NEW DELHI
मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान तीखी बहस देखने को मिली। सुनवाई के केंद्र में चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और सुखबीर संधू की नियुक्ति प्रक्रिया रही। इसी दौरान सुप्रीम Court ने टिप्पणी करते हुए कहा कि काश जजों की नियुक्तियां भी चुनाव आयुक्तों की तरह इतनी तेजी से होतीं, खासकर हाई कोर्ट जजों की नियुक्ति में।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में पर्याप्त पारदर्शिता और विपक्ष के नेता से प्रभावी सलाह-मशविरा नहीं किया गया।
ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति को लेकर उठे सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने अदालत को बताया कि वर्ष 2024 में नए कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर रोक लगाने के लिए याचिका दायर की गई थी। उनका आरोप था कि अदालत में इस मामले की सुनवाई होने से पहले ही केंद्र सरकार ने जल्दबाजी में नियुक्ति प्रक्रिया पूरी कर ली।
हंसारिया ने दलील दी कि 13 मार्च 2024 को विपक्ष के नेता को करीब 200 नामों की सूची सौंपी गई और अगले ही दिन चयन समिति की बैठक बुलाकर ज्ञानेश कुमार तथा सुखबीर संधू के नामों को मंजूरी दे दी गई। उन्होंने सवाल उठाया कि विपक्ष का नेता इतने कम समय में इतने नामों की गंभीर पड़ताल कैसे कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी बनी चर्चा का विषय
सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता की एक टिप्पणी खास तौर पर चर्चा में रही। उन्होंने कहा, “काश जजों की नियुक्ति में भी ऐसी ही तेजी दिखाई जाती, खासकर हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति में।” अदालत की यह टिप्पणी न्यायपालिका में लंबित नियुक्तियों और देरी को लेकर एक बड़े संकेत के तौर पर देखी जा रही है।
हालांकि, बेंच इस दलील से सहमत नहीं दिखी कि नियुक्तियां जानबूझकर इतनी तेजी से इसलिए की गईं ताकि रोक लगाने वाली याचिका की सुनवाई प्रभावित हो सके। अदालत ने पूछा कि क्या यह साबित किया जा सकता है कि केंद्र सरकार को पहले से पता था कि 15 मार्च को इस मामले की सुनवाई होने वाली है।
जस्टिस दत्ता ने कहा कि बिना ठोस सामग्री के किसी कदम के पीछे दुर्भावना का आरोप नहीं लगाया जा सकता। बाद में विजय हंसारिया ने भी स्वीकार किया कि उनके पास इस संबंध में कोई प्रत्यक्ष सामग्री नहीं है। इसके बाद अदालत ने उन्हें इस दलील पर अधिक जोर न देने की सलाह दी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि वे किसी व्यक्तिगत चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को चुनौती नहीं दे रहे हैं, बल्कि पूरे अधिनियम की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठा रहे हैं।
