RANCHI
सारथी द्वारा 22–23 जुलाई 2026 को ऑड्रे हाउस, रांची में आयोजित “जलवायु अखड़ा 2026” के अवसर पर जलवायु परिवर्तन, जल-जंगल-जमीन, जैव विविधता संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा, आदिवासी स्वशासन, महिलाओं के नेतृत्व तथा समुदाय-आधारित विकास जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विविध कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी क्रम में देशज अभिक्रम, असर एवं लिव फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में पेंटिंग एवं छायाचित्र प्रदर्शनी का आयोजन किया गया, जिसने जलवायु संकट और विकास के वर्तमान मॉडल पर गंभीर विमर्श को नई दिशा दी।
प्रदर्शनी का प्रमुख आकर्षण “जेंडर और क्लाइमेट चेंज” विषय पर आधारित झारखंड की 19 युवा महिला कलाकारों की पेंटिंग प्रदर्शनी रही। दिव्याश्री, अनुकृति टोप्पो, सस्मि रेखा पात्र, अर्पिता राज नीरद, सुधा कुमारी, निशी कुमारी, सृजिता, रोशनी खलखो, मनिता कुमारी उराँव, ज्योति वंदना लकड़ा, मानसी टोप्पो, रितेश्ना राज, चाँदनी कुमारी, काराबी दास, सोफिया मिंज, तान्या मिंज, नीलम नीरद, रंजीता सिंह और पिंकी कुमारी की कृतियों ने जलवायु संकट को महिलाओं के अनुभवों और संवेदनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया।
इन चित्रों में जंगलों की कटाई, खनन, विस्थापन, बाढ़, सूखा, जल संकट और औद्योगीकरण के दुष्प्रभावों के साथ-साथ महिलाओं के श्रम, संघर्ष और प्रकृति से उनके गहरे रिश्ते को प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया गया है। कुछ कृतियाँ वर्षा जल संचयन, पर्यावरण-अनुकूल आवास और सामुदायिक समाधान की संभावनाएँ भी प्रस्तुत करती हैं। पूरी प्रदर्शनी यह संदेश देती है कि जलवायु संकट केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और मानवीय गरिमा से जुड़ा प्रश्न भी है।
प्रदर्शनी में वरिष्ठ चित्रकार शेखर की चर्चित चित्र-श्रृंखला “सिम्फ़नी इन ब्लैक” भी प्रदर्शित की गई। श्वेत-श्याम रंगों में रची गई इस श्रृंखला की तीनों कृतियाँ प्रकृति, मनुष्य और विकास के बीच बढ़ते तनाव की गहन कलात्मक व्याख्या प्रस्तुत करती हैं। अमूर्त आकृतियों, प्रतीकों और ज्यामितीय संरचनाओं के माध्यम से कलाकार ने पर्यावरणीय संकट, विस्थापन, मानवीय असुरक्षा और बदलते प्राकृतिक परिदृश्यों को संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया है। यह श्रृंखला दर्शकों को केवल चित्र देखने के लिए नहीं, बल्कि उनके भीतर छिपे सामाजिक और पर्यावरणीय प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करने के लिए प्रेरित करती है। पुनिता कुमारी की सोहराय पेंटिंग की भी पेंटिंग प्रदर्शित की गयी है।
इसी क्रम में आयोजित “खनन, पर्यावरण और समुदाय” विषयक छायाचित्र प्रदर्शनी ने विशेष रूप से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। इस प्रदर्शनी में छायाकार गुड्डू वर्मा, शशि शंकर, फिलिप कुजूर, श्रीनिवास कुरूगंती, डॉ. नीतिश प्रियदर्शी, अपु पॉल तथा शेखर के चयनित छायाचित्र प्रदर्शित किए गए हैं। इन तस्वीरों में झारखंड के जल, जंगल, जमीन और आदिवासी जीवन पर खनन तथा तथाकथित विकास परियोजनाओं के प्रभाव को अत्यंत संवेदनशील और प्रामाणिक दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है।
छायाचित्रों में एक ओर घने जंगल, पहाड़, नदियाँ, ग्रामीण जीवन और प्रकृति की समृद्ध विरासत दिखाई देती है, तो दूसरी ओर खुली खदानें, प्रदूषित जलस्रोत, धूल-धुआँ, उजड़ते गाँव, नष्ट होते पहाड़ और विस्थापन की त्रासदी भी स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती है। अनेक तस्वीरों में महिलाएँ, बच्चे और आदिवासी समुदाय अपने दैनिक जीवन, श्रम और संघर्ष के बीच दिखाई देते हैं, जो यह बताती हैं कि प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन की सबसे बड़ी कीमत स्थानीय समुदायों को चुकानी पड़ती है।
प्रदर्शनी केवल कलाकृतियों और छायाचित्रों का संग्रह नहीं है, बल्कि पर्यावरणीय न्याय, सामुदायिक अधिकारों, संस्कृति, आजीविका और टिकाऊ विकास पर संवाद का एक सशक्त मंच है। यह दर्शकों को यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि विकास तभी सार्थक और न्यायपूर्ण हो सकता है, जब वह प्रकृति के संरक्षण, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और उनके संवैधानिक अधिकारों के सम्मान के साथ आगे बढ़े।
“जलवायु अखड़ा 2026” में आयोजित यह कला एवं छायाचित्र प्रदर्शनी इस बात का सशक्त उदाहरण है कि कला केवल सौंदर्यबोध का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, जनसंवाद और परिवर्तन की प्रेरक शक्ति भी है। यह प्रदर्शनी जलवायु संकट, खनन और विकास के प्रश्नों पर समाज को संवेदनशील बनाते हुए एक न्यायपूर्ण, समतामूलक और पर्यावरण-सम्मत भविष्य की दिशा में सामूहिक सोच को प्रोत्साहित करती है।
