NEW DELHI
पश्चिम बंगाल की राजनीति से जुड़े तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों की सदस्यता का मामला अब लोकसभा अध्यक्ष के दरवाजे से निकलकर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी तक पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से मामले में नोटिस जारी किए जाने के ठीक अगले दिन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की ओर से इन सांसदों को नोटिस भेजे जाने का मामला सामने आया है। अध्यक्ष ने 20 सांसदों से सात दिनों के भीतर जवाब मांगा है। लोकसभा सचिवालय की ओर से 25 अगस्त को जारी नोटिस में TMC नेता अभिषेक बनर्जी द्वारा दायर की गई अयोग्यता याचिकाओं की जानकारी देते हुए संबंधित सांसदों से उनकी टिप्पणियां मांगी गई हैं। नोटिस में कहा गया है कि सांसदों को Members of Lok Sabha (Disqualification on Ground of Defection) Rules, 1985 के नियम 7(3) के तहत सात दिनों के भीतर अपना जवाब देना होगा, ताकि उसे लोकसभा अध्यक्ष के विचार के लिए रखा जा सके।
सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद तेज हुई कार्रवाई
यह पूरा घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि मंगलवार को ही सुप्रीम कोर्ट ने 20 सांसदों को नोटिस जारी किया था। अभिषेक बनर्जी की याचिका में लोकसभा अध्यक्ष से इन सांसदों के खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाओं पर जल्द फैसला लेने का निर्देश देने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने लोकसभा अध्यक्ष और लोकसभा महासचिव को सीधे नोटिस जारी करने से फिलहाल परहेज किया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि वह उनकी ओर से पेश हो रहे हैं और लोकसभा अध्यक्ष एक संवैधानिक प्राधिकारी हैं। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक रूप से यह टिप्पणी भी की कि अयोग्यता के मामले पर फैसला करते समय स्पीकर एक अपीलीय न्यायाधिकरण की तरह काम करते हैं और उनके फैसले न्यायिक समीक्षा के दायरे में आते हैं।
TMC का आरोप- अदालत के हस्तक्षेप के बाद हुई कार्रवाई
लोकसभा सचिवालय की ओर से नोटिस जारी होने के बाद TMC नेताओं ने इसे अदालत के हस्तक्षेप के बाद हुई कार्रवाई करार दिया है। राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने इस घटनाक्रम को “ब्रेकथ्रू” बताया, लेकिन साथ ही कहा कि नोटिस जारी होना केवल पहला कदम है।
उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में 20 सांसदों के खिलाफ संविधान और दलबदल विरोधी कानून के कथित उल्लंघन का हवाला देते हुए उनकी सदस्यता समाप्त करने की मांग की। वहीं TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय पर कार्रवाई में देरी को छिपाने की कोशिश करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने 20 सांसदों की अयोग्यता के लिए 19 जून को ही याचिकाएं दाखिल कर दी थीं, लेकिन उस पर लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
मोइत्रा ने सवाल उठाया कि नोटिस की तारीख 25 अगस्त क्यों रखी गई, जबकि उसी दिन मामले की सुनवाई भी हुई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि बागी सांसदों को अलग सीटें देकर उनकी पार्टी के खर्च पर सुविधाएं दी गईं और अब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद कार्रवाई शुरू की गई है।
कैसे शुरू हुआ TMC में बगावत का विवाद?
यह विवाद पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में TMC की हार के बाद शुरू हुआ। TMC के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसद पार्टी से अलग हो गए और नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया के साथ जुड़ गए। इसके बाद इन सांसदों को लोकसभा में अलग सीटें आवंटित की गईं और उन्होंने NDA की संसदीय गतिविधियों में भी हिस्सा लिया। TMC का आरोप है कि इन सांसदों ने स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है। इसलिए संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दलबदल विरोधी कानून के तहत उन्हें लोकसभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, बागी सांसदों की ओर से विलय के आधार पर कानूनी संरक्षण का दावा किया जा रहा है। हालांकि यह दावा भी विवादित है। दलबदल विरोधी कानून के तहत किसी राजनीतिक दल के विलय की स्थिति में तभी संरक्षण मिलता है, जब मूल राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई विधायक या सांसद विलय के पक्ष में हों।
अब स्पीकर के सामने अगली चुनौती
20 सांसदों को भेजे गए नोटिस के साथ इस मामले में औपचारिक निर्णय प्रक्रिया आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। हालांकि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अभी तक इन सांसदों की सदस्यता समाप्त करने या उन्हें अयोग्य घोषित करने को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। अब सांसदों के जवाब मिलने के बाद लोकसभा अध्यक्ष के सामने इस मामले पर निर्णय लेने की चुनौती होगी। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट में भी इस मामले की अगली सुनवाई 28 अगस्त को होने की उम्मीद है। यानी 20 बागी सांसदों की सदस्यता का विवाद अब सिर्फ TMC और उसके बागी सांसदों के बीच राजनीतिक लड़ाई नहीं रह गया है। यह मामला दलबदल विरोधी कानून, लोकसभा अध्यक्ष की संवैधानिक भूमिका और उनके फैसलों की न्यायिक समीक्षा जैसे बड़े संवैधानिक सवालों तक पहुंच चुका है।
सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के ठीक अगले दिन लोकसभा सचिवालय की ओर से सामने आया यह नोटिस इसलिए भी अहम है क्योंकि अब पूरे मामले में यह सवाल और तेज हो गया है कि 20 सांसदों के खिलाफ दायर याचिकाओं पर अंतिम फैसला कब और किस आधार पर होगा।


