बंगाल की बदलती राजनीति: क्या TMC की कमजोरी से वामपंथ की होगी वापसी?

Sachin Shekhar Jha

बंगाल में अगर कोई यह सोच रहा हो कि TMC की कमजोरी का सीधा फायदा BJP को मिलेगा या कांग्रेस खड़ी हो जाएगी तो शायद यह जल्दबाजी हो सकती है। यह तब ही सम्भव है जब वामदल निस्तेज पड़े रहेंगे। TMC की टूट और हार ने लेफ्ट को बड़ा मौका दिया है।

असल सवाल यह है कि क्या वामदल अपने बचे हुए 5-6 प्रतिशत वोट को 10-12 प्रतिशत तक पहुंचा सकते हैं?

क्योंकि अगर ऐसा हो गया, तो बंगाल की राजनीति का गणित अचानक बदल जाएगा। वामदलों को 35-40 प्रतिशत तक पहुंचने के लिए आज 35 प्रतिशत वोट जुटाने की जरूरत नहीं है। उन्हें सिर्फ अपने कोर वोट को मजबूत करना है और एक विश्वसनीय राजनीतिक विकल्प के रूप में खड़ा होना है। बाकी वोट राजनीतिक परिस्थितियां खुद उनके खाते में डाल सकती हैं।

यही तो ममता बनर्जी के साथ हुआ था।

2001 में ममता बनर्जी बंगाल की सर्वशक्तिमान नेता नहीं थीं। उनका अपना एक सीमित आधार था। लेकिन जैसे-जैसे वाम मोर्चे के खिलाफ माहौल बना, कांग्रेस का जनाधार कमजोर हुआ और अल्पसंख्यक मतदाता एक सुरक्षित विकल्प की तलाश में आए, वैसे-वैसे ममता का वोट शेयर बढ़ता गया। अंततः वही नेता 40 प्रतिशत से अधिक वोट पाने लगीं।

आज परिस्थितियां उलटी दिशा में बन रही हैं।

TMC की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ ममता बनर्जी नहीं थीं। उनकी ताकत वह विशाल सामाजिक गठबंधन था जिसमें अल्पसंख्यक वोट, गरीब तबके, ग्रामीण मतदाता और भाजपा विरोधी वोट शामिल थे। लेकिन जैसे-जैसे पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ रहा है और स्थानीय स्तर पर टूट-फूट की खबरें सामने आ रही हैं, यह गठबंधन पहले जैसा मजबूत नहीं रह गया है।

ऐसे में वामदलों के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी चुनाव लड़ने की नहीं, संगठन खड़ा करने की है।

अगर वे अगले कुछ वर्षों में अपना वोट शेयर 5-6 प्रतिशत से बढ़ाकर 10-12 प्रतिशत तक ले जाते हैं, छात्र-युवा आंदोलनों में सक्रिय होते हैं, मजदूर-किसान संगठनों को फिर से मजबूत करते हैं और TMC से निराश लोगों के लिए भरोसेमंद विकल्प बनते हैं, तो राजनीतिक ध्रुवीकरण का पूरा समीकरण बदल सकता है।

क्योंकि बंगाल में बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता हैं जो भाजपा को वोट नहीं देना चाहते, लेकिन TMC से भी संतुष्ट नहीं हैं। आज यह वोट बिखरा हुआ है। जिस दिन इसे कोई विश्वसनीय विकल्प दिखेगा, यह तेजी से एक दिशा में जा सकता है।

भारतीय राजनीति में इसकी मिसालें मौजूद हैं। राजस्थान की सीकर सीट से CPI(M) के अमरा राम की जीत हो या झारखंड के सिंदरी में 25 साल बाद भाकपा माले की वापसी, इन सफलताओं के पीछे कोई चमत्कार नहीं था। संगठन बचा रहा, समीकरण ने साथ दिया इसलिए मौका मिलने पर वोट वापस आया।

वामपंथ की राजनीति का इतिहास बताता है कि उसका वोट बैंक कई बार हार के लंबे दौर में भी पूरी तरह खत्म नहीं होता। यही कारण है कि दूसरे दल जहां चुनावी हार के बाद गायब हो जाते हैं, वहीं वामदल दशकों बाद भी वापसी की संभावना बनाए रखते हैं।

बंगाल में आज वामदलों के सामने चुनौती सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं है। चुनौती यह है कि वे खुद को उस राजनीतिक पात्र के रूप में स्थापित करें जिसमें TMC से निकलने वाला असंतोष, भाजपा विरोधी वोट और सामाजिक आंदोलनों की ऊर्जा एक साथ आ सके।

अगर वे यह कर पाए, तो 5 प्रतिशत से 40 प्रतिशत तक का सफर उतना असंभव नहीं होगा जितना आज दिखाई देता है।

(लेखक का परिचय- सचिन झा शेखर पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और लेखक हैं। वे NDTV और इंडियन एक्सप्रेस समूह सहित कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के लिए काम कर चुके हैं। राजनीतिक रिपोर्टिंग, जनआंदोलनों और चुनावी विश्लेषण में उनकी विशेष रुचि रही है। झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेता ए.के. रॉय पर लिखी उनकी पुस्तक ‘इंडियन कॉमरेड’ को व्यापक सराहना मिली है। वर्तमान में वे स्वतंत्र पत्रकार और पॉलिटिकल डेटा एनालिस्ट के रूप में कार्यरत हैं)

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