड़ों की पसलियाँ तोड़ने वाली।
तब जंगल बोलता था
और हम सुनते थे।
आज
जंगल चीखता है
और शहर बहरे हैं।
हसदेव रोता है,
सारंडा कराहता है,
दलमा की हवा में
भूख की गंध तैर रही है।
जहाँ कभी
हाथियों की पुरखौती पगडंडियाँ थीं,
अब वहाँ
खदानों के ज़ख्म हैं,
जहाँ कभी
नदियों का दूध बहता था,
अब वहाँ
जहरीली धूल का राज है।
मरंग होड़
अब हिंसक नहीं
विस्थापित है।
क्रूर नहीं
भूखा है।
हत्यारा नहीं
डरा हुआ है।
उसके बच्चे
जंगल में नहीं
डर में पैदा हो रहे हैं।
और हम?
हमने उसे पटाखे दिए,
आग दी,
लोहे की आवाजें दीं,
उसकी स्मृति में
सिर्फ़ खतरे भर दिए।
हमने
जंगल की भाषा
भुला दी।
हमने
पुरखों की समझ
रद्दी में डाल दी।
वन विभाग
डंडा लेकर आया
पर समाधान नहीं लाया,
सायरन लाया
पर संवेदना नहीं लाया।
हाथी भागा,
गाँव काँपा,
किसी माँ की गोद सूनी हुई,
किसी बच्चे का नाम
मिट्टी में दब गया।
और शहर?
उसने इसे
“दुर्घटना” कहा।
नहीं।
यह दुर्घटना नहीं,
यह हमारी नीति की हिंसा है।
यह विकास का वो चेहरा है
जो खून में मुस्कुराता है।
आज
मरंग होड़ की आँखों में
जो आग है
वह बदले की नहीं
वह बचाव की है।
वह कह रहा है –
“मुझे रास्ता दो,
मुझे जंगल दो,
मुझे मेरी स्मृति दो।”
और हमसे कह रहा है –
“अपने विकास को
धरती से पूछकर करो।”
मृतकों को सादर नमन।
उनकी चुप्पी
हमारी जिम्मेदारी है।
सरकार से नहीं,
संवेदना से नीति बनाओ।
फ़ाइल से नहीं,
फ़ीलिंग से समाधान निकालो।
पुरखों की स्मृति
अब भी ज़िंदा है,
बस उसे सुनने का साहस चाहिए।
क्योंकि
जब जंगल बचेगा,
तभी आदमी बचेगा,
और तभी
मरंग होड़
फिर से
भाई बनेगा।
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सांझ, चाय की चुस्की और मैं
सांझ उतरती है आँगन में
धीरे-धीरे, बिना शोर किए,
दिन की थकान चुपचाप
खपरैल की ओट में टिक जाती है।
चाय की पहली चुस्की
होंठों से नहीं,
सीधे मन से लगती है
जैसे माँ की डाँट के बाद
हल्की-सी मुस्कान।
उबलती चाय में
पत्तियाँ नहीं,
पूरे दिन की बातें घुलती हैं
खेत से लौटे हाथ,
सड़क किनारे की चर्चा,
और अख़बार के कोने में छुपी चिंता।
सांझ का यह वक्त
कोई दार्शनिक किताब नहीं,
फिर भी बहुत कुछ समझा देता है
कि जीवन की गति तेज़ हो सकती है,
पर सुकून अब भी
एक कप चाय में बचा है।
यही तो लोक जीवन है
जहाँ बड़े सपने भी
छोटी मेज़ पर टिक जाते हैं,
और आम आदमी
खुद से मिलने का
थोड़ा-सा समय चुरा लेता है।
इस सांझ में
मैं अकेला नहीं होता,
मेरे साथ होते हैं
अनकहे सवाल और
सीधे-सच्चे जवाब
जिन्हें बीरेन्द्र गोतिया
जैसे लोग
शब्दों में नहीं,
ज़िंदगी में जीते हैं।
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जलंगा : मेरा गांव, मेरी दुनिया
मेरा गांव – जलंगा,
धरती का स्नेहिल अंचल,
जहाँ हर सुबह
सूरज मुस्कुराकर उतरता है
ओस की हथेली पर।
वन की गोद में
रंगीन पंखों वाली चिड़ियाँ
सुरों के दीप जलाती हैं,
और हवा
बांसुरी बनकर बहती है।
कल-कल करती नदी
किसी पुरानी कथा की तरह
मेरे मन से बात करती है,
उसके कंचन जल में
बचपन झिलमिलाता है।
चट्टानों की छाती पर बैठ
मैं अपने अतीत को टटोलता हूँ,
हर लहर में
माँ की लोरी
और पिता का परिश्रम सुनाई देता है।
यहाँ मिट्टी में संस्कार हैं,
खेतों में श्रम का गीत,
और हर आंगन में
मानवता की रोशनी।
अगर दुनिया में कहीं
स्वर्ग सच में बसता है,
तो वह यहीं है
मेरे गांव जलंगा में।
क्योंकि
यह केवल एक गांव नहीं,
यह मेरी पहचान है,
मेरा गौरव,
मेरी पूरी दुनिया है।
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डोंबारी बुरु : अबुआ राज की अमर पुकार
डोंबारी बुरु की चोटी आज भी
हवा से नहीं,
इतिहास की साँसों से हिलती है।
यहाँ पत्थर नहीं,
पीढ़ियों का दर्द जमा है,
यहाँ मिट्टी नहीं,
बलिदान की राख सोई है।
नौ जनवरी उन्नीस सौ की भोर थी,
सूरज उगा था
पर उजाला नहीं लाया था,
क्योंकि उजाला उस दिन
आदिवासी आँखों में पल रहा था –
अबुआ राज!
अपना राज, अपनी धरती, अपनी साँस!
मांदर की थाप में
हज़ारों धड़कनें शामिल थीं,
हर धड़कन कह रही थी –
“जल, जंगल, ज़मीन
हमारी माँ है,
और माँ पर कोई सौदा नहीं होता।”
स्त्रियाँ बच्चों को पीठ से बाँधकर आईं,
पुरखे लाठी थामे खड़े थे,
और जवानों की आँखों में
आजादी का सूरज उतर चुका था।
पर फिर
इतिहास ने बंदूक उठाई,
और सत्ता ने सच पर
गोलियों की बारिश कर दी।
डोंबारी बुरु चीखा,
पेड़ काँपे,
मांदर की थाप
गोलियों की गूँज में दब गई,
और धरती ने अपनी गोद में
सैकड़ों सपनों को सुला लिया।
कोई माँ अपने बेटे को खोजती रही,
कोई बच्चा अपनी माँ को,
और पहाड़ पर बहता खून
नदी बनकर कहता रहा –
“हम मरे नहीं,
हम बीज बन गए हैं।”
आज जब मेले लगते हैं,
झंडे लहराते हैं,
गीत गाए जाते हैं,
तो समझो
वह उत्सव नहीं,
वह शपथ है।
यहाँ हर ढोल की थाप कहती है –
अबुआ राज कोई नारा नहीं,
यह हमारी पहचान है।
यहाँ हर दिया कहता है –
बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता।
डोंबारी बुरु,
तू झारखंड का जलियांवाला है,
पर तू सिर्फ़ दुख नहीं,
तू दिशा है,
तू आत्मसम्मान की राह है।
जब तक जल में लहर है,
जंगल में हवा है,
और मिट्टी में गंध है,
तब तक तेरी कहानी
हमारी रगों में चलती रहेगी।
क्योंकि
जो पहाड़ पर मरे,
वे इतिहास नहीं
वे भविष्य बन गए हैं।

डॉ बीरेन्द्र कुमार महतो ‘गोतिया’ एक साथ कई मोर्चों पर सक्रिय रहते हैं। समाजकर्मी के रूप में वे फील्ड में दिखाई देते हैं तो शिक्षाविद होने के नाते समय-समय पर आलेख लिखते हैं, और जब संवदेना की आद्र धरातल पर उतरते हैं तो कविताएं लिखते हैं। उनसे इस नंबर पर संपर्क किया जा सकता है- 99341 33172
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