Ranchi
रांची विश्वविद्यालय के नागपुरी विभाग में संचालित पीएचडी कोर्स वर्क की कक्षा में शोधार्थियों के लिए विशेष विशेषज्ञ व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस अवसर पर रांची विश्वविद्यालय के विद्वान प्राध्यापक डॉ. आनन्द ठाकुर ने शोध प्रक्रिया में तकनीक की भूमिका, कंप्यूटर एवं डिजिटल संसाधनों के उपयोग, प्लेगरिज्म (साहित्यिक चोरी) से बचाव तथा शोध कार्य को अधिक व्यवस्थित, प्रमाणिक और गुणवत्तापूर्ण बनाने के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की।
डॉ. ठाकुर ने कहा कि वर्तमान डिजिटल युग में शोध कार्य केवल पुस्तकों और पारंपरिक स्रोतों तक सीमित नहीं रह गया है। इंटरनेट, डिजिटल पुस्तकालय, ऑनलाइन शोध-पत्रिकाओं, ई-संसाधनों तथा विभिन्न तकनीकी उपकरणों ने शोधार्थियों के लिए ज्ञान के व्यापक संसार के द्वार खोल दिए हैं। हालांकि तकनीक का उपयोग तभी सार्थक है, जब शोधार्थी उसका प्रयोग विवेक, मौलिकता और अकादमिक नैतिकता के साथ करें।
उन्होंने शोधार्थियों को प्लेगरिज्म की अवधारणा से अवगत कराते हुए कहा कि किसी दूसरे लेखक के विचार, सामग्री अथवा शोध-निष्कर्ष को बिना उचित संदर्भ और स्रोत का उल्लेख किए अपने नाम से प्रस्तुत करना अकादमिक दृष्टि से गंभीर त्रुटि है। उन्होंने शोध लेखन में संदर्भ, उद्धरण, स्रोत-सत्यापन और मौलिक चिंतन के महत्व को रेखांकित करते हुए शोधार्थियों को साहित्यिक चोरी से बचने के व्यावहारिक उपाय भी बताए।
डॉ ठाकुर ने कंप्यूटर के माध्यम से शोध सामग्री के संकलन, दस्तावेजों के व्यवस्थित रख-रखाव, आंकड़ों के प्रबंधन, शोध-पत्र तैयार करने तथा डिजिटल स्रोतों के उपयोग से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। उन्होंने कहा कि तकनीक शोधार्थी के लिए केवल सुविधा का साधन नहीं, बल्कि शोध की विश्वसनीयता, गति और गुणवत्ता बढ़ाने का प्रभावी माध्यम है। आवश्यकता इस बात की है कि शोधार्थी तकनीकी दक्षता के साथ-साथ शोध की मूल भावना यथा तथ्यपरकता, मौलिकता और सत्यनिष्ठा को भी बनाए रखें।
उन्होंने शोधार्थियों से नियमित अध्ययन, प्राथमिक एवं द्वितीयक स्रोतों के तुलनात्मक अध्ययन और विषय से संबंधित नवीन शोध कार्यों से निरंतर जुड़ने का आह्वान किया। व्याख्यान के दौरान शोधार्थियों ने शोध प्रक्रिया और तकनीकी संसाधनों से संबंधित विभिन्न प्रश्न भी पूछे, जिनका विशेषज्ञ द्वारा उदाहरणों सहित समाधान किया गया।
इस अवसर पर विभागाध्यक्ष डॉ. उमेश नन्द तिवारी, पीएचडी कोर्स वर्क के कोर्स को-ऑर्डिनेटर डॉ. मनोज कच्छप एवं नामांकन प्रभारी डॉ. बीरेन्द्र कुमार महतो व डॉ रीझू नायक ने विशेषज्ञ डॉ. आनन्द ठाकुर का पौधा भेंट कर शिष्टाचारपूर्वक स्वागत किया। विभागीय पदाधिकारियों ने कहा कि इस प्रकार के विशेषज्ञ व्याख्यान शोधार्थियों को शोध की बदलती तकनीकों और अकादमिक मानकों से परिचित कराने के साथ-साथ उनके शोध कार्य को अधिक वैज्ञानिक एवं गुणवत्तापूर्ण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कार्यक्रम में पीएचडी कोर्स वर्क से जुड़े शोधार्थियों की सक्रिय सहभागिता रही।
रांची विश्वविद्यालय – PhD शोध में तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग शोध की गुणवत्ता को देगा नई दिशा– आनंद
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रांची विश्वविद्यालय के नागपुरी विभाग में संचालित पीएचडी कोर्स वर्क की कक्षा में शोधार्थियों के लिए विशेष विशेषज्ञ व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस अवसर पर रांची विश्वविद्यालय के विद्वान प्राध्यापक डॉ. आनन्द ठाकुर ने शोध प्रक्रिया में तकनीक की भूमिका, कंप्यूटर एवं डिजिटल संसाधनों के उपयोग, प्लेगरिज्म (साहित्यिक चोरी) से बचाव तथा शोध कार्य को अधिक व्यवस्थित, प्रमाणिक और गुणवत्तापूर्ण बनाने के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की।
डॉ. ठाकुर ने कहा कि वर्तमान डिजिटल युग में शोध कार्य केवल पुस्तकों और पारंपरिक स्रोतों तक सीमित नहीं रह गया है। इंटरनेट, डिजिटल पुस्तकालय, ऑनलाइन शोध-पत्रिकाओं, ई-संसाधनों तथा विभिन्न तकनीकी उपकरणों ने शोधार्थियों के लिए ज्ञान के व्यापक संसार के द्वार खोल दिए हैं। हालांकि तकनीक का उपयोग तभी सार्थक है, जब शोधार्थी उसका प्रयोग विवेक, मौलिकता और अकादमिक नैतिकता के साथ करें।
उन्होंने शोधार्थियों को प्लेगरिज्म की अवधारणा से अवगत कराते हुए कहा कि किसी दूसरे लेखक के विचार, सामग्री अथवा शोध-निष्कर्ष को बिना उचित संदर्भ और स्रोत का उल्लेख किए अपने नाम से प्रस्तुत करना अकादमिक दृष्टि से गंभीर त्रुटि है। उन्होंने शोध लेखन में संदर्भ, उद्धरण, स्रोत-सत्यापन और मौलिक चिंतन के महत्व को रेखांकित करते हुए शोधार्थियों को साहित्यिक चोरी से बचने के व्यावहारिक उपाय भी बताए।
डॉ ठाकुर ने कंप्यूटर के माध्यम से शोध सामग्री के संकलन, दस्तावेजों के व्यवस्थित रख-रखाव, आंकड़ों के प्रबंधन, शोध-पत्र तैयार करने तथा डिजिटल स्रोतों के उपयोग से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। उन्होंने कहा कि तकनीक शोधार्थी के लिए केवल सुविधा का साधन नहीं, बल्कि शोध की विश्वसनीयता, गति और गुणवत्ता बढ़ाने का प्रभावी माध्यम है। आवश्यकता इस बात की है कि शोधार्थी तकनीकी दक्षता के साथ-साथ शोध की मूल भावना यथा तथ्यपरकता, मौलिकता और सत्यनिष्ठा को भी बनाए रखें।
उन्होंने शोधार्थियों से नियमित अध्ययन, प्राथमिक एवं द्वितीयक स्रोतों के तुलनात्मक अध्ययन और विषय से संबंधित नवीन शोध कार्यों से निरंतर जुड़ने का आह्वान किया। व्याख्यान के दौरान शोधार्थियों ने शोध प्रक्रिया और तकनीकी संसाधनों से संबंधित विभिन्न प्रश्न भी पूछे, जिनका विशेषज्ञ द्वारा उदाहरणों सहित समाधान किया गया।
इस अवसर पर विभागाध्यक्ष डॉ. उमेश नन्द तिवारी, पीएचडी कोर्स वर्क के कोर्स को-ऑर्डिनेटर डॉ. मनोज कच्छप एवं नामांकन प्रभारी डॉ. बीरेन्द्र कुमार महतो व डॉ रीझू नायक ने विशेषज्ञ डॉ. आनन्द ठाकुर का पौधा भेंट कर शिष्टाचारपूर्वक स्वागत किया। विभागीय पदाधिकारियों ने कहा कि इस प्रकार के विशेषज्ञ व्याख्यान शोधार्थियों को शोध की बदलती तकनीकों और अकादमिक मानकों से परिचित कराने के साथ-साथ उनके शोध कार्य को अधिक वैज्ञानिक एवं गुणवत्तापूर्ण बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कार्यक्रम में पीएचडी कोर्स वर्क से जुड़े शोधार्थियों की सक्रिय सहभागिता रही।
