ओल्लागी, सिनेमा हूल जोहार: सिनेमा सिर्फ सिनेमा नहीं है, यह समाज और संस्कृति भी है

Surendra Kuruxas

ओल्लागी, सिनेमाहूल जोहार

सिनेमा सिर्फ सिनेमा नहीं है…

सिनेमा समाज को जोड़ता है।

सिनेमा इतिहास को जीवित रखता है।

सिनेमा उन आवाज़ों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाता है, जिन्हें इतिहास के पन्नों में कई बार हाशिए पर छोड़ दिया गया।

 सही मायने में Bollywood आदिवासी समाज की वीर गाथाओं और आदिवासी नायकों की वास्तविक कहानियों पर बड़े स्तर की फिल्में क्यों नहीं बनतीं?

हमारे पास कहानियों की कोई कमी नहीं है।

मरंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा, धरती आबा बिरसा मुंडा, वीर बुद्धू भगत, परमवीर चक्र विजेता अल्बर्ट एक्का, सिदो-कान्हू, फूलो-झानो, सिनगी दई, कइली दई, नीलांबर-पीतांबर और ऐसे असंख्य वीर-वीरांगनाओं की वास्तविक जीवन-कथाएँ हैं।

इनकी जिंदगी में संघर्ष है, साहस है, बलिदान है, प्रेम है, नेतृत्व है और इतिहास है।

फिर भी ये कहानियाँ मुख्यधारा के बड़े पर्दे तक क्यों नहीं पहुँच पातीं?

कहीं ऐसा तो नहीं कि आदिवासी को नायक के रूप में देखने की दृष्टि ही अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुई है?

आदिवासी समाज को अक्सर छोटा, पिछड़ा, अनपढ़ या केवल जंगल और गरीबी से जोड़कर देखने की मानसिकता आज भी कहीं-कहीं दिखाई देती है। इस विषय पर बहुत कुछ कहा जा सकता है, लेकिन सोशल मीडिया पर किसी को कटघरे में खड़ा करना मेरा उद्देश्य नहीं है।

मेरा उद्देश्य सिर्फ दृष्टिकोण बदलने की अपील करना है।

क्योंकि आदिवासी जीवन-दर्शन बहुत व्यापक है।

हमारे पूर्वजों ने प्रकृति को केवल संसाधन नहीं माना, बल्कि जीवन का शिक्षक माना।

प्रकृति के साथ सीखते-सिखाते हुए उन्होंने जाना कि कौन-सा भोजन जीवन देता है, कौन-सी वनस्पति औषधि है, किसमें विष है, जल और जंगल का संतुलन कैसे बनाए रखना है, पारंपरिक खेती कैसे करनी है, मौसम और धरती को कैसे समझना है।

बोली-भाषा, वस्त्र, हथियार, कला, रंग-रोगन, भोजन, शिकार, पारंपरिक कृषि, औषधीय ज्ञान, सामाजिक व्यवस्था, समानता और सामुदायिक जीवन—इन सबके पीछे अनुभव और ज्ञान की एक लंबी परंपरा रही है।

जिस समय आधुनिक विज्ञान के लिए वैज्ञानिक संस्थाएँ और प्रयोगशालाएँ नहीं थीं, उस समय भी आदिवासी समाज के पास पीढ़ियों के अनुभव से अर्जित ज्ञान था।

हमारे गीत, संगीत और नृत्य भी केवल मनोरंजन नहीं हैं।

उनमें लय है, ताल है, गणना है, प्रकृति है, श्रम है और सामूहिक जीवन की धड़कन है।

आज उसी लोक-संगीत और लोककलाओं से प्रेरणा लेकर बड़ी-बड़ी कंपनियाँ करोड़ों-अरबों व्यूज और आर्थिक लाभ अर्जित कर रही हैं।

तो फिर उस संस्कृति के मूल समाज की कहानियों को मुख्यधारा में सम्मानजनक स्थान क्यों नहीं मिलना चाहिए?

जिस भोजन को कभी ‘जंगलियों का भोजन’ कहकर उपेक्षित किया गया, आज दुनिया उसी पर Super Food के नाम से नए बाजार खड़े कर रही है।

ढेकी-कूटा चावल, मड़ुआ, महुआ और ऐसे अनेक पारंपरिक खाद्य पदार्थ इसका उदाहरण हैं।

फिर आदिवासी जीवन को पिछड़ा कहने से पहले हमें एक बार यह भी देखना चाहिए कि जिस ज्ञान को कभी कमतर समझा गया, आज दुनिया उसी ज्ञान को नए नाम और नए बाजार के साथ अपना रही है।

सिनेमा में आदिवासी चित्रण की बात करें तो…

कई बार आदिवासी पात्र को कुछ बाहरी प्रतीकों में समेट दिया जाता है—

सिर पर कोई पारंपरिक वस्तु रख दी,

अलग तरह के कपड़े पहना दिए,

संवादों को हास्यास्पद बना दिया,

भाषा को मजाक बना दिया,

और कभी हिंसा या यौन शोषण के दृश्यों तक ही उसकी कहानी सीमित कर दी।

रंग-रूप की बात आए तो कभी चेहरे पर कालिख पोतकर कहा जाता है—

“लो जी, आदिवासी तैयार हो गया।”

लेकिन नहीं।

आदिवासी कोई मेकअप नहीं है।

आदिवासी कोई कॉस्ट्यूम नहीं है।

आदिवासी कोई हास्य पात्र नहीं है।

आदिवासी एक अस्तित्व है।

एक पहचान है।

एक विरासत है।

एक संस्कृति है।

एक इतिहास है।

एक जीवंत जीवन-दर्शन है।

आदिवासी समाज में भी अनगिनत प्रेम-कहानियाँ हैं, पारिवारिक रिश्ते हैं, सामाजिक संघर्ष हैं, हास्य है, राजनीति है, सामुदायिक व्यवस्था है, प्रकृति है और जीवन के हजारों रंग हैं।

इन कहानियों को भी उसी सम्मान से सिनेमा में जगह मिलनी चाहिए, जिस सम्मान से दूसरे समाजों की कहानियाँ दिखाई जाती हैं।

अब समय है—

आदिवासी अस्तित्व की बात करने का।

आदिवासी विरासत को सहेजने का।

आदिवासी पहचान को सम्मान देने का।

और Adivasi Cinema को Mainstream Cinema से जोड़ने का।

यह काम केवल बाजार के लिए नहीं, बल्कि निस्वार्थ भाव, संवेदना और सम्मान के साथ करना होगा।

आदिवासी कलाकारों को केवल किरदार निभाने का अवसर नहीं, बल्कि अपनी कहानी लिखने, निर्देशित करने, संगीत बनाने और अपनी भाषा में सिनेमा खड़ा करने का अवसर भी मिलना चाहिए।

साथियों, मुझे किसी पर टिप्पणी नहीं करनी है।

मेरी बस इतनी सी बात है—

यदि आपको आदिवासी जीवनशैली से प्यार है, तो आदिवासी समाज का सम्मान कीजिए।

यदि आपको आदिवासी संगीत अच्छा लगता है, तो उसके कलाकारों का सम्मान कीजिए।

यदि आदिवासी संस्कृति आपको सुंदर लगती है, तो उसकी वास्तविक कहानियों को भी मुख्यधारा में स्थान दीजिए।

क्योंकि—

सिनेमा सिर्फ सिनेमा नहीं है।

यह हमारे पूर्वजों से मिली पहचान, स्मृति और विरासत को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित करने का माध्यम है।

हम अपनी कहानी किसी के विरुद्ध नहीं कहना चाहते।

हम अपनी कहानी इसलिए कहना चाहते हैं, ताकि आने वाली पीढ़ी जान सके—

हमारे पूर्वज कौन थे,

उन्होंने क्या जाना,

कैसे जिया,

क्या रचा,

क्या बचाया

और हमारे लिए क्या छोड़ गए।

आदिवासी Cinema को Mainstream से जोड़ना होगा।

आदिवासी पहचान के साथ Cinema Industry को विकसित करना होगा।

क्योंकि हमारी कहानी केवल हमारी नहीं है—

यह भारत की कहानी का भी एक महत्वपूर्ण अध्याय है।

(सुरेंद्र कुजुर: लेखक तीन दशक से फिल्ममेकर के रूप में आदिवासी संस्कृति को बचाने की मुहिम में जुटे हैं। वे कुड़ुख भाषा के गीतकार, संगीतकार और निदेशक के रूप में जाने जाते हैं

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