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पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 ने इस बार कई नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। सबसे खास बात यह रही कि इस चुनाव में समाज के बेहद साधारण और संघर्षशील वर्ग से आई महिलाओं ने न केवल चुनाव लड़ा, बल्कि शानदार जीत दर्ज कर राजनीतिक समीकरण ही बदल दिए। नौकरानी से लेकर आदिवासी महिला तक, इन चेहरों ने यह साबित कर दिया कि जमीनी संघर्ष और जनसमर्थन के दम पर किसी भी राजनीतिक किले को फतह किया जा सकता है। इस चुनाव में पांच ऐसे महिला चेहरे उभरकर सामने आए हैं, जिन्होंने पूरे चुनावी ककहरा को नई दिशा दी। इनमें RG Kar रेप पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ, घरेलू कामगार कलिता माझी, आदिवासी नेता मैना मुर्मू, सादगी से चुनाव लड़ने वाली इला रानी रॉय और संदेशखाली कांड की पीड़िता रेखा महापात्रा शामिल हैं।
रत्ना देबनाथ (पानीहाटी सीट)
पानीहाटी विधानसभा सीट इस चुनाव में सबसे चर्चित सीटों में रही, जहां RG Kar रेप पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ ने BJP के टिकट पर जीत दर्ज की। उनका मुकाबला TMC के तीर्थंकर घोष से था, जो पांच बार के विधायक के बेटे हैं। रत्ना देबनाथ की उम्मीदवारी ही इस चुनाव को भावनात्मक और राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बना चुकी थी। उन्होंने चुनाव से पहले ही साफ कहा था कि यह लड़ाई उनकी बेटी और राज्य की महिलाओं की सुरक्षा के लिए है।
चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें लोगों का जबरदस्त समर्थन मिला। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य की सत्ता और प्रशासन उनकी बेटी के न्याय में असफल रहा। जीत के बाद उन्होंने कहा कि वह एक जनप्रतिनिधि के रूप में अपनी बेटी के अधूरे सपनों को आगे बढ़ाएंगी। इस सीट पर शासन, जवाबदेही और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दे सीधे जनता के बीच केंद्र में रहे, जिसने पारंपरिक राजनीतिक निष्ठाओं को भी चुनौती दी।
कलिता माझी (औसग्राम सीट)
औसग्राम सीट से जीत हासिल करने वाली कलिता माझी की कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं है। 37 वर्षीय कलिता माझी एक घरेलू कामगार रही हैं और उन्होंने कभी औपचारिक शिक्षा भी प्राप्त नहीं की। बावजूद इसके, उन्होंने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार को 12,535 वोटों से हराया।
दो दशकों तक घरों में काम करने वाली माझी अपने इलाके में लोगों के साथ गहरे संबंध के लिए जानी जाती हैं। कई परिवार उन्हें अपने सदस्य की तरह मानते हैं। यही जुड़ाव उनकी सबसे बड़ी ताकत बना। चुनाव के दौरान भी उन्होंने अपने रोजमर्रा के काम और जनसंपर्क दोनों को संतुलित रखा। उनकी जीत यह दर्शाती है कि ईमानदारी, भरोसा और मेहनत राजनीति में भी निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
मैना मुर्मू (मानबाजार सीट)
पुरुलिया जिले की मानबाजार सीट से भाजपा उम्मीदवार मैना मुर्मू ने एक बड़ी जीत दर्ज की। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की मजबूत उम्मीदवार को 27,283 वोटों के अंतर से हराया। आदिवासी पृष्ठभूमि से आने वाली मैना मुर्मू का जीवन संघर्षों से भरा रहा है।
जंगलों से लकड़ी लाकर चूल्हा जलाना और बारिश पर निर्भर खेती के सहारे जीवन यापन करना उनके जीवन का हिस्सा रहा है। उन्होंने सालों तक अपने क्षेत्र में पानी, सड़क और बुनियादी सुविधाओं के लिए छोटे-छोटे आंदोलन किए। जब उन्होंने चुनावी मैदान में कदम रखा, तो उन्हें एक मजबूत और स्थापित नेता के खिलाफ कमजोर माना जा रहा था। लेकिन नतीजों ने यह साबित कर दिया कि जनता ने उनके संघर्ष और सच्चाई को पहचाना।
इला रानी रॉय (मेखलीगंज सीट)
मेखलीगंज (SC) सीट से कांग्रेस उम्मीदवार इला रानी रॉय ने अपनी सादगी और जमीनी जुड़ाव के दम पर जीत हासिल की। उन्होंने बिना किसी बड़े संसाधन या प्रचार तंत्र के चुनाव लड़ा।
साइकिल और पैदल चलकर उन्होंने पूरे क्षेत्र में जनसंपर्क किया। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके लंबे समय से किए गए काम ने उन्हें जनता के बीच विश्वसनीय बनाया। लोगों ने खुद चंदा इकट्ठा कर उनके चुनाव अभियान को समर्थन दिया।
उनकी जीत इस बात का प्रमाण है कि राजनीति में आज भी ईमानदार और सीधा संवाद जनता के दिल तक पहुंचता है। यह जीत उस पुरानी चुनावी परंपरा की वापसी का संकेत भी देती है, जहां नेता और जनता के बीच सीधा संबंध होता है।
रेखा महापात्रा (हिंगलगंज सीट)
संदेशखाली कांड की पीड़िता रेखा महापात्रा की जीत इस चुनाव का सबसे भावनात्मक और प्रतीकात्मक परिणाम रही। उन्होंने हिंगलगंज सीट से तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार को 5421 वोटों से हराया।
2024 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और इस बार विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कर एक मजबूत संदेश दिया। संदेशखाली की घटना के बाद जो आवाज पूरे देश में गूंजी थी, उसे यहां के मतदाताओं ने समर्थन में बदल दिया।
रेखा महापात्रा की उम्मीदवारी सिर्फ एक चुनावी लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह सम्मान, न्याय और साहस की लड़ाई थी। बिना किसी राजनीतिक अनुभव और संसाधनों के, उन्होंने उन महिलाओं की आवाज को प्रतिनिधित्व दिया, जो लंबे समय से भय और अन्याय के साये में जी रही थीं।
इस चुनाव ने साफ कर दिया है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में अब केवल बड़े नाम या संसाधन ही निर्णायक नहीं हैं, बल्कि जमीनी संघर्ष, विश्वास और जनसमर्थन ही असली ताकत बनकर उभर रहे हैं। महिलाओं की यह जीत आने वाले समय में राज्य की राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
