NEW DELHI
अयोध्या के राम मंदिर में दान राशि की कथित गड़बड़ी को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस ने दावा किया है कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने तीन महीने पहले ही दान गणना केंद्र पर तैनात कुछ कर्मचारियों को हटाने की सिफारिश कर दी थी, लेकिन इसके बावजूद उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब सवाल उठ रहा है कि आखिर उन कर्मचारियों को संरक्षण कौन दे रहा था और किसके दबाव में कार्रवाई टाली जाती रही?
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने रायपुर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि यदि बैंक ने पहले ही संभावित अनियमितताओं को लेकर चेतावनी दी थी, तो उस पर समय रहते अमल क्यों नहीं किया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इन लोगों को बचाने में नागपुर या दिल्ली के प्रभावशाली केंद्रों की भूमिका थी?
खेड़ा ने आरोप लगाया कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े कई प्रभावशाली लोगों की भूमिका है और ऐसे में जवाबदेही तय होना जरूरी है। उन्होंने दावा किया कि ट्रस्ट के भीतर एफआईआर दर्ज कराने को लेकर भी अनिच्छा थी, लेकिन राज्य सरकार के दबाव के बाद कार्रवाई करनी पड़ी।
कांग्रेस नेता ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि यदि आस्था के सबसे बड़े केंद्र में पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं, तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यह स्पष्ट होना चाहिए कि प्रारंभिक चेतावनियों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अन्य राजनीतिक मुद्दों को उछालकर जनता का ध्यान मूल सवालों से भटकाने की कोशिश की जा रही है।
वहीं, भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि मामले में गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ कानून के तहत कड़ी कार्रवाई की जा रही है और उन्हें सामाजिक स्तर पर भी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी का कहना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दोषियों को सख्त सजा दिलाने का स्पष्ट संदेश दिया है और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।
हालांकि, राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा प्रश्न अभी भी यही बना हुआ है कि यदि SBI ने तीन महीने पहले ही कर्मचारियों को हटाने की सिफारिश कर दी थी, तो उस पर तत्काल अमल क्यों नहीं हुआ और आखिर उन लोगों को संरक्षण किस स्तर से मिल रहा था?
