जलेस: रांची में प्रेमचंद की 146वीं जयंती पर सांप्रदायिक सौहार्द और मानवीय मूल्यों पर गंभीर चर्चा


RANCHI

जनवादी लेखक संघ (जलेस) रांची की ओर से सफदर हाशमी सभागार में महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की 146वीं जयंती मनाई गई। कार्यक्रम का मुख्य विषय प्रेमचंद का रचना संसार और सांप्रदायिक उन्माद” रहा, जिसमें वक्ताओं ने प्रेमचंद के साहित्य की वर्तमान समय में प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा की।

पहले सत्र की अध्यक्षता कुमार बृजेंद्र ने की। विषय प्रवेश करते हुए जलेस के सचिव एम. जेड. खान ने प्रेमचंद की चर्चित कहानियां हिंसा परमो धर्म’, ‘मंदिर और मस्जिद’ तथा ‘जिहाद’ का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रेमचंद ने धर्मांधता, कट्टरता और सांप्रदायिकता पर अपने समय में जिस निर्भीकता से प्रहार किया, उसकी जरूरत आज भी उतनी ही महसूस होती है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद का मूल संदेश उनकी संपूर्ण रचनाधर्मिता में निहित है—मनुष्य पहले है, धर्म, जाति और समुदाय बाद में।

वक्ताओं ने कहा कि प्रेमचंद धर्म के विरोधी नहीं थे, बल्कि धर्म के नाम पर होने वाले अन्याय, शोषण, अंधविश्वास, पाखंड और सांप्रदायिक संकीर्णता के आलोचक थे। उनकी रचनाएं समाज को जोड़ने, समानता और मानवीय मूल्यों को मजबूत करने का संदेश देती हैं।

बैठक में राहुल और धूमिल की प्रतिमाएं तोड़े जाने की निंदा करते हुए उन्हें शीघ्र पुनर्स्थापित करने तथा दोषियों की पहचान कर कार्रवाई की मांग की गई।

कार्यक्रम के दौरान सूरज श्रीवास्तव ने प्रवीण परिमल के जनगीत जय बोलो गुरु घंटाल” की प्रस्तुति दी।

डॉ. अरुण कुमार ने कहा कि प्रेमचंद ने जिस धरती से प्रेम और भाईचारे का संदेश दिया था, आज वहीं नफरत का माहौल चिंताजनक रूप से बढ़ रहा है। डॉ. विनोद कुमार ने ‘कफन’ और ‘सद्गति’ का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रेमचंद ने साहित्य में मानवीय संवेदनाओं को नई ऊंचाई दी और सामाजिक पाखंड पर तीखे सवाल उठाए।

डॉ. जमशेद क़मर ने कहा कि वर्तमान दौर में प्रेमचंद की प्रासंगिकता पहले से अधिक बढ़ गई है। डॉ. किरण ने पंच परमेश्वर’ का हवाला देते हुए कहा कि यह कहानी न्याय और सांप्रदायिक सौहार्द का सशक्त संदेश देती है। श्रीनिवास, सियाराम झा ‘सरस’, नंदिता दास और रेहाना खातून ने भी प्रेमचंद के साहित्य को आज के समाज के लिए मार्गदर्शक बताया।

अध्यक्षीय संबोधन में कुमार बृजेंद्र ने कहा कि वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में सांप्रदायिकता गंभीर चुनौती बन चुकी है और ऐसे समय में प्रेमचंद के विचार समाज को सही दिशा दिखाते हैं।

इस अवसर पर विक्की मिंज के नागपुरी कविता संग्रह हूंवे रईह गेली” का लोकार्पण डॉ. विनोद कुमार, डॉ. अरुण कुमार, डॉ. जमशेद क़मर, डॉ. किरण, कुमार बृजेंद्र, एम. जेड. खान, वीना श्रीवास्तव, अपराजिता मिश्रा और डॉ. अशरफ अली ने संयुक्त रूप से किया।

दूसरे सत्र में डॉ. अशरफ अली ने अपनी कहानी प्रेमचंद तुम कहां हो” का पाठ किया, जिसमें प्रेमचंद के पात्रों के माध्यम से घृणा और सांप्रदायिकता के विरुद्ध संदेश दिया गया। सत्र की अध्यक्षता वीना श्रीवास्तव, सियाराम झा ‘सरस’ और सुकेश कर्मकार ने की, जबकि संचालन यास्मीन लाल ने किया।

कार्यक्रम में उजैर अहमद, समीउल्लाह खान, मोईज उद्दीन मिरदाहा, मौसमी मिंज, सालों कुमारी, मृदुला सहाय, एस. चटर्जी, फिरदौस जहां, रवि कुमार, ए. मुंडा, रामदेव बड़ाइक, दिव्या मुर्मू, छोटनी कुमारी, नारायण मरांडी, आशना मनोरम, शिवशंकर उरांव, सूरज श्रीवास्तव, मो. अमान सहित अनेक साहित्यकार, लेखक और बुद्धिजीवी मौजूद रहे।

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