नोएडा में वेतन वृद्धि पर छिड़ा संग्राम: सरकार के फैसले से उद्योग जगत में हड़कंप
NEW DELHI
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने के फैसले ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। एक तरफ जहां मजदूर इस बढ़ोतरी को नाकाफी बताते हुए आंदोलन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कारखानों के मालिकों और गारमेंट कारोबारियों ने इसे उद्योग पर एक अतिरिक्त वित्तीय बोझ करार दिया है। इस टकराव ने नोएडा के कपड़ा निर्यात उद्योग के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
वेतन वृद्धि: मजदूरों में असंतोष, मालिकों में खौफ
उत्तर प्रदेश सरकार ने 1 अप्रैल से प्रभावी नए ढांचे के तहत अकुशल मजदूरों का वेतन 13,690 रुपये, अर्ध-कुशल का 15,059 रुपये और कुशल मजदूरों का 16,868 रुपये तय किया है (नोएडा क्षेत्र के लिए)। यह लगभग 21% की बढ़ोतरी है। बावजूद इसके, मजदूर संगठन इसे महंगाई के दौर में बहुत कम मान रहे हैं।
वहीं, गारमेंट कारोबारियों का कहना है कि इनपुट कॉस्ट (कच्चे माल की लागत) और लॉजिस्टिक्स दरों में पहले ही भारी इजाफा हो चुका है। ऐसे में मजदूरी बढ़ाना उनके मुनाफे को पूरी तरह खत्म कर देगा। कारोबारियों ने चेतावनी दी है कि यदि लागत कम नहीं हुई, तो वैश्विक खरीदार अपने करोड़ों के ऑर्डर बांग्लादेश, वियतनाम और कंबोडिया जैसे देशों की ओर मोड़ देंगे।
वैश्विक बाजार में साख पर खतरा
नोएडा क्लस्टर, जो सालाना लगभग 50,000 करोड़ रुपये के कपड़ों का निर्यात करता है, इस समय अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। यहां के कारखानों में करीब 10 लाख मजदूर कार्यरत हैं। लगातार हो रही हड़ताल और प्रोडक्शन में रुकावट के कारण वैश्विक ब्रांड्स ने अब शिपमेंट की देरी को लेकर सवाल पूछना शुरू कर दिया है। एक्सपोर्टरों के अनुसार, यदि भरोसा टूटा तो नोएडा का गारमेंट हब अपनी चमक खो सकता है।
आंदोलन के पीछे ‘साजिश’ का एंगल
इस बीच, उत्तर प्रदेश सरकार ने इस पूरे आंदोलन को एक सोची-समझी साजिश करार दिया है। सरकार का दावा है कि नोएडा में हुई हिंसा और आगजनी के पीछे “बाहरी तत्वों” और “अर्बन नक्सल” विचारधारा का हाथ है। शासन का मानना है कि मजदूरों को भड़काकर औद्योगिक शांति भंग करने की कोशिश की जा रही है। पुलिस अब उन नेटवर्क की जांच कर रही है जिन्होंने शांतिपूर्ण विरोध को हिंसक रूप देने का प्रयास किया।
आगे की राह
गारमेंट एसोसिएशन शुक्रवार को राज्य सरकार के सामने अपनी चिंताओं को रखने वाला है। एक्सपोर्टर्स का कहना है कि वे सरकार के साथ मिलकर कोई ऐसा बीच का रास्ता निकालना चाहते हैं जिससे मजदूरों का भी भला हो और उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता (Competitiveness) भी बनी रहे। अब सबकी नजरें सरकार और उद्योगपतियों के बीच होने वाली अगली बैठक पर टिकी हैं।
