Ranchi
रांची विश्वविद्यालय में शोध निर्देशक संकट गहराया, स्थानीय छात्रों ने उठाए पारदर्शिता और प्राथमिकता पर सवाल
राज्य के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शामिल रांची विश्वविद्यालय इन दिनों शोध व्यवस्था को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में है। विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा (टीआरएल) विभाग से नेट-जेआरएफ उत्तीर्ण छात्र-छात्राएं पिछले कई वर्षों से शोध निर्देशक के लिए भटक रहे हैं, जबकि दूसरी ओर अन्य विश्वविद्यालयों से आए शोधार्थियों को अपेक्षाकृत आसानी से गाइड उपलब्ध कराए जाने के आरोप सामने आ रहे हैं। इस स्थिति ने विश्वविद्यालय की शोध प्रणाली, पारदर्शिता और समान अवसर की नीति पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
स्थानीय छात्रों का आरोप : अपने ही विश्वविद्यालय में हो रहे उपेक्षित
टीआरएल विभाग के कई नेट-जेआरएफ योग्य शोधार्थियों ने आरोप लगाया है कि विश्वविद्यालय अपने ही विभाग के विद्यार्थियों की अनदेखी कर रहा है। छात्राओं तन्नु कुमारी, प्रिया ठाकुर, दीपिका कुमारी, प्रीति मुंडा और शिल्पा कच्छप ने बताया कि वे पिछले ढाई वर्षों से लगातार विभाग और विश्वविद्यालय प्रशासन के चक्कर लगा रही हैं, लेकिन अब तक उन्हें शोध निर्देशक उपलब्ध नहीं कराया गया है।
इन छात्राओं का कहना है कि समय पर शोध निर्देशक नहीं मिलने के कारण कई छात्रों की जेआरएफ अवधि समाप्त हो चुकी है, जबकि कई की समय-सीमा समाप्ति के कगार पर है। इससे न केवल उनका शैक्षणिक भविष्य प्रभावित हो रहा है, बल्कि आर्थिक और मानसिक दबाव भी लगातार बढ़ता जा रहा है।
“निज घरे बनली परदेसी” : छात्रों का छलका दर्द
टीआरएल विभाग के शोधार्थी भवेश कुमार, संदीप कुमार और राजेश मुण्डा ने नाराजगी जताते हुए कहा “निज घरे बनली परदेसी।”
उन्होंने बताया कि उन्होंने लगभग दो वर्ष पूर्व ही शोध निर्देशक हेतु विभाग और विश्वविद्यालय में आवेदन जमा किया था, लेकिन आज तक उन्हें गाइड नहीं मिल पाया। वहीं वर्ष 2025 में नेट-जेआरएफ उत्तीर्ण अन्य विश्वविद्यालयों के छात्रों को शोध निर्देशक आवंटित किए जा रहे हैं।
उनका कहना है कि यह स्थिति स्थानीय छात्रों के साथ सीधी नाइंसाफी है। जिन छात्रों ने इसी विश्वविद्यालय से अध्ययन किया, शोध की तैयारी की और नेट-जेआरएफ जैसी कठिन परीक्षा उत्तीर्ण की, आज वही छात्र अपने ही संस्थान में उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं।
कई आवेदन, फिर भी नहीं हुई कार्रवाई
प्रभावित शोधार्थियों ने बताया कि वे इस संबंध में कई बार लिखित आवेदन विश्वविद्यालय प्रशासन को दे चुके हैं। कुलसचिव और डीएसडब्ल्यू कार्यालय को भी समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई। छात्रों का आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस गंभीर मामले को लगातार टालता रहा है।
शोधार्थियों का कहना है कि यदि समय रहते उन्हें शोध निर्देशक उपलब्ध नहीं कराया गया, तो वर्षों की मेहनत और उनकी शैक्षणिक उपलब्धियां व्यर्थ हो जाएंगी।
शोध व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
शिक्षा जगत के जानकारों का मानना है कि यह मामला केवल शोध निर्देशक की कमी भर नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालय की नीतिगत अस्पष्टता और प्रशासनिक निष्क्रियता का उदाहरण बनता जा रहा है। सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर किन मानकों के आधार पर शोधार्थियों को प्राथमिकता दी जा रही है।
छात्रों और शिक्षाविदों के बीच यह चर्चा भी तेज हो गई है कि कहीं शोध निर्देशक आवंटन प्रक्रिया में प्रभाव, पक्षपात या “कमीशन संस्कृति” तो हावी नहीं हो रही। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार बढ़ते असंतोष ने विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
झारखंडी भाषाओं और शोध पर पड़ सकता है गंभीर प्रभाव
विशेषज्ञों का कहना है कि जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं से जुड़े शोधार्थियों की उपेक्षा केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि यह झारखंड की भाषायी-सांस्कृतिक विरासत और शोध परंपरा को भी प्रभावित करने वाला मुद्दा है। यदि नेट-जेआरएफ जैसे योग्य शोधार्थियों को समय पर शोध निर्देशक नहीं मिलेंगे, तो भविष्य में छात्र शोध के प्रति हतोत्साहित होंगे।
यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक इसलिए भी है क्योंकि झारखंड की क्षेत्रीय एवं आदिवासी भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और अकादमिक विकास में टीआरएल विभाग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
राजभवन और राज्य सरकार से हस्तक्षेप की मांग
छात्रों और शिक्षा जगत के लोगों ने राज्य सरकार, विश्वविद्यालय प्रशासन और राजभवन से मामले में हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि कुलपति को इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए तथा यह स्पष्ट करना चाहिए कि शोध निर्देशक आवंटन की प्रक्रिया क्या है और किन मानकों के आधार पर छात्रों को प्राथमिकता दी जा रही है।
शोधार्थियों ने यह भी मांग की है कि विश्वविद्यालय में एक पारदर्शी और समयबद्ध नीति बनाई जाए, ताकि भविष्य में किसी भी छात्र को इस प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े।
विश्वविद्यालय की साख पर उठ रहे सवाल
लगातार बढ़ते असंतोष ने विश्वविद्यालय की शोध प्रणाली और प्रशासनिक कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो इसका प्रतिकूल प्रभाव विश्वविद्यालय की शैक्षणिक साख, शोध संस्कृति और छात्रों के भविष्य पर पड़ सकता है।
वर्तमान में टीआरएल संकाय में 70 फीसदी शोध छात्र छात्राएं डीएसपीएमयू के पंजीकृत हैं। नौ भाषाओं में ये आंकड़ा सबसे अधिक खोरठा, नागपुरी, कुरमाली, पंचपरगनिया और मुंडारी में हैं।
