ASSAM DESK
असम में हाल ही में आई बाढ़ ने केवल जनजीवन और संपत्ति को ही नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर पर भी गंभीर असर डाला है। सत्रों, नामघरों, बौद्ध मठों और निजी संग्रहों में सुरक्षित रखी गई सदियों पुरानी दुर्लभ पांडुलिपियां बाढ़ के पानी और फफूंद की वजह से नष्ट होने लगी हैं। इन्हें बचाने के लिए ‘सोसाइटी फॉर श्रीमंत शंकरदेव’ (SSS) ने ऊपरी असम में विशेष इमरजेंसी संरक्षण अभियान शुरू किया है। इस पहल में रॉयल ग्लोबल यूनिवर्सिटी (RGU), गुवाहाटी भी सहयोग कर रही है।
अभियान के तहत शिवसागर, चराइदेव, डिब्रूगढ़, जोरहाट और गोलाघाट के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से क्षतिग्रस्त पांडुलिपियों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाकर उनका संरक्षण किया जाएगा। विशेषज्ञ इनके बचाव के लिए तत्काल उपाय करेंगे, ताकि ऐतिहासिक धरोहर को आगे और नुकसान से बचाया जा सके।
इस पहल का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य इन दुर्लभ पांडुलिपियों का डिजिटल आर्काइव तैयार करना भी है, जिससे भविष्य की पीढ़ियों के लिए इस अमूल्य विरासत को सुरक्षित रखा जा सके। साथ ही, स्थानीय स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण देकर उन्हें यह भी सिखाया जाएगा कि बाढ़ या अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान पांडुलिपियों को सुरक्षित रखने के लिए कौन-कौन से कदम उठाए जाएं।
सोसाइटी की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, जुलाई 2026 में आई अचानक बाढ़ से ऊपरी असम के शिवसागर, जोरहाट, गोलाघाट और चराइदेव जिलों में छह लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए। इस दौरान श्रीमंत शंकरदेव और माधवदेव की परंपरा से जुड़ी कई ऐतिहासिक पांडुलिपियां पानी और फफूंद के कारण गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गईं और अब उनके पूरी तरह नष्ट होने का खतरा बना हुआ है।
सोसाइटी ने सभी सत्रों, नामघरों, बौद्ध मठों, निजी संग्रहकर्ताओं और स्थानीय लोगों से इस संरक्षण अभियान में सहयोग करने की अपील की है, ताकि असम की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखा जा सके।
