VISHAD KUMAR
झारखंड के सभी विश्वविद्यालयों एवं उनके अंगीभूत महाविद्यालयों में शैक्षणिक तथा गैर-शैक्षणिक पदों के पुनर्गठन (Restructuring) से संबंधित उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग, झारखंड सरकार के संकल्प में Clustering of Colleges के अलावा भी कई ऐसे बिंदु हैं, जिन पर छात्र संगठन आइसा की गंभीर आपत्तियाँ हैं। अन्य संगठन इसे केवल Cluster System तक सीमित रखते हुए बाकी महत्वपूर्ण मुद्दों को दबाने की कोशिश कर रहे हैं।
इन सभी बिंदुओं को स्पष्ट करने के लिए आइसा (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) द्वारा भाकपा (माले) का राज्य कार्यालय, महेंद्र सिंह भवन, रांची में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि केवल Clustering of Colleges ही नहीं, बल्कि कई अन्य बिंदुओं पर भी आइसा की गंभीर आपत्ति है। संकल्प के खिलाफ छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों के बीच जागरूकता अभियान, हस्ताक्षर अभियान और महाविद्यालय-विश्वविद्यालय स्तर पर विरोध कार्यक्रम चलाए जाएंगे। इसके बाद झारखंड के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के छात्रों को एकजुट करते हुए विभाग का घेराव और संकल्प को रद्द कराने के लिए वृहद मार्च आयोजित किया जाएगा।
आइसा झारखंड राज्य सचिव त्रिलोकीनाथ ने कहा कि “कॉलेज और विश्वविद्यालयों को क्लस्टरों में बांटने पर अन्य संगठनों की आपत्तियाँ तो हैं ही, लेकिन आइसा कई अतिरिक्त बिंदुओं पर भी विरोध दर्ज करता है। संकल्प के छिपे उद्देश्यों को समझना आवश्यक है। रूसा (2013) के स्पष्ट निर्देश के अनुसार केंद्र की रेगुलेशन को राज्यों द्वारा मानना अनिवार्य है।”
त्रिलोकीनाथ ने आगे कहा कि “इसी आधार पर एनईपी 2020 के अंतर्गत यह शर्त जोड़ दी गई है कि विश्वविद्यालयों के अंतर्गत आने वाले कॉलेजों को तभी फंड मिलेगा, जब वे क्लस्टर प्रणाली में विभाजित किए जाएं। यह शिक्षा पर राज्य के अधिकार, अर्थात समवर्ती सूची की भावना पर सीधा हमला है। इससे छात्रों को एक जगह बहु विषयक शिक्षा प्राप्त करने से वंचित होना पड़ेगा। कॉलेजों के छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को अपने मूल संस्थान से हटकर अन्य संस्थानों में जाना पड़ेगा, जहां बुनियादी सुविधाओं की कमी और आर्थिक बोझ बढ़ेगा। नजदीकी संस्थान में सीट न मिलने की स्थिति में छात्र शिक्षा छोड़ने को भी मजबूर होंगे। कॉलेजों को कॉर्पोरेट मॉडल पर चलाया जाएगा, जिसका उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण व शोधपरक शिक्षा नहीं, बल्कि लाभ कमाकर डिग्री वितरण भर रह जाएगा।”
राज्य उपाध्यक्ष विजय कुमार ने कहा कि “29 अप्रैल 2026 को जारी संकल्प में Clustering of Colleges विवाद का केवल एक छोटा हिस्सा है। संकल्प में छात्रों के नामांकन में वृद्धि को रोकने, कॉलेजों के दायरे को सीमित करने तथा असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, प्रोफेसर और विभिन्न स्तर के कर्मचारियों के स्थायी पदों में भारी कटौती की योजना शामिल है।”
उन्होंने आगे कहा कि “क्लस्टर प्रणाली लागू होने से सभी कॉलेजों में उपलब्ध विषय अब अलग-अलग संकायों—जैसे विज्ञान, कला, वाणिज्य, वोकेशनल या शिक्षा संकाय, में विभक्त कर दिए जाएंगे। यहां तक कि कला संकाय में भी एक ही स्थान पर सभी विषयों की पढ़ाई का विकल्प उपलब्ध नहीं होगा। इसका परिणाम यह होगा कि छात्र निजी संस्थानों की ओर मजबूर होंगे, जहाँ शिक्षा माफियाओं द्वारा वाणिज्यिकरण के नाम पर भारी फीस वसूली जाती है। इसका खामियाजा लगातार छात्र और अभिभावक उठाते आ रहे हैं।”
अवसर पर राज्य सह सचिव संजना मेहता ने कहा कि “4 वर्षीय स्नातक कोर्स में मल्टीपल एंट्री और मल्टीपल एग्जिट की व्यवस्था की बात कही गई है। एनईपी के अनुसार एक वर्ष में पढ़ाई छोड़ने पर सर्टिफिकेट, दो वर्ष में डिप्लोमा, तीन वर्ष में डिग्री और चार वर्ष में शोध के क्षेत्र में प्रवेश मिलेगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि शोध निदेशक की कमी के कारण यूजीसी-नेट, जेआरएफ और गेट पास छात्र तक प्रवेश से वंचित रह जाते हैं। विश्वविद्यालय की परीक्षा लेने की स्वायत्तता (Autonomy) भी समाप्त की जा रही है। एनईपी लागू हुए 6 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन मल्टीपल एंट्री-एग्जिट से कितने छात्रों को सर्टिफिकेट/डिप्लोमा/डिग्री मिलने से रोजगार मिला, इसका कोई उल्लेख नहीं है। दूसरी ओर रेगुलर कोर्स खत्म कर सेल्फ-फाइनेंस और वोकेशनल कोर्स को बढ़ावा दिया जा रहा है, जहाँ कई गुना रूपया वसूला जाएगा।”
आइसा एक्टिविस्ट सोनाली केवट ने कहा कि “नियम लागू होने से शिक्षा संकाय पूरी तरह सेल्फ-फाइनेंस मोड में चला जाएगा। स्कूली शिक्षा विभाग द्वारा संचालित राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान और राजकीय महिला प्रशिक्षण संस्थान को भी आरयू के अधीन किया जाएगा। इससे कम खर्च में उपलब्ध बीएड-एमएड की पढ़ाई अब लाखों रुपये की फीस वसूली में बदल जाएगी, और अच्छे शिक्षक तैयार करने का उद्देश्य समाप्त हो जाएगा।”
आइसा डीएसपीएमयू अध्यक्ष अनुराग रॉय ने कहा कि “यदि केवल रांची विश्वविद्यालय के संदर्भ में संकल्प को देखें तो क्षेत्रीय भाषाएँ, नागपुरी, कुरूख, खोरठा, संथाली आदि, तथा सांख्यिकी जैसे महत्वपूर्ण विषयों की पढ़ाई रोकने का प्रावधान है। शिक्षकों को अंडर-यूटिलाइज्ड और ओवर-बर्डन्ड दिखाकर पदों को समाप्त करने की तैयारी है। रांची विश्वविद्यालय में वर्तमान में यूजी और पीजी में 1.10 लाख से अधिक छात्र नामांकित हैं। यूजीसी के मानक अनुसार यहां 3600 से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति होनी चाहिए, जबकि महज़ लगभग 700 शिक्षकों के भरोसे पूरी व्यवस्था चल रही है। सरकार की योजना है, जनता के धन से अवसंरचना बनाना, संस्थानों को कमजोर करना, बाद में घाटा दिखाकर कमेटी बैठाना और अंततः निजीकरण की सिफारिश करना। इसका परिणाम यह होगा कि सार्वजनिक संस्थान कॉर्पोरेट हाथों में चले जाएंगे, जहां लाखों-करोड़ों की फीस लेकर केवल डिग्री वितरण केंद्र बना दिया जाएगा।”
