इजरायली हमले में मारी गई “हिन्द रज़ब” को याद करते हुए नीतिशा खलखो की कविता

नीतिशा खलखो

तुमने पुकारा था

उस इंसानी क़ौम को,

जिसकी गोद में

तुमने जन्म लिया था।

तुम आई थीं इस दुनिया में

दो मासूम अनुभूतियों के साथ

एक,

अपनी तकलीफ़ को

रोकर कह देना,

और दूसरी

इस सृष्टि की सुंदरता पर ठहरकर

साँसों की लय में

धीरे से मुस्का  देना।

पर एक तीसरी अनुभूति

जो तुम्हारी उम्र की थी ही नहीं

हमने ही बो दी तुम्हारे भीतर वह :

डर

ख़ौफ़

और इसके लिए

हम हमेशा

शर्मिंदा रहेंगे।

अभी तो तुम्हें

जीवन के  अनगिनत रंगों से गुजरना था,

अनुभूतियों के आकाश में

उड़ना था,

पर तुम्हारे हिस्से जो आया वह धूसर था,

मटमैला था,

खून से लथपथ वीभत्स था।

पर हमने

अपनी अंधी आस्थाओं में

धार्मिक उन्माद में

सत्ता शक्ति की भूख में

तुम्हारी काँपती हुई आवाज़ तक को

अनसुना कर दिया।

वह आवाज़,

जो कह रही थी

एक नन्हीं-सी जान

डर रही है।

एक बंद कार में,

अपने ही अपनों की निस्तब्ध चेतानहीन  हो चुके

लहू में भीगे देहों के बीच,

तुम सिमट गई थीं

एक कॉल में

समेट रही थी तुम अपना अस्तित्व भी

और भय से लिपटकर

बस इतना ही कह पाईं

मुझे यहाँ से ले जाओ ना…”

तुम्हारे चारों ओर

मौत का शोर था

टैंकों की गड़गड़ाहट,

गोलियों की बरसात,

और हर दिशा में

विनाश का फैलता अंधकार

जिसमें तुम्हें भी

समा जाना था

ना जाने अब

और तब ।

पर तुम्हारी वह निरीह पुकार

मानवता के नाम

समय की दीवारों पर

हमेशा गूँजती रहेगी।

वह आवाज़

हमारी चेतना में

काँटे की तरह चुभेगी,

और हमें हमारे मानवहोने पर

एक अंतहीन प्रश्न बनकर

ठहरी रहेगी।

कितना रोया होगा

यह आकाश, धरा, वायु  भी

तुम्हारी हर एक जीने की पुकार के साथ!

अगर यह कोई प्राकृतिक अंत होता,

तो शायद

सब्र होता

पर यह

हमारी ही रची हुई

एक नृशंस कहानी थी,

जहाँ पहले से तय था

कि तुम्हारी साँसें छीन ली जाएँगी,

और दुनिया

बस देखती रहेगी।

वजह  ??

बस तुम्हारी पहचान

तुमसे तुम्हारी साँसें ले लेगा।।

कभी उल्कापिंडों ने भी

डायनासोरों को खत्म किया था

वह प्रकृति थी।

पर यह

यह मनुष्य है।

और उसकी

सबसे भयावह रचना।

हम शर्मिंदा हैं, हिन्द रज़ब

कि तुम्हें

बस छह बरस की उम्र दे सके।

घृणा है हमें

इन युद्धों से,

इन खोखले धार्मिक आडंबरों से

सत्ता व शक्ति की आराधना से

जिन्होंने

इंसानियत को

निगल लिया है।

हम गुनाहगार हैं तुम्हारे

और शायद

क्षमा के योग्य भी नहीं।

अगर फिर कभी

जन्म चुनना

तो यह धरा मत चुनना,

जहाँ आदमीयत ही

ज़िंदगियों पर भारी पड़ती है।

जहां सृजन का

शांति का अमन का

कोई मोल नहीं।।

ज़िंदगियाँ जो दे नहीं सकते

उसको लूटने का हक़

एक इनसान के पास

कैसे भला हो सकता था?

शायद नहीं बल्कि यकीनन

जानवर होना बेहतर है

जहाँ युद्ध होते हैं,

पर सिर्फ

जीवित रहने के लिए।

सर्वाइयवल के लिये।

परंतु

यहाँ युद्ध हैं

हड्डियों को चबाने के लिए,

मांस के लोथड़ों  को नोचने के लिए,

और वह भी

मासूमों का।

आज मनुष्य

हैवानियत की नई परिभाषा लिख रहा है।

और तुम जीने की ;

अपनी अंतिम कोशिशों में

हमें एक प्रश्न दे गई :

क्या हमने पाया?

मौत!!

या मौत का विस्तार!!

फिर भी; याद रखें

गाज़ा की सरज़मीं कहती है –

वह ज़िंदा था,

 वह ज़िंदा है,

और  वह ज़िंदा रहेगा

इन तमाम आहुतियों के बाद भी।

कहीं और ज़्यादा मज़बूती से।।

तुम्हारी शहादत

अब एक मशाल  है

जो हर आँसू में,

हर सिसकी में

जलता रहेगा।

अब हमें तय करना ही होगा

कि हम अपने हिस्से का अपराध माने,

और यह संकल्प लें

कि अब कोई और  हिन्द रज़ब नहीं,

अब कोई और  युद्ध नहीं।

क्योंकि

सृजन की इस दुनिया में

कोई स्थान नहीं;

विध्वंस का,

हत्याओं का,

लूट का,

और शक्ति-पूजा का।

कवियत्री का परिचय: नीतिशा बी.एस.के. कॉलेज, मैथन (झारखंड) में हिंदी विभाग की अध्यक्ष हैं। सामयिक विषयों पर लगातार लिखती हैं और मीरा फेलोशिप सहित कई सम्मान पा चुकी हैं।

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