NEW DELHI
SACAC और न्यू दिल्ली फ़िल्म फ़ाउंडेशन (NDFF) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजितALT EFF Delhi 2025का दो दिवसीय संस्करण आज संपन्न हुआ। इस उत्सव में प्रभावशाली फ़िल्मों, सार्थक संवादों और दिल्ली–एनसीआर के बिगड़ते पर्यावरणीय और पारिस्थितिक संकट पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण पैनल डिस्कशनमें प्रभावी चर्चा भी हुई।
6–7 दिसंबर 2025 को आयोजित येफिल्म फेस्टिवल विद्यार्थियों, शिक्षकों, पर्यावरणविदों, पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और फ़िल्मकारों को जलवायु के प्रति सचेत करने के साथ-साथ सिनेमा और बौद्धिक मंथन काएक अनूठा मंच बन कर सामने आया।
उत्सव की शुरुआत शनिवार कोदलजीत वाधवा (SACAC)औरआशीष के सिंह (NDFF)के स्वागत भाषण से हुई, जिसमें SACAC और NDFF की पर्यावरण-संवेदनशील सिनेमा और रचनात्मक जागरूकता के प्रति प्रतिबद्धता को दोहराया गया।देश-विदेश की 6 महत्वपूर्ण लॉन्ग और शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री और एनीमेशन फिल्में प्रदर्शित की गईं। हर स्क्रीनिंग के बाद उत्सुक और सार्थक चर्चाएँ हुईं, जिनमें विद्यार्थियों ने विशेष रूप से गहरी रुचि दिखाई।
सीनियर पत्रकार, फ़िल्मकार और शिक्षाविदरमेश मेननने भारत की पर्यावरणीय चुनौतियों और जलवायु आपातकाल की गंभीरता पर अपने विचार साझा किए।
पहले दिन फिल्म फेस्टिवल के तहत हुए स्कूल स्तरीय फ़ोटोग्राफ़ी प्रतियोगिता (कक्षा 9–12)के विजेता घोषित किए गए। इनमें प्रथम पुरस्कार — यथार्थ चौधरी को जबकि द्वितीय पुरस्कार — शौर्य प्रताप बिष्ट को मिला। दोनों विजेताओं को OM Systems द्वारा सम्मानित किया गया।
वन्यजीव फ़ोटोग्राफ़ी प्रदर्शनी
पुरस्कार विजेता वन्यजीव चित्रों और प्रोफ़ेशनल कैमरों की विशेष प्रदर्शनी ने विद्यार्थियों को संरक्षण फ़ोटोग्राफ़ी और फ़ील्ड उपकरणों का व्यावहारिक अनुभव प्रदान किया।
दूसरे दिन भी कुछ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फ़िल्में प्रदर्शित की गईं, जिनमें सामाजिक अन्याय, विस्थापन, जंगलों का विनाश, शहरी सीवेज प्रणाली और मानव–पर्यावरण संबंध जैसे मुद्दों को गहराई से दिखाया गया।
दो दिनों में ALT EFF द्वारा क्यूरेट की गई महत्वपूर्ण फ़िल्मों में प्रमुख रहीं:
- फ़्यूचर काउंसिल- पुरस्कार विजेता ऑस्ट्रेलियाई फ़िल्मकारडेमन गेम्यूकी यह डॉक्यूमेंट्री आठ बच्चों की यूरोप यात्रा का अनुसरण करती है, जहाँ वे वैश्विक नेताओं से मिलकर पर्यावरणीय संकट के वास्तविक समाधानों की खोज करते हैं — यह यात्रा पूरी तरह युवाओं की तात्कालिक और निर्भीक दृष्टि से कही गई है।
- हाउ मल्लाह वीमेन फॉट-बिहार की 5,000 से अधिक मल्लाह महिलाओं के संघर्ष की यह मार्मिक कहानी जातिगत हिंसा, यौन शोषण और पितृसत्ता के खिलाफ उनके अधिकारों की लड़ाई को प्रस्तुत करती है।
- ब्लड वुड-रोमानिया के अंतिम प्राथमिक वनों पर वाणिज्यिक कटाई के बढ़ते खतरे की जांच करती यह फ़िल्म न सिर्फ ग्रीनवॉशिंग, सक्रियता और प्राचीन वनों की जलवायु-स्थिरता में भूमिका को बल्कि कई चौंकाने वाले तथ्यों को भी उजागर करती है।
- बिनीथ द पैनल: द हिडन लॉसेज़ ऑफ़ इंडिया’ज़सोलर पार्क्स-यह डॉक्यूमेंट्री तमिलनाडु के रामनाथपुरम में बड़े सोलर पार्कों के कारण हुए सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों को सामने लाती है — ज़मीन का नुकसान, पानी का संकट और समुदायों का पलायन इसकी मुख्य धुरी है।
- घुघुती की माला- उत्तराखंड की मकर संक्रांति पर आधारित यह सुंदर एनिमेशन भोजन, लोककथाओं, परिवार और संस्कृति को जोड़ता है और प्रकृति के प्रति गहरे सम्मान को रेखांकित करता है।
- देसी ऊन- दक्कनी ऊन और चरवाही परंपरा की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय विरासत कोबालू मामाऔर उनके पवित्र झुंड के माध्यम से प्रस्तुत करती यह फ़िल्म आधुनिक समाज द्वारा खोई जा रही पारंपरिक बुद्धिमत्ता पर प्रश्न उठाती है।
दूसरे दिन एक महत्वपूर्ण पैनल डिस्कशन भी आयोजित किया गया, जिसका विषय था— ‘हमारा पर्यावरण, हमारा भविष्य: स्थानीय चुनौतियाँ और समाधान’। इस महत्वपूर्ण सत्र मंस तीन प्रतिष्ठित वक्ता शामिल थे:
- डॉ. अपूर्व ग्रोवर — नेत्र विशेषज्ञ एवं सदस्य, People for Aravallis
- मीनू घोष — सतत जीवनशैली की समर्थक एवं सदस्य, People for Aravallis
- संजय कबीर — वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं पर्यावरण चिंतक
सत्र का संचालनआशीष के सिंह, संस्थापक NDFF ने किया।
चर्चा के प्रमुख बिंदु: - वायु गुणवत्ता और बच्चे —डॉ. अपूर्व ग्रोवर ने कहा कि दिल्ली की हवा इतनी विषाक्त हो गई है कि छोटे बच्चों और शिशुओं को बाहर ले जाना भी खतरनाक हो गया है। उन्होंने अरावली पर्वतमाला के जलवायु संतुलन में महत्वपूर्ण योगदान को भी रेखांकित किया और सवाल खड़ा किया कि हम आने वाली पीढ़ी को कैसी दुनिया सौंप कर जाएंगे…।
- 53 दिन लगातार खराब हवा —संजय कबीर ने याद दिलाया कि 14 अक्टूबर से 53 दिनों तक दिल्ली–एनसीआर की AQI “खराब” या “बहुत खराब” श्रेणी में रही, जो कि एक बेहद खतरनाक स्थिति है।
- अरावली संकट —अरावली और अन्य पर्वतों की सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताओं में महत्वपूर्ण भूमिका को लेकर भावुक होती हुई मीनू घई ने चेताया कि सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय अरावली के विनाश का रास्ता खोलता है, जिसकी कीमत दिल्ली-एनसीआर को बड़े पैमाने पर चुकनी पड़ सकती है। उन्होने कहा कि हमारी संस्कृति में पर्वतों को देवतुल्य माना जाता रहा है और अब उसकी तबाही का रास्ता खोलना दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होने लोगों से इस बारे में ऑनलाइन याचिका साइन करने की अपील भी की।
- दृश्य प्रमाण —पैनल ने अवैध खनन, वनों की कटाई के परिणामो और पारिस्थितिक पतन पर महत्वपूर्ण वीडियो दिखाए, जिन्हें देखकर श्रोता स्तब्ध रह गए।
- नागरिक कार्रवाई — People for Aravallisके प्रयासों का उल्लेख करते हुए पैनल ने बताया कि यह पर्वतमाला दिल्ली–एनसीआर के लिए एक जीवनरक्षक पारिस्थितिक ढाल है, जिसकी रक्षा आवश्यक है।
संचालक की समापन टिप्पणी
आशीष के सिंह ने महात्मा गांधी को उद्धृत करते हुए कहा:
“धरती पर सभी की ज़रूरत के लिए पर्याप्त है, लेकिन किसी के लालच के लिए नहीं।”
दोनों दिन समारोह का संचालन सिमरन, आकृति, निवृत्ति औरअभयने किया, जबकि प्रोडक्शन और कोऑर्डिनेशनकृषऔरनिशाद्वारा संभाला गया।
सामूहिक पर्यावरणीय चेतना का आह्वान
उत्सव का समापनदलजीत वाधवाऔरआशीष के सिंहके धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने सभी दर्शकों, पैनलिस्टों, विद्यार्थियों, फ़िल्मकारों, शिक्षकों, तकनीशियनों और वॉलंटियर्स का आभार व्यक्त किया, जिन्होंने इस सामूहिक जागरूकता अभियान में योगदान दिया।
दो दिनों की प्रभावशाली फ़िल्मों, विचारोत्तेजक चर्चाओं, युवाओं की भागीदारी और पर्यावरणीय अंतर्दृष्टि नेALT EFF Delhi 2025को इस बात का सशक्त उदाहरण बना दिया कि सिनेमा जागरूकता और परिवर्तन का एक प्रभावी माध्यम है।


