असम असेंबली में UCC बिल पेश, शादी-तलाक से लेकर लिव-इन तक बनेगा एक समान कानून

Central desk

असम सरकार ने सोमवार को विधानसभा के 16वें सत्र के तीसरे दिन ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC), असम 2026’ बिल पेश कर दिया। इस प्रस्तावित कानून को राज्य में नागरिक मामलों के लिए एक बड़े कानूनी सुधार के तौर पर देखा जा रहा है। बिल में शादी, तलाक, उत्तराधिकार, विरासत और लिव-इन रिलेशनशिप के लिए एक समान कानूनी ढांचा लागू करने का प्रस्ताव रखा गया है। बिल पेश होते ही सदन और राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर बहस तेज हो गई है।

सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए समानता, पारदर्शिता और लैंगिक न्याय सुनिश्चित करना है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत धर्म आधारित अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों की जगह एक साझा कानूनी ढांचा लागू होगा, जो राज्य के सभी निवासियों पर लागू रहेगा। हालांकि अनुसूचित जनजातियों को इससे विशेष छूट देने का प्रावधान किया गया है, ताकि उनके पारंपरिक रीति-रिवाज और संवैधानिक अधिकार सुरक्षित रह सकें।

शादी के लिए अनिवार्य होगा रजिस्ट्रेशन, एक विवाह की व्यवस्था लागू

प्रस्तावित बिल में ‘एक विवाह’ यानी मोनोगैमी को अनिवार्य बनाया गया है। कानून के अनुसार पुरुषों की न्यूनतम शादी की उम्र 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष तय की गई है। भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत बहुविवाह या दूसरी शादी करने पर सात साल तक की सजा का प्रावधान रहेगा।

बिल में यह भी कहा गया है कि राज्य में होने वाली हर शादी का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होगा। विवाह के 60 दिनों के भीतर दंपति को सब-रजिस्ट्रार के समक्ष विवाह का मेमोरेंडम जमा करना होगा। तय समय में रजिस्ट्रेशन नहीं कराने पर 10 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

हालांकि सरकार ने धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को ध्यान में रखते हुए पारंपरिक विवाह पद्धतियों को जारी रखने की अनुमति दी है। वैदिक विवाह, निकाह, सप्तपदी, आनंद कारज, अहोम चकलोंग और अन्य पारंपरिक विधियों से शादी करने की छूट बनी रहेगी।

तलाक, बच्चों की कस्टडी और पुनर्विवाह पर भी समान नियम

बिल में सभी समुदायों के लिए तलाक के समान आधार तय किए गए हैं। क्रूरता, परित्याग और आपसी सहमति के आधार पर तलाक लिया जा सकेगा। पांच साल से कम उम्र के बच्चों की प्राथमिक कस्टडी सामान्य रूप से मां के पास रखने का प्रस्ताव किया गया है।

यदि कोई व्यक्ति गैर-कानूनी तरीके से शादी समाप्त करता है या तलाक की प्रक्रिया का उल्लंघन करता है, तो उसे तीन साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है। इसके अलावा तलाकशुदा व्यक्ति को पुनर्विवाह से पहले गैर-कानूनी शर्तें मानने के लिए मजबूर करने पर भी सख्त दंड का प्रावधान रखा गया है।

विरासत और संपत्ति में महिलाओं को बराबरी का अधिकार

प्रस्तावित UCC में उत्तराधिकार के लिए जेंडर न्यूट्रल व्यवस्था लाने की बात कही गई है। यदि कोई व्यक्ति बिना वसीयत के मृत्यु को प्राप्त होता है, तो पति-पत्नी, बच्चे और माता-पिता को समान श्रेणी का वारिस माना जाएगा।

वसीयत संबंधी मामलों में हर वयस्क और मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति को लिखित वसीयत तैयार करने का अधिकार मिलेगा। इसके लिए गवाहों की मौजूदगी अनिवार्य होगी।

लिव-इन रिलेशनशिप का भी होगा रजिस्ट्रेशन

बिल में लिव-इन रिलेशनशिप को भी कानूनी ढांचे में शामिल किया गया है। प्रस्ताव के अनुसार ऐसे संबंधों का एक महीने के भीतर रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होगा।

लिव-इन से जन्म लेने वाले बच्चों को पूरी तरह वैध माना जाएगा। यदि किसी साथी को छोड़ दिया जाता है, तो वह अदालत के जरिए आर्थिक सहायता और भरण-पोषण की मांग कर सकेगा।

समय सीमा के भीतर रजिस्ट्रेशन नहीं कराने पर तीन महीने तक की जेल या 10 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। गलत जानकारी देने या तथ्य छिपाने पर 25 हजार रुपये तक का दंड और जेल का प्रावधान रखा गया है।

धोखाधड़ी, बाल विवाह और फर्जी दस्तावेजों पर सख्त सजा

बिल में कई दंडात्मक प्रावधान भी शामिल किए गए हैं। बाल विवाह या बिना वैध सहमति के शादी करने पर ‘बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006’ के तहत कार्रवाई होगी।

जबरदस्ती, दबाव या तथ्यों को छिपाकर की गई शादी पर सात साल तक की जेल हो सकती है। प्रतिबंधित रिश्तों में विवाह करने पर छह महीने तक की जेल और 50 हजार रुपये तक जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

इसके अलावा रजिस्ट्रेशन के दौरान फर्जी दस्तावेज जमा करने पर भी सख्त दंड का प्रावधान रखा गया है।

पुराने कानून को खत्म करने का प्रस्ताव

प्रस्तावित बिल में ‘असम मुस्लिम विवाह एवं तलाक अनिवार्य पंजीकरण अधिनियम, 2024’ को समाप्त करने का भी प्रस्ताव है। हालांकि UCC लागू होने से पहले हुई बहुविवाह शादियों को कानूनी सुरक्षा देने के लिए बिल में विशेष ‘सेविंग क्लॉज’ भी जोड़ा गया है, ताकि पहले से मौजूद विवाह प्रभावित न हों।

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