GUAHATI
असम सरकार ने राज्य की पारंपरिक और आदिवासी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के उद्देश्य से बड़ा फैसला लिया है। नए आबकारी संशोधन नियमों के तहत अब पारंपरिक हेरिटेज शराब के निर्माण और बिक्री का अधिकार केवल संबंधित मूल एवं आदिवासी समुदायों को ही मिलेगा। सरकार का मानना है कि इससे पारंपरिक पेयों की पहचान, गुणवत्ता और सांस्कृतिक महत्व सुरक्षित रहेगा।
असम आबकारी (संशोधन) नियम, 2026 को अधिसूचित कर 12 जून को असम गजट में प्रकाशित किया गया है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने बताया कि हाल के वर्षों में कुछ व्यावसायिक कंपनियां आदिवासी समुदायों द्वारा तैयार किए जाने वाले पारंपरिक पेयों का उत्पादन और कारोबार करने लगी थीं, जिससे उनकी मौलिक पहचान पर खतरा उत्पन्न हो रहा था।
मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘साज’, ‘रोही’, ‘लौपानी’ और ‘जुडिमा’ जैसे पारंपरिक पेय केवल उन्हीं समुदायों द्वारा बनाए जाने चाहिए, जिनकी सांस्कृतिक विरासत से उनका सीधा संबंध है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि साज का उत्पादन और बिक्री अहोम समुदाय, रोही का मिसिंग समुदाय तथा लौपानी का बोडो समुदाय करे तो उसकी प्रामाणिकता और गुणवत्ता बनी रहेगी। किसी अन्य समुदाय को दूसरे समुदाय की पारंपरिक शराब बनाने की अनुमति नहीं होगी।
सरमा ने कहा कि यदि ऐसे उत्पाद उन लोगों द्वारा बनाए जाते हैं जो उनकी पारंपरिक विधियों और सांस्कृतिक महत्व से परिचित नहीं हैं, तो उनकी गुणवत्ता और असल पहचान प्रभावित हो सकती है। इसलिए सरकार ने इन उत्पादों को व्यावसायिक दखल से बचाने का निर्णय लिया है।
नए नियमों के अनुसार हेरिटेज शराब निर्माण का लाइसेंस केवल स्थानीय मूल निवासियों अथवा संबंधित आदिवासी एवं जातीय समुदायों द्वारा गठित समूहों को ही जारी किया जाएगा। इसके साथ ही छोटे उत्पादकों को प्रोत्साहन देने के लिए माइक्रो-मैन्युफैक्चरिंग यूनिट की आवेदन फीस 25 हजार रुपये से घटाकर 15 हजार रुपये कर दी गई है। वहीं खुदरा बिक्री लाइसेंस शुल्क को 5 हजार रुपये से घटाकर मात्र 500 रुपये कर दिया गया है। सरकार ने माइक्रो-मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों के लिए उत्पादन क्षमता की सीमा 1,000 लीटर प्रतिदिन निर्धारित की है।
राज्य सरकार का कहना है कि यह कदम न केवल आदिवासी समुदायों के आर्थिक सशक्तीकरण में मदद करेगा, बल्कि असम की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को भी आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखेगा।
