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पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद मतदाता सूची को लेकर सामने आया नया आंकड़ा चुनाव आयोग की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। RTI से मिली जानकारी के मुताबिक, SIR के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए नामों को बहाल करने के लिए गठित अपीलीय ट्रिब्यूनलों ने अब तक जिन 82,782 मामलों का निपटारा किया है, उनमें 75,443 यानी 91.13 फीसदी मामलों में मतदाताओं के नाम फिर से सूची में जोड़ने का फैसला हुआ है। केवल 7,339 मामलों में नाम बहाल नहीं किए गए। इससे चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं।
Indian Express की रिपोर्ट में सामने आए इन आंकड़ों ने चुनाव से पहले मतदाता सूची में नाम हटाने की प्रक्रिया की शुद्धता और पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। हालांकि यह स्पष्ट रहना जरूरी है कि 91 फीसदी का आंकड़ा अब तक निपटाए गए मामलों का है, सभी हटाए गए मतदाताओं का नहीं। इसके बावजूद सवाल इसलिए गंभीर है क्योंकि जिन मामलों की सुनवाई हुई, उनमें भारी बहुमत में मतदाताओं के दावे सही पाए गए।
27 लाख नाम ‘Not Eligible’, लेकिन अपीलों का आंकड़ा उससे भी बड़ा
RTI से सामने आए आंकड़ों के अनुसार SIR की प्रक्रिया में करीब 27.28 लाख मतदाताओं को ‘Not Eligible’ श्रेणी में रखा गया। लेकिन इसके खिलाफ अपीलों की संख्या करीब 38.10 लाख पहुंच गई। यानी अपीलों की संख्या और ‘Not Eligible’ मतदाताओं की संख्या के बीच लगभग 10.82 लाख का अंतर है।
यही आंकड़ा अब चुनाव आयोग के सामने सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ा हो गया है। आखिर 27.28 लाख मतदाताओं के मुकाबले 38.10 लाख अपीलें कैसे आईं? इन अतिरिक्त अपीलों की प्रकृति क्या थी और किन लोगों ने ये अपीलें दाखिल कीं? कांग्रेस ने चुनाव आयोग से इसका स्पष्ट जवाब मांगा है।
चुनाव खत्म होने के बाद नाम लौटना सबसे बड़ा सवाल
विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू इसका समय है।
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हो चुका है। चुनाव परिणाम भी आ चुके हैं। ऐसे में जिन लोगों के नाम SIR की प्रक्रिया में हटे और जिनकी अपील अब जाकर स्वीकार की जा रही है, उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर वे वैध मतदाता थे तो चुनाव के समय उनका नाम मतदाता सूची में क्यों नहीं था?
मतदान का अधिकार केवल किसी सरकारी सूची में दर्ज एक नाम नहीं है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक की राजनीतिक भागीदारी का आधार है। इसलिए किसी वास्तविक मतदाता का नाम चुनाव से पहले सूची से हट जाना और चुनाव के बाद उसकी वैधता बहाल होना महज प्रशासनिक गलती का मामला नहीं माना जा सकता। इससे चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
कांग्रेस का आरोप—SIR के नाम पर वोट का अधिकार छीना गया
कांग्रेस ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। पार्टी का आरोप है कि SIR के नाम पर बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए और अब उन्हीं में से बड़ी संख्या में लोगों के नाम अपील के बाद वापस जोड़े जा रहे हैं।
कांग्रेस नेता और SIR से जुड़े पार्टी के प्रमुख नेताओं ने सवाल उठाया है कि अगर अपील करने वाले मतदाताओं के मामलों में 91 फीसदी नाम बहाल हो रहे हैं, तो शुरुआत में उनके नाम हटाने की प्रक्रिया कितनी भरोसेमंद थी?
कांग्रेस का कहना है कि यह केवल मतदाता सूची का प्रशासनिक विवाद नहीं है, बल्कि मतदान के अधिकार और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का सवाल है। पार्टी ने मांग की है कि लंबित सभी मामलों का समयबद्ध तरीके से निपटारा किया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी वास्तविक मतदाता को उसके वोट के अधिकार से वंचित न होना पड़े।
लेकिन असली तस्वीर अभी सामने आनी बाकी है
यहां एक और महत्वपूर्ण तथ्य है। अब तक दाखिल हुई लाखों अपीलों में से सिर्फ 82,782 मामलों का निपटारा हुआ है। यानी बड़ी संख्या में मामले अभी लंबित हैं। इसलिए फिलहाल यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि SIR में हटाए गए सभी या अधिकांश नाम गलत तरीके से हटाए गए थे।
लेकिन 82,782 मामलों में से 75,443 नामों का बहाल होना निश्चित रूप से एक ऐसा आंकड़ा है, जिसका चुनाव आयोग को जवाब देना चाहिए। सवाल यह नहीं है कि SIR का उद्देश्य फर्जी, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं को हटाना था या नहीं। सवाल यह है कि उस प्रक्रिया में वास्तविक मतदाता गलत तरीके से क्यों बाहर हुए और उन्हें चुनाव से पहले अपना नाम बचाने का पर्याप्त अवसर क्यों नहीं मिला?
ज्ञानेश कुमार पर बढ़ा दबाव
इन आंकड़ों के सामने आने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की भूमिका पर राजनीतिक दबाव बढ़ गया है। विपक्ष पहले से ही SIR की प्रक्रिया को लेकर आयोग पर सवाल उठाता रहा है। अब 91 फीसदी बहाली वाला आंकड़ा उन सवालों को और ताकत दे रहा है।
चुनाव आयोग के सामने अब तीन बड़े सवाल हैं—
पहला, इतने बड़े पैमाने पर वास्तविक मतदाताओं के नाम संदिग्ध कैसे पाए गए?
दूसरा, जिन मामलों में अब नाम बहाल हो रहे हैं, क्या उन लोगों को विधानसभा चुनाव में वोट देने का अवसर मिला था?
तीसरा, लंबित लाखों मामलों का निपटारा कितने समय में होगा और क्या आयोग यह सुनिश्चित करेगा कि अगली किसी भी चुनावी प्रक्रिया से पहले सभी वास्तविक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में मौजूद हों?
क्या चुनाव दोबारा कराने की मांग उठेगी?
इसी घटनाक्रम के बाद राजनीतिक हलकों में यह सवाल भी उठने लगा है कि अगर बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता सामने आते हैं, जिनके नाम गलत तरीके से हटाए गए थे और जिनके वोट चुनाव के दौरान नहीं पड़े, तो क्या पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की निष्पक्षता की स्वतंत्र समीक्षा होनी चाहिए?
हालांकि सिर्फ मौजूदा RTI आंकड़ों के आधार पर यह कहना कि चुनाव परिणाम गलत था या चुनाव दोबारा कराया जाना चाहिए, अभी तथ्यात्मक रूप से साबित नहीं होता। इसके लिए यह स्थापित करना जरूरी होगा कि कितने वास्तविक मतदाता चुनाव के दौरान मताधिकार से वंचित हुए और इसका चुनाव परिणाम पर क्या वास्तविक प्रभाव पड़ा।
लेकिन लोकतंत्र में सवाल उठना भी उतना ही जरूरी है जितना चुनाव होना।
अगर कोई नागरिक चुनाव के पहले मतदाता सूची से बाहर हो जाता है, फिर अपनी नागरिकता और पात्रता साबित करता है और चुनाव के बाद उसका नाम वापस जोड़ दिया जाता है, तो यह केवल उस नागरिक की परेशानी नहीं है। यह पूरी चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता का सवाल है।
अब चुनाव आयोग को जवाब देना होगा
SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को साफ और भरोसेमंद बनाना बताया गया था। लेकिन यदि उसी प्रक्रिया के बाद अपील करने वाले मतदाताओं में 91 फीसदी के नाम वापस जोड़े जा रहे हैं, तो चुनाव आयोग को सिर्फ आंकड़े जारी करने के बजाय पूरी प्रक्रिया का सार्वजनिक और विस्तृत हिसाब देना चाहिए।
कितने नाम हटाए गए?
किस आधार पर हटाए गए?
कितने लोगों ने अपील की?
कितने मामलों में नाम बहाल हुए?
कितने मामले अभी लंबित हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण—जिन लोगों के नाम चुनाव से पहले हटे थे, उनमें कितने लोग वोट देने से वास्तव में वंचित हुए?
इन सवालों के जवाब ही यह तय करेंगे कि बंगाल का SIR महज मतदाता सूची को दुरुस्त करने की कवायद थी या उसकी प्रक्रिया में ऐसी गंभीर खामियां थीं, जिन्होंने नागरिकों के मतदान अधिकार को प्रभावित किया।
फिलहाल इतना साफ है कि 91.13 फीसदी बहाली का आंकड़ा चुनाव आयोग के लिए असहज सवाल जरूर खड़ा करता है। और अब गेंद आयोग के पाले में है—उसे आंकड़ों के साथ यह बताना होगा कि आखिर चुनाव से पहले हटाए गए नामों में इतनी बड़ी संख्या में नाम चुनाव के बाद वापस क्यों जोड़े जा रहे हैं।


